भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रवक्ष्ये नामतस्तान् वै प्रविभागेन तान् पृथक्।<br>पावनो लौकिको ह्यग्निः प्रथमो ब्रह्मणश्च यः॥ ७<br>ब्रह्मौदनाग्निस्तत्पुत्रो भरतो नाम विश्रुतः।<br>वैश्वानरः सुतस्तस्य वहन् हव्यं समाः शतम्॥ ८<br>सम्भृतोऽथर्वणः पुत्रो मथितः पुष्करादधि।<br>सोऽथर्वा लौकिको ह्यग्निर्दध्यङ्ङाथर्वणःसुतः॥ ९<br>भृगोः प्रजायताथर्वा दध्यङ्ङाथर्वणः स्मृतः।<br>तस्य ह्याल्लौकिको ह्यग्निर्दाक्षिणाग्निः स वै स्मृतः॥ १०उनको मैं विभागपूर्वक पृथक्-पृथक् नामनिर्देशानुसार बतला रहा हूँ। सर्वप्रथम पावन नामक लौकिक अग्निदेव हुए, जो ब्रह्माके पुत्र हैं। उनके पुत्र ब्रह्मौदनाग्नि हुए, जो भरत नामसे भी विख्यात हैं। वैश्वानर नामक अग्नि सौ वर्षोंतक हव्यको वहन करते रहे। पुष्कर (या आकाश)-का मन्थन करनेपर अथर्वाके पुत्ररूपमें जो अग्नि उत्पन्न हुए, वे दध्यङ्ङाथर्वणके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्हींको दक्षिणाग्नि भी कहा जाता है। भृगुसे अथर्वाकी और अथर्वासे अङ्गिराकी उत्पत्ति बतलायी जाती है। उनसे अलौकिक अग्निकी उत्पत्ति हुई, जिसे दक्षिणाग्नि भी कहते हैं॥ २—१०॥
अथ यः पवमानस्तु निर्मथ्योऽग्निः स उच्यते।<br>स च वै गार्हपत्योऽग्निः प्रथमो ब्रह्मणः स्मृतः॥ ११<br>ततः सभ्यावसथ्यौ च संशत्यास्तौ सुतावुभौ।<br>ततः षोडश नद्यस्तु चकमे हव्यवाहनः।<br>यः खल्वाहवनीयोऽग्निरभिमानी द्विजैः स्मृतः॥ १२<br>कावेरीं कृष्णवेणां च नर्मदां यमुनां तथा।<br>गोदावरीं वितस्तां च चन्द्रभागामिरावतीम्॥ १३<br>विपाशां कौशिकीं चैव शतद्रुं सरयूं तथा।<br>सीतां मनस्विनीं चैव ह्लादिनीं पावनां तथा॥ १४<br>तासु षोडशधाऽऽत्मानं प्रविभज्य पृथक् पृथक्।<br>तदा तु विहरंस्तासु धिष्ण्येच्छः स बभूव ह॥ १५<br>स्वाभिधानस्थिता धिष्ण्यास्तासूतपन्नाश्च धिष्णवः।<br>धिष्ण्येषु जज्ञिरे यस्मात् ततस्ते धिष्णवः स्मृताः॥ १६<br>इत्येते वै नदीपुत्रा धिष्ण्येषु प्रतिपेदिरे।<br>तेषां विहरणीया ये उपस्थेयाश्च ताञ्शृणु।<br>विभुः प्रवाहणोऽग्नीध्रस्तत्रस्था धिष्णावोऽपरे॥ १७<br>विहरन्ति यथास्थानं पुण्याहे समुपक्रमे।<br>अनिर्देश्यानिवार्याणामग्नीनां शृणुत क्रमम्॥ १८<br>वासवोऽग्निः कृशानुर्यो द्वितीयोत्तरवेदिकः।<br>सम्राडग्निसुतो ह्यष्टावुपतिष्ठन्ति तान् द्विजाः॥ १९हम पहले कह चुके हैं कि जो पवमान अग्नि हैं, वे ही निर्मथ्य नामसे भी कहे जाते हैं। वे ही ब्रह्माके प्रथम पुत्र गार्हपत्य* अग्नि हैं। फिर संशतिसे सभ्य और आवसथ्य—इन दो पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। तदनन्तर आहवनीय नामक अग्निने जिन्हें ब्राह्मणोंने अग्निके अभिमानी देवता नामसे अभिहित किया है, अपनेको सोलह भागोंमें विभक्त कर कावेरी, कृष्णवेणा, नर्मदा, यमुना, गोदावरी, वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा, इरावती, विपाशा, कौशिकी (कोसी), शतद्रु (सतलज), सरयू, सीता, मनस्विनी, ह्लादिनी तथा पावना—इन सोलह नदियोंके साथ पृथक्-पृथक् विहार किया। उनके साथ विहार करते समय अग्निको स्थान-प्राप्तिकी इच्छा उत्पन्न हो गयी थी, इसलिये उन नदियोंके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र उस इच्छाके अनुसार धिष्णु (या धिष्ण्य) कहलाये। चूँकि वे यज्ञिय अग्निके स्थापनयोग्य स्थानपर पैदा हुए थे, इसलिये धिष्णु नामसे कहे जाने लगे। इस प्रकार ये सभी नदीपुत्र धिष्ण्य (यज्ञिय अग्निके स्थापनयोग्य स्थान)-में उत्पन्न हुए थे। अब इनके विहार एवं उपासनायोग्य स्थानका वर्णन कर रहा हूँ, उन्हें सुनिये। यज्ञादि पुण्य अवसरके उपस्थित होनेपर विभु, प्रवाहण, अग्नीध्र आदि अन्यान्य धिष्णु वहाँ उपस्थित होकर यथास्थान विचरते रहते हैं। अब अनिर्देश्य और अनिवार्य अग्नियोंके क्रमको सुनिये। वासव नामक अग्नि, जिसे कृशानु भी कहते हैं, यज्ञकी दूसरी वेदीके उत्तर भागमें स्थित होते हैं। उन्हीं अग्निका एक नाम सम्राट् भी है। इन अग्निके आठ पुत्र हैं, जिनकी विप्रगण उपासना करते हैं।

* इन अग्नियोंकी वैदिक २१ यज्ञसंस्थाओंमें बड़ी प्रतिष्ठा है। इनका विस्तृत विवरण आश्वलायनादि (२।१-२) श्रौतसूत्रों, कौशिकसूत्र, महाभारत, ब्रह्माण्डपुराणादिमें हैं। वासुदेवशरण अग्रवालने 'Matsya Puran A Study' में, अनेक कर्मोंमें अग्निनाम संग्रहमें विधानपारिजातकारने तथा 'यज्ञमीमांसा' ग्रन्थमें वेणीराम शर्माने बहुत श्रम किया है।