मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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* अध्याय ४७ * १८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कस्य त्वं सुभगे का वा दुःखिते मयि दुःखिता।<br>महता तपसा युक्ता किमर्थं मां निषेवसे॥ १७२<br><br>अनया संस्तुतो भक्त्या प्रश्रयेण दमेन च।<br>स्नेहेन चैव सुश्रोणि प्रीतोऽस्मि वरवर्णिनि॥ १७३<br><br>किमिच्छसि वरारोहे कस्ते कामः समृद्ध्यताम्।<br>तं ते सम्पादयाम्यद्य यद्यपि स्यात् सुदुष्करः॥ १७४ | प्रकार बोले—'सुभगे! तुम कौन हो अथवा किसकी पुत्री हो, जो मेरे तपस्यामें निरत होनेपर तुम भी कष्ट झेल रही हो? इस प्रकार यह घोर तप करती हुई तुम किसलिये मेरी सेवा कर रही हो? सुश्रोणि! मैं तुम्हारी इस उत्कृष्ट भक्ति, विनम्रता, इन्द्रियनिग्रह और प्रेमसे परम प्रसन्न हूँ। वरवर्णिनि! तुम मुझसे क्या प्राप्त करना चाहती हो? वरारोहे! तुम्हारी क्या अभिलाषा है? उसे तुम अवश्य बतलाओ। मैं आज उसे अवश्य पूर्ण करूँगा, चाहे वह कितना ही दुष्कर क्यों न हो'॥ १६९—१७४॥ |
| एवमुक्ताब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि।<br>चिकीर्षितं हि मे ब्रह्मंस्त्वं हि वेत्थ यथातथम्॥ १७५<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीदेनां दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा।<br>मया सह त्वं सुश्रोणि दश वर्षाणि भामिनि॥ १७६<br><br>देवि चेन्दीवरश्यामे वराहें वामलोचने।<br>एवं वृणोषि कामं त्वं मत्तो वै वल्गुभाषिणि॥ १७७<br><br>एवं भवतु गच्छामो गृहान्नो मत्तकाशिनि।<br>ततः स्वगृहमागत्य जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्॥ १७८<br><br>तया सहावसद् देव्या दश वर्षाणि भार्गवः।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः॥ १७९<br><br>कृतार्थमागतं दृष्ट्वा काव्यं सर्वे दितेः सुताः।<br>अभिजग्मुर्गृहं तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः॥ १८०<br><br>यदा गता न पश्यन्ति मायया संवृतं गुरुम्।<br>लक्षणं तस्य तद् बुद्ध्वा प्रतिजग्मुर्यथागतम्॥ १८१ | शुक्राचार्यके यों कहनेपर जयन्तीने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! आप अपने तपोबलसे मेरे मनोरथको भली-भाँति जान सकते हैं; क्योंकि आपको तो सबका यथार्थ ज्ञान है। ऐसा कहे जानेपर शुक्राचार्यने अपनी दिव्य दृष्टिद्वारा जयन्तीके मनोरथको जानकर उससे कहा—'सुन्दर भावोंवाली सुश्रोणि! इन्दीवर कमलके सदृश तुम्हारा वर्ण श्याम है, देवि! तुम्हारे नेत्र अत्यन्त रमणीय हैं तथा तुम्हारा भाषण अतिशय मधुर है। वराहें! तुम दस वर्षोंतक मेरे साथ रहनेका जो मुझसे वर चाह रही हो, वह वैसा ही हो। मत्तकाशिनि! आओ, अब हमलोग अपने घर चलें।' तब अपने घर आकर शुक्राचार्यने जयन्तीका पाणिग्रहण किया। फिर तपोबलसम्पन्न शुक्राचार्यने मायाका आवरण डाल दिया, जिससे सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर वे दस वर्षोंतक जयन्तीके साथ निवास करते रहे। इसी बीच जब दितिके पुत्रोंको यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्य सफलमनोरथ होकर घर लौट आये हैं, तब वे सभी हर्षपूर्वक उन्हें देखनेकी अभिलाषासे उनके घरकी ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचनेपर जब उन्हें मायासे छिपे हुए गुरुदेव शुक्राचार्य नहीं दीख पड़े, तब वे उनके उस लक्षणको समझकर जैसे आये थे, वैसे ही वापस चले गये॥ १७५—१८१॥ |
| बृहस्पतिस्तु संरुद्धं काव्यं ज्ञात्वा वरेण तु।<br>तुष्ट्यर्थं दश वर्षाणि जयन्त्या हितकाम्यया॥ १८२<br><br>बुद्ध्वा तदन्तरं सोऽपि दैत्यानामिन्द्रनोदितः।<br>काव्यस्य रूपमास्थाय असुरान् समुपाव्हयत्॥ १८३<br><br>ततस्तानागतान् दृष्ट्वा बृहस्पतिरुवाच ह।<br>स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहं वो हिताय च॥ १८४ | इधर बृहस्पतिको जब यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्य जयन्तीकी हित-कामनासे उसे संतुष्ट करनेके लिये दस वर्षोंतक वरदानके बन्धनसे बँध चुके हैं, तब इसे दैत्योंका महान् छिद्र जानकर इन्द्रकी प्रेरणासे उन्होंने शुक्राचार्यका रूप धारणकर असुरोंको बुलाया। उन्हें आया देखकर (शुक्ररूपधारी) बृहस्पतिने उनसे कहा—'मेरे यजमानो! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुमलोगोंके कल्याणके लिये तपोवनसे लौट आया हूँ। |