भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 224
२१४* मत्स्यपुराण *

तिरपनवाँ अध्याय

पुराणोंकी नामावलि और उनका संक्षिप्त परिचय

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>पुराणसंख्यामाचक्ष्व सूत विस्तरशः क्रमात्।<br>दानधर्ममशेषं तु यथावदनुपूर्वशः॥ १ऋषियोंने पूछा—सूतजी! अब आप हमलोगोंसे क्रमशः पुराणोंकी संख्याका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। साथ ही उनके दान और धर्मकी सम्पूर्ण आनुपूर्वी विधि भी यथार्थरूपसे बतलाइये॥ १॥
सूत उवाच<br>इदमेव पुराणेषु पुराणपुरुषस्तदा।<br>यदुक्तवान् स विश्वात्मा मनवे तन्निबोधत॥ २सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ऐसे ही प्रश्नके उत्तरमें उस समय पुराणपुरुष विश्वात्मा मत्स्यभगवान्‌ने मनुके प्रति पुराणोंके विषयमें जो कुछ कहा था, उसे सुनिये॥ २॥
मत्स्य उवाच<br>पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।<br>अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥ ३<br><br>पुराणमेकमेवासीत् तदा कल्पान्तरेऽनघ।<br>त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ४<br><br>निर्दग्धेषु च लोकेषु वाजिरूपेण वै मया।<br>अङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणं न्यायविस्तरम्॥ ५<br><br>मीमांसां धर्मशास्त्रं च परिगृह्य मया कृतम्।<br>मत्स्यरूपेण च पुनः कल्पादावुदकार्णवे॥ ६<br><br>अशेषमेतत् कथितमुदकान्तर्गतेन च।<br>श्रुत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवांश्चतुर्मुखः॥ ७<br><br>प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत् ततः।<br>कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप॥ ८<br><br>व्यासरूपमहं कृत्वा संहरामि युगे युगे।<br>चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा॥ ९<br><br>तथाष्टादशधा कृत्वा भूर्लोकेऽस्मिन् प्रकाश्यते।<br>अद्यापि देवलोकेऽस्मिञ्शतकोटिप्रविस्तरम्॥ १०मत्स्यभगवान्‌ने कहा—राजर्षे! ब्रह्माजीने (सृष्टिनिर्माणके समय) समस्त शास्त्रोंमें सर्वप्रथम पुराणका ही स्मरण किया था। उसके बाद उनके मुखोंसे वेद प्रादुर्भूत हुए हैं। अनघ! उस कल्पान्तरमें सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तृत, पुण्यप्रद और त्रिवर्ग—तीन पुरुषार्थके समुदाय (धर्म, अर्थ, काम)-का साधनस्वरूप पुराण एक ही था। सभी लोकोंके जलकर नष्ट हो जानेपर मैंने ही अश्व (हयग्रीव)-रूपसे व्याकरणादि छहों अङ्गोंसहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्रको ग्रहण करके उनका संकलन किया था। पुनः मैंने ही कल्पके आदिमें एकार्णवके समय मत्स्यरूपसे जलके भीतर स्थित रहकर इस (विषय)-का पूर्णरूपसे वर्णन किया था। उसे सुनकर ब्रह्माने देवताओं और मुनियोंसे कहा था। राजन्! तभीसे संसारमें समस्त शास्त्रों और पुराणोंका प्रचार हुआ। काल-प्रभावसे पुराणकी ओरसे लोगोंकी उदासीनता देखकर प्रत्येक द्वापरयुगमें मैं सदा व्यासरूपसे प्रकट होता हूँ* और उस (पुराण)-का संक्षेप कर चार लाख श्लोकोंमें बना देता हूँ। वही अठारह भागोंमें विभक्त होकर इस भूलोकमें प्रकाशित होता है। आज भी यह पुराण इस देवलोकमें सौ करोड़ श्लोकोंमें ही है।

* व्यासजीके विष्णुरूप होनेकी बात महाभारत, विष्णुपुराण (३। ४। ५) आदिमें भी कही गयी है, यथा—‘कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम्। को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्॥’ इत्यादि।