भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१२* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अष्टावात्मगुणाः प्रोक्ताः पुराणस्य तु कोविदैः ।<br>अयमेव क्रियायोगो ज्ञानयोगस्य साधकः ॥ ११<br><br>कर्मयोगं विना ज्ञानं कस्यचिन्नेह दृश्यते ।<br>श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममुपतिष्ठेत् प्रयत्नतः ॥ १२<br><br>देवतानां पितॄणां च मनुष्याणां च सर्वदा ।<br>कुर्यादहरहर्यज्ञैर्भूतर्षिगणतर्पणम् ॥ १३<br><br>स्वाध्यायैरर्चयेच्चर्षीन् होमैर्विद्वान् यथाविधि ।<br>पितॄञ्छ्राद्धैरन्नदानैर्भूतानि बलिकर्मभिः ॥ १४<br><br>पञ्चैते विहिता यज्ञाः पञ्चसूनापनुत्तये ।<br>कण्डनी पेषणी चुल्ली जलकुम्भी प्रमार्जनी ॥ १५<br><br>पञ्च सूना गृहस्थस्य तेन स्वर्गं न गच्छति ।<br>तत्पापनाशनायामी पञ्च यज्ञाः प्रकीर्तिताः * ॥ १६रहना—पुराणोंके ज्ञाता विद्वानोंद्वारा ये आठ आत्मगुण बतलाये गये हैं। यही कर्मयोग ज्ञानयोगका साधक है। जगत्‌में कर्मयोगके बिना किसीको ज्ञानकी प्राप्ति हुई हो, ऐसा नहीं देखा गया है; इसलिये श्रुतियों एवं स्मृतियोंद्वारा कहे गये धर्मका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। प्रतिदिन सर्वदा देवताओं, पितरों और मनुष्योंको यज्ञोंद्वारा तृप्त करना चाहिये। साथ ही पितरों और ऋषियोंके तर्पणका कार्य भी कर्तव्य है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह स्वाध्यायद्वारा देवताओंकी, हवनद्वारा ऋषियोंकी, श्राद्धद्वारा पितरोंकी, अन्नद्वारा अतिथियोंकी तथा बलिकर्मद्वारा मृत प्राणियोंकी विधिपूर्वक अर्चना करे। गृहस्थोंके घरमें जीवहिंसाके पाँच प्रकारके स्थानोंपर घटित हुए पापकी निवृत्तिके लिये इन पाँच प्रकारके यज्ञोंका विधान बतलाया गया है। गृहस्थके घरमें जीवहिंसाके पाँच स्थान ये हैं—कण्डनी (वस्तुओंके कूटनेका पात्र ओखली, खरल आदि), पेषणी (पीसनेका उपकरण चक्की, सिलवट आदि), चुल्ली (चूल्हा), जलकुम्भी (पानी रखे जानेवाले घड़े) और प्रमार्जनी (झाडू आदि)। इन स्थानोंपर उत्पन्न हुए पापके कारण गृहस्थ पुरुष स्वर्ग नहीं जा सकता, अतः उन पापोंके विनाशके लिये ये पाँचों यज्ञ बतलाये गये हैं॥ ५—१६॥
द्वात्रिंशच्च तथाष्टौ च ये संस्काराः प्रकीर्तिताः ।<br>तद्युक्तोऽपि न मोक्षाय यस्त्वात्मगुणवर्जितः ॥ १७<br><br>तस्मादात्मगुणोपेतः श्रुतिकर्म समाचरेत् ।<br>गोब्राह्मणानां वित्तेन सर्वदा भद्रमाचरेत् ॥ १८द्विजातियोंके लिये जो चालीस प्रकारके संस्कार बतलाये गये हैं, उनसे संस्कृत होनेपर भी जो मनुष्य (उपर्युक्त आठ) आत्मगुणोंसे रहित है, वह मोक्षका भागी नहीं हो सकता। इसलिये आत्मगुणोंसे सम्पन्न होकर ही वैदिक कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। गृहस्थको सदा उपार्जित धनद्वारा गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण करना चाहिये।
गोभूहिरण्यवासोभिर्गन्धमाल्योदकेन च ।<br>पूजयेद् ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्रवस्वात्मकं शिवम् ॥ १९<br><br>व्रतोपवासैर्विधिवच्छ्रद्धया च विमत्सरः ।<br><br>योऽसावतीन्द्रियः शान्तः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।<br>वासुदेवो जगन्मूर्तिस्तस्य सम्भूतयो ह्यमी ॥ २०उसका कर्तव्य है कि वह व्रत एवं उपवास आदि करके गौ, पृथ्वी, सुवर्ण, वस्त्र, गन्ध, माला और जल आदिसे ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, रुद्र और वसुस्वरूप शिवकी श्रद्धापूर्वक विधिसहित पूजा करे; इसमें कृपणता न करे। जो ये इन्द्रियोंके अगोचर, परम शान्त, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अव्यक्त, अविनाशी एवं विश्वस्वरूप भगवान् वासुदेव हैं,

* ये १३—१६ तकके ४ श्लोक मनुस्मृति ३। ६८—७१ में भी प्राप्त होते हैं। और आठ गुणोंके निर्देशक श्लोक गौतमधर्मसूत्र ८। २४—२५, शङ्ख स्मृ० १। १७, चाणक्य० १२। १५ आदिमें उपलब्ध भी हैं।