भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 1098 में से

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२१६* मत्स्यपुराण *

| यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यते धर्मविस्तरः।<br>वृत्रासुरवधोपेतं तद् भागवतमुच्यते॥ २०<br><br>सारस्वतस्य कल्पस्य मध्ये ये स्युर्नरोत्तमाः।<br>तद्वृत्तान्तोद्भवं लोके तद् भागवतमुच्यते॥ २१<br><br>लिखित्वा तच्च यो दद्याद्धेमसिंहसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां प्रौष्ठपद्यां स याति परमां गतिम्।<br>अष्टादश सहस्राणि पुराणं तत् प्रचक्षते॥ २२ | है। जिसमें गायत्रीका आश्रय लेकर विस्तारपूर्वक धर्मका वर्णन किया गया है तथा जो वृत्रासुरवधके वृत्तान्तसे संयुक्त है, उसे (पञ्चम) भागवतपुराण<sup></sup> कहा जाता है। इसी प्रकार सारस्वतकल्पमें जो श्रेष्ठ मनुष्य हो गये हैं, लोकमें उनके वृत्तान्तसे सम्बन्धित पुराणको 'भागवतपुराण' कहा जाता है। यह पुराण अठारह हजार श्लोकोंका बतलाया जाता है। जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित सिंहके साथ भाद्रपदमासकी पूर्णिमा तिथिको दान कर देता है वह परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है॥ १२—२२॥ | | यत्राह नारदो धर्मान् बृहत्कल्पाश्रयाणि च।<br>पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीयं तदुच्यते॥ २३<br><br>आश्विने पञ्चदश्यां तु दद्याद् धेनुसमन्वितम्।<br>परमां सिद्धिमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्॥ २४ | जिस पुराणमें बृहत्कल्पका आश्रय लेकर देवर्षि नारदने धर्मोंका उपदेश किया है, उसे (षष्ठ) नारदीय (नारदपुराण) कहा जाता है। उसमें पचीस हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य आश्विनमासकी पूर्णिमा तिथिको धेनुके साथ इस पुराणका दान करता है, वह पुनर्जन्मसे रहित परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। | | यत्राधिकृत्य शकुनीन् धर्माधर्मविचारणा।<br>व्याख्याता वै मुनिप्रश्ने मुनिभिर्धर्मचारिभिः॥ २५<br><br>मार्कण्डेयेन कथितं तत् सर्वं विस्तरेण तु।<br>पुराणं नवसाहस्रं मार्कण्डेयमिहोच्यते॥ २६<br><br>प्रतिलिख्य च यो दद्यात् सौवर्णकरिसंयुतम्।<br>कार्तिक्यां पुण्डरीकस्य यज्ञस्य फलभाग् भवेत्॥ २७ | जिस पुराणमें पक्षियोंका आश्रय लेकर एक मुनिके प्रश्न करनेपर धर्मचारी मुनियोंद्वारा धर्म और अधर्मके विचारका जो कुछ व्याख्यान दिया गया है, उन सबका महर्षि मार्कण्डेयने पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, वह लोकमें (सप्तम) मार्कण्डेयपुराणके नामसे विख्यात है। इसकी श्लोक-संख्या नौ हजार है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर स्वर्णनिर्मित हाथीके सहित कार्तिकी पूर्णिमाको उस पुस्तकका दान करता है, वह पुण्डरीक-यज्ञके<sup></sup> फलका भागी होता है। | | यत्तदीशानकं कल्पं वृत्तान्तमधिकृत्य च।<br>वसिष्ठायाग्निना प्रोक्तमाग्नेयं तत् प्रचक्षते॥ २८<br><br>लिखित्वा तच्च यो दद्याद्धेमपद्मसमन्वितम्।<br>मार्गशीर्ष्यां विधानेन तिलधेनुसमन्वितम्।<br>तच्च षोडशसाहस्रं सर्वक्रतुफलप्रदम्॥ २९ | जिसमें ईशानकल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर अग्निने महर्षि वसिष्ठके प्रति उपदेश किया है, उसे (अष्टम) आग्नेय (अग्निपुराण) कहते हैं। इसमें सोलह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित कमल और तिलधेनुसहित मार्गशीर्षमासकी पूर्णिमा तिथिको विधि-विधानके साथ दान करता है, उसके लिये यह सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता हो जाता है। |


१. भागवतपुराण बहुत प्राचीन सर्वाधिक प्रसिद्ध है; क्योंकि इसपर ११ वीं शतीकी श्रीधरीसे १९ वीं शतीकी अन्वितार्थप्रकाशिका-तक पचासों संस्कृत टीकाएँ हैं तथा सूरसागर आदि-जैसे सैकड़ों देशी-विदेशी भाषाओंमें इसके गद्य-पद्यानुवाद हैं। बर्नफका फ्रेंच अनुवाद भी श्रेष्ठरूप पर्याप्त प्रसिद्ध है। इसपर प्रथम शतीसे लेकर मध्वादिमतके 'भागवत'-तात्पर्यनिर्णय, लघुभागवतामृत, बृहद्भागवतामृतादि अगणित प्रबन्ध निबद्ध हुए हैं और गोपाल भट्ट आदिके हरिभक्तिविलासादिमें इसके हजारों वचन उद्धृत हैं। कल्याणके १६वें वर्षमें १-२ अङ्कोंमें यह अनुवाद तथा मूलसहित प्रकाशित है। गीताप्रेससे इसकी प्रायः लाखों प्रतियाँ विभिन्न संस्करणोंमें बिक चुकी हैं।

२. इस यज्ञकी विस्तृत महिमा एवं प्रक्रिया आश्वलायन, सत्याषाढ, कात्यायन देवयाज्ञिक पद्धति आदिमें है।

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