मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 217, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ५१ * | २०७ |
|---|
| उर्वो भाव्यः सुतस्तस्य तिग्मात्मा तस्य चात्मजः ।<br>तिग्माद् बृहद्रथो भाव्यो वसुदामा बृहद्रथात् ॥ ८५<br>वसुदाम्न्नः शतानीको भविष्योदयनस्ततः ।<br>भविष्यते चोदयनाद् वीरो राजा वहीनरः ॥ ८६<br>वहीनरात्मजश्चैव दण्डपाणिर्भविष्यति ।<br>दण्डपाणेर्निरमित्रो निरमित्रात्तु क्षेमकः ॥ ८७<br>अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतो विप्रैः पुरातनैः ।<br>ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो देवर्षिसत्कृतः ।<br>क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कलौ युगे ॥ ८८<br>इत्येष पौरवो वंशो यथावदिह कीर्तितः ।<br>धीमतः पाण्डुपुत्रस्य चार्जुनस्य महात्मनः ॥ ८९ | उसका भावी पुत्र उर्व और उसका पुत्र तिग्मात्मा होगा। तिग्मात्मासे बृहद्रथ और बृहद्रथसे वसुदामाका जन्म होगा। वसुदामासे शतानीक और उससे उदयनकी उत्पत्ति होगी। उदयनसे वीरवर राजा वहीनर उत्पन्न होगा। वहीनरका पुत्र दण्डपाणि होगा। दण्डपाणिसे निरमित्र और निरमित्रसे क्षेमकका जन्म होगा। इस वंशपरम्पराके विषयमें प्राचीनकालिक विप्रोंद्वारा एक श्लोक गाया गया है, जिसका आशय यह है कि 'ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी योनिस্বরূপ यह वंश, जो देवर्षियोंद्वारा सत्कृत है, कलियुगमें राजा क्षेमकको प्राप्त कर समाप्त हो जायगा।' इस प्रकार पुरु-वंशका तथा पाण्डुपुत्र परम बुद्धिमान् महात्मा अर्जुनके वंशका वर्णन मैंने यथार्थरूपसे कर दिया॥ ७२—८९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे पुरुवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५०
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पुरुवंशानुकीर्तन नामक पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५० ॥
इक्यावनवाँ अध्याय
अग्नि-वंशका वर्णन तथा उनके भेदोपभेदका कथन
| ऋषय ऊचुः<br>ये पूज्याः स्युर्द्विजातीनामग्नयः सूत सर्वदा ।<br>तानिदानीं समाचक्ष्व तद्वंशं चानुपूर्वशः ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>योऽसावग्निरभिमानी स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे ।<br>ब्रह्मणो मानसः पुत्रस्तस्मात् स्वाहा व्यजायत ॥ २<br>पावकं पवमानं च शुचिरग्निश्च यः स्मृतः ।<br>निर्मथ्यः पवमानोऽग्निर्वैद्युतः पावकात्मजः ॥* ३<br>शुचिरग्निः स्मृतः सौरः स्थावराश्चैव ते स्मृताः ।<br>पवमानात्मजो ह्यग्निः कव्यवाहन उच्यते ॥ ४<br>पावकिः सहरक्षस्तु हव्यवाहः शुचेः सुतः ।<br>देवानां हव्यवाहोऽग्निः पितॄणां कव्यवाहनः ॥ ५<br>सहरक्षोऽसुराणां तु त्रयाणां ते त्रयोऽग्नयः ।<br>एतेषां पुत्रपौत्राश्च चत्वारिंशन्नवैव च ॥ ६ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! जो अग्नि द्विजातियोंके लिये सदा परम पूज्य माने गये हैं, अब उनका तथा उनके वंशका आनुपूर्वी वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो ! स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें जो ये अग्निके अभिमानी देवता कहे गये हैं, वे ब्रह्माके मानस पुत्र हैं। स्वाहाने उनके संयोगसे पावक (दक्षिणाग्नि), पवमान (गार्हपत्य) और शुचि (आहवनीय) नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया, जो अग्नि भी कहलाते हैं। उनमेंसे पावकको वैद्युत (जलबिजलीसे उत्पन्न), पवमानको निर्मथ्य (निर्मन्थन करनेपर उत्पन्न) और शुचिको सौर (सूर्यके सम्बन्धसे उत्पन्न) अग्नि कहा जाता है। ये सभी अग्नि स्थावर (स्थिर स्वभाववाले) माने गये हैं। पवमानके पुत्र जो अग्नि हुए, उन्हें कव्यवाहन कहा जाता है। पावकके पुत्र सहरक्ष और शुचिके पुत्र हव्यवाहन हुए। देवताओंके अग्नि हव्यवाह हैं, जो ब्रह्माके प्रथम पुत्र हैं। सहरक्ष असुरोंके अग्नि हैं तथा पितरोंके अग्नि कव्यवाहन हैं। इस प्रकार ये तीनों देव-असुर-पितर—इन तीनोंके पृथक्-पृथक् अग्नि हैं। इनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या उनचास हैं। |
* 'अव्योनिर्वैद्युतः स्मृतः' इति पाठान्तरम् ।