भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 223
* अध्याय ५२ *२१३

| ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् मार्तण्डो वृषवाहनः।<br>अष्टौ च वसवस्तद्वदेकादश गणाधिपाः।<br>लोकपालाधिपाश्चैव पितरो मातरस्तथा॥ २१ | उन्हींकी ये विभूतियाँ हैं। उन विभूतियोंके नाम ये हैं—ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, सूर्य, शिव, आठ वसु, ग्यारह गणाधिप, लोकपालाधीश्वर, पितर और मातृकाएँ। चराचर जगत्सहित | | इमा विभूतयः प्रोक्ताश्चराचरसमन्विताः।<br>ब्रह्माद्याश्चतुरो मूलमव्यक्ताधिपतिः स्मृतः॥ २२ | ये सभी विभूतियाँ बतलायी गयी हैं। ब्रह्मा आदि चार (ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, शिव) देवता मूलरूपसे इस जगत्के अव्यक्त अधिपति कहे जाते हैं। इसलिये ब्रह्मा, सूर्य, विष्णु अथवा | | ब्रह्मणा चाथ सूर्येण विष्णुनाथ शिवेन वा।<br>अभेदात् पूजितेन स्यात् पूजितं सचराचरम्॥ २३ | शिवकी अभेदभावसे पूजा करनेपर चराचर जगत्की पूजा सम्पन्न हो जाती है। सूर्य ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंके परम | | ब्रह्मादीनां परं धाम त्रयाणामपि संस्थितिः।<br>वेदमूर्तावतः पूषा पूजनीयः प्रयत्नतः॥ २४ | धाम हैं, जिनमें वे निवास करते हैं। सूर्यदेव वेदोंके मूर्तस्वरूप हैं, अतः इनकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसलिये | | तस्मादग्निद्विजमुखान् कृत्वा सम्पूजयेदिमान्।<br>दानैर्व्रतोपवासैश्च जपहोमादिना नरः॥ २५ | मनुष्यको चाहिये कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणोंके मुखोंमें इनका आवाहन करके दान, व्रत, उपवास, जप, हवन आदि-द्वारा इनकी पूजा करे। इस प्रकार जो मनुष्य कर्मयोगनिष्ठ, | | इति क्रियायोगपरायणस्य<br>वेदान्तशास्त्रस्मृतिवत्सलस्य ।<br>विकर्मभीतस्य सदा न किंचित्<br>प्राप्तव्यमस्तीह परे च लोके॥ २६ | वेदान्तशास्त्र और स्मृतियोंका प्रेमी तथा अधर्मसे सदा भयभीत रहता है, उसके लिये इस लोक अथवा परलोकमें कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रह जाता, अर्थात् सभी पदार्थ उसके हस्तगत हो जाते हैं॥ १७—२६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कर्मयोगमाहात्म्यं नाम द्विपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कर्मयोगमाहात्म्यनामक बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५२॥