मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२०६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| येषु वै स्थास्यते क्षत्रमुत्पत्स्यन्ते नृपाश्च ये।<br>तेषामायुःप्रमाणं च नामतश्चैव तान् नृपान्॥ ६९<br>कृतयुगप्रमाणं च त्रेताद्वापरयोस्तथा।<br>कलियुगप्रमाणं च युगदोषं युगक्षयम्॥ ७०<br>सुखदुःखप्रमाणं च प्रजादोषं युगस्य तु।<br>एतत् सर्वं प्रसंख्याय पृच्छतां ब्रूहि नः प्रभो॥ ७१ | यह क्षत्रिय-जाति जिन-जिन वंशोंमें स्थित रहेगी और उनमें जो-जो नरेश उत्पन्न होंगे, उनके क्या नाम होंगे तथा उनकी आयुका प्रमाण कितना होगा? कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग—इन चारों युगोंकी कितनी-कितनी अवधि होगी? प्रत्येक युगमें क्या-क्या दोष होंगे? तथा उन युगोंका विनाश कैसे होगा? सुख और दुःखका प्रमाण क्या होगा? तथा प्रत्येक युगकी प्रजाओंमें क्या-क्या दोष उत्पन्न होंगे? प्रभो! यह सब क्रमशः हमें बतलाइये; क्योंकि हमलोग इसे जानना चाहते हैं॥ ६८-७१॥ |
| सूत उवाच<br>यथा मे कीर्तितं पूर्वं व्यासेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>भाव्यं कलियुगं चैव तथा मन्वन्तराणि च॥ ७२<br>अनागतानि सर्वाणि ब्रुवतो मे निबोधत।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भविष्या ये नृपास्तथा॥ ७३<br>ऐडैक्ष्वाकान्वये चैव पौरवे चान्वये तथा।<br>येषु संस्थास्यते तच्च ऐडैक्ष्वाकुकुलं शुभम्।<br>तान् सर्वान् कीर्तयिष्यामि भविष्ये कथितान् नृपान्॥ ७४<br>तेभ्योऽपरेऽपि ये त्वन्ये ह्युत्पत्स्यन्ते नृपाः पुनः।<br>क्षत्राः पारशवाः शूद्रास्तथान्ये ये बहिश्चराः॥ ७५<br>अन्धाः शकाः पुलिन्दाश्च चूलिका यवनास्तथा।<br>कैवर्ताभीरशबरा ये चान्ये म्लेच्छसम्भवाः।<br>पर्यायतः प्रवक्ष्यामि नामतश्चैव तान् नृपान्॥ ७६<br>अधिसीमकृष्णश्चैतेषां प्रथमं वर्तते नृपः।<br>तस्यान्यवाये वक्ष्यामि भविष्ये कथितान् नृपान्॥ ७७<br>अधिसीमकृष्णपुत्रस्तु विवक्षुर्भविता नृपः।<br>गङ्गाया तु हृते तस्मिन् नगरे नागसाह्वये॥ ७८<br>त्यक्त्वा विवक्षुर्नगरं कौशाम्ब्यां तु निवत्स्यति।<br>भविष्याष्टौ सुतास्तस्य महाबलपराक्रमाः॥ ७९<br>भूरिज्येष्ठः सुतस्तस्य तस्य चित्ररथः स्मृतः।<br>शुचिद्रवश्चित्ररथाद् वृष्णिमांश्च शुचिद्रवात्॥ ८०<br>वृष्णिमतः सुषेणश्च भविष्यति शुचिर्नृपः।<br>तस्मात् सुषेणाद् भविता सुनीथो नाम पार्थिवः॥ ८१<br>नृपात् सुनीथाद् भविता नृचक्षुः सुमहाद्यशाः।<br>नृचक्षुषस्तु दायादो भविता वै सुखीबलः॥ ८२<br>सुखीबलसुतश्चापि भावी राजा परिष्णवः।<br>परिष्णवसुतश्चापि भविता सुतपा नृपः॥ ८३<br>मेधावी तस्य दायादो भविष्यति न संशयः।<br>मेधाविनः सुतश्चापि भविष्यति पुरञ्जयः॥ ८४ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! पूर्वकालमें अक्लिष्टकर्मा व्यासजीने मुझसे भावी कलियुग तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें जैसा वर्णन किया था, वही मैं आपलोगोंको बतला रहा हूँ; सुनिये। इसके बाद अब मैं उन्हीं राजाओंका वर्णन करने जा रहा हूँ, जो भविष्यमें ऐड (ऐल) और इक्ष्वाकुके वंशमें तथा पौरववंशमें उत्पन्न होनेवाले हैं। जिन राजाओंमें ये मङ्गलमय ऐड और इक्ष्वाकुवंश स्थित रहेंगे, भविष्यमें होनेवाले उन सभी तथाकथित नरेशोंका मैं वर्णन करूँगा। इनके अतिरिक्त भी जो अन्य नृपतिगण क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिन्द, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर और शबर जातियोंमें उत्पन्न होंगे तथा दूसरे जो म्लेच्छ-जातियोंमें पैदा होंगे, उन सभी नरेशोंका पर्याय क्रमसे नामनिर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। इन सबमें सर्वप्रथम राजा अधिसोमकृष्ण हैं, जो सम्प्रति वर्तमान हैं। इनके वंशमें भविष्यमें उत्पन्न होनेवाले राजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। अधिसीमकृष्णका पुत्र राजा विवक्षु होगा। गङ्गाद्वारा हस्तिनापुर नगरके डुबो (बहा) दिये जानेपर विवक्षु उस नगरका परित्याग कर कौशाम्बी नगरीमें निवास करेगा। उसके महान् बलपराक्रमसे सम्पन्न आठ पुत्र होंगे। उसका ज्येष्ठ पुत्र भूरि होगा और उसका पुत्र चित्ररथ नामसे विख्यात होगा। चित्ररथसे शुचिद्रव, शुचिद्रवसे वृष्णिमान् और वृष्णिमान्से परम पवित्र राजा सुषेण उत्पन्न होगा। उस सुषेणसे सुनीथ नामका राजा होगा। राजा सुनीथसे महायशस्वी नृचक्षुकी उत्पत्ति होगी। नृचक्षुका पुत्र सुखीबल होगा। सुखीबलका पुत्र भावी राजा परिष्णव और परिष्णवका पुत्र राजा सुतपा होगा। उसका पुत्र निस्संदेह मेधावी होगा। मेधावीका पुत्र पुरञ्जय होगा। |