भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 225

* अध्याय ५३ * २१५

| तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षं संक्षेपेण निवेशितम्।<br>पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते॥ ११<br><br>नामतस्तानि वक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>ब्रह्मणाभिहितं पूर्वं यावन्मात्रं मरीचये॥ १२<br><br>ब्राह्मं त्रिदशसाहस्रं पुराणं परिकीर्त्यते।<br>लिखित्वा तच्च यो दद्याज्जलधेनुसमन्वितम्।<br>वैशाखपूर्णिमायां च ब्रह्मलोके महीयते॥ १३<br><br>एतदेव यदा पद्ममभूद्धैरण्मयं जगत्।<br>तद्वृत्तान्ताश्रयं तद्वत् पाद्ममित्युच्यते बुधैः।<br>पाद्मं तत्पञ्चपञ्चाशत्सहस्राणीह कथ्यते॥ १४<br><br>तत्पुराणं च यो दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>ज्येष्ठे मासि तिलैर्युक्तमश्वमेधफलं लभेत्॥ १५<br><br>वाराहकल्पवृत्तान्तमधिकृत्य पराशरः।<br>यत् प्राह धर्मानखिलांस्तदुक्तं वैष्णवं विदुः॥ १६<br><br>तदाषाढे च यो दद्याद् घृतधेनुसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां विपूतात्मा स पदं याति वारुणम्।<br>त्रयोविंशतिसाहस्रं तत्प्रमाणं विदुर्बुधाः॥ १७<br><br>श्वेतकल्पप्रसङ्गेन धर्मान् वायुरिहाब्रवीत्।<br>यत्र तद्वायवीयं स्याद् रुद्रमाहात्म्यसंयुतम्।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि पुराणं तदिहोच्यते॥ १८<br><br>श्रावण्यां श्रावणे मासि गुडधेनुसमन्वितम्।<br>यो दद्याद् वृषसंयुक्तं ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>शिवलोके स पूतात्मा कल्पमेकं वसेन्नरः॥ १९ | उसका पूरा सारांश मैंने संक्षेपसे इस चार लाख श्लोकोंवाले पुराणमें भर दिया है। अब उन अठारह पुराणोंका यहाँ वर्णन किया जाता है॥ ३—११॥<br><br>श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं उनका नाम निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने महर्षि मरीचिके प्रति जितने श्लोकोंका वर्णन किया था, वह प्रथम ब्रह्मपुराण कहा जाता है। उसमें तेरह हजार श्लोक हैं। जो मानव इस पुराणको लिखकर उस पुस्तकका जलधेनु¹ (दानके लिये जलके घड़ेमें कल्पित गौ)-के साथ वैशाखकी पूर्णिमा तिथिके दिन ब्राह्मणको दान कर देता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जिस समय यह जगत् स्वर्णमय कमलके रूपमें परिणत था, उस समयका वृत्तान्त जिसमें वर्णन किया गया है, उसे विद्वान्लोग (द्वितीय) पद्मपुराण नामसे अभिहित करते हैं। उस पद्मपुराणकी श्लोक-संख्या पचपन हजार बतायी जाती है। स्वर्णनिर्मित कमलसे युक्त उस पुराणका जो मनुष्य तिलके साथ ज्येष्ठमासमें ब्राह्मणको दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञ²के फलकी प्राप्ति होती है। महर्षि पराशरने वाराह-कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर जिन सम्पूर्ण धर्मोंका वर्णन किया है, उनसे युक्त (तृतीय) पुराणको वैष्णव (विष्णुपुराण) कहा जाता है। विद्वान्लोग उसका प्रमाण तेईस³ हजार श्लोकोंका बतलाते हैं। जो मानव आषाढमासकी पूर्णिमाको घृतधेनुयुक्त इस पुराणका दान करता है, उसका आत्मा पवित्र हो जाता है और वह वरुण-लोकमें जाता है। श्वेतकल्पके प्रसङ्गवश वायुने इस मर्त्यलोकमें जिन धर्मोंका वर्णन किया था, उनका संकलन जिसमें हुआ है, उसे (चतुर्थ) वायवीय (वायुपुराण या शिवपुराण⁴) कहते हैं। वह शङ्करजीके माहात्म्यसे भी परिपूर्ण है। इस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है। जो मनुष्य श्रावणमासमें श्रावणी पूर्णिमाको गुड़धेनु और बैलके साथ इस पुराणका कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह पवित्रात्मा होकर शिवलोकमें एक कल्पतक निवास करता |


१. जलधेनु-दानकी विधि वाराहादि पुराणोंमें तथा इसी मत्स्यपुराणके ८२ वें अध्यायमें भी आयी है। इसके आगे घृतधेनु आदिकी भी विधि है, जिसकी चर्चा यहाँ भी आगे १७ वें श्लोकमें हुई है।
२. विष्णुपुराण (५। ५। १४) तथा मनुस्मृति (११। २६०) आदि स्मृतियोंके अनुसार यह क्रतुराट्—सभी यज्ञोंका राजा तथा सर्वपापापनोदक है। शतपथब्राह्मणके अश्वमेधकाण्डके पचासों पृष्ठों तथा ऐतरेय-तैत्तिरीय ब्राह्मणों, तैत्तिरीय संहिता-भाष्य, आश्वलायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, कात्यायनादि श्रौतसूत्रों तथा वाल्मीकीय रामायण बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड, पद्म आदि कई स्थानों और रामाश्वमेध, महाभारतके आश्वमेधिकपर्व, जैमिनीयाश्वमेध आदि कई ग्रन्थोंमें इसकी विस्तृत महिमा एवं विधि निरूपित है। इसमें प्रति आठवें पूरे दिन 'पारिप्लव'में पुराण (विशेषकर मत्स्यपुराण) सुननेकी विधि है और इसमें पुराण-श्रवणकी ३६ बार पुनरावृत्ति होती है।
३. यह संख्या विष्णुधर्मोत्तरको लेकर है। अन्यथा लिङ्गपुराणादिके वचनानुसार इसमें साढ़े पाँच सहस्र श्लोक ही हैं।
४. पुराणगणनामें चौथी संख्यापर कहीं वायु और कहीं शिवपुराणका उल्लेख है। शिवपुराणमें भी एक वायवीय संहिता है तथा शूलपाणिके वचनानुसार वायुपुराण भी शैवपुराण ही है।