भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 227

* अध्याय ५३ * २१७


| यत्राधिकृत्य माहात्म्यमादित्यस्य चतुर्मुखः।<br>अघोरकल्पवृत्तान्तप्रसङ्गेन जगत्स्थितिम्।<br>मनवे कथयामास भूतग्रामस्य लक्षणम्॥ ३०<br>चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च।<br>भविष्यच्चरितप्रायं भविष्यं तदिहोच्यते॥ ३१<br>तत्पौषे मासि यो दद्यात् पौर्णमास्यां विमत्सरः।<br>गुडकुम्भसमायुक्तमग्निष्टोमफलं भवेत्॥ ३२<br>रथन्तरस्य कल्पस्य वृत्तान्तमधिकृत्य च।<br>सावर्णिना नारदाय कृष्णमाहात्म्यमुत्तमम्॥ ३३<br>यत्र ब्रह्मवराहस्य चोदनं वर्णितं मुहुः।<br>तदष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमुच्यते॥ ३४<br>पुराणं ब्रह्मवैवर्तं यो दद्यान्माघमासि च।<br>पौर्णमास्यां शुभदिने ब्रह्मलोके महीयते॥ ३५ | जिसमें अघोर कल्पके वृत्तान्तके प्रसङ्गवश सूर्यके माहात्म्यका आश्रय लेकर ब्रह्माने मनुके प्रति जगत्की स्थिति और प्राणिसमूहके लक्षणका वर्णन किया है तथा जिसमें प्रायः भविष्यकालीन चरितका वर्णन आया है, उसे इस लोकमें (नवम) भविष्यपुराण कहते हैं। उसमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक हैं। जो मनुष्य ईर्ष्या-द्वेषरहित हो पौषमासकी पूर्णिमा तिथिको उसका गुड़से पूर्ण घड़ेसहित दान करता है, उसे अग्निष्टोम* नामक यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। जिसमें रथन्तर कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सावर्णि मनुने नारदजीके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके श्रेष्ठ माहात्म्यका वर्णन किया है तथा जिसमें ब्रह्मवराहका वृत्तान्त बारम्बार वर्णित हुआ है, उसे (दशम) ब्रह्मवैवर्तपुराण कहते हैं। इसमें अठारह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य माघमासमें पूर्णिमा तिथिको शुभ दिनमें इस ब्रह्मवैवर्तपुराणका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सत्कृत होता है॥ २३—३५॥ | | यत्राग्निलिङ्गमध्यस्थः प्राह देवो महेश्वरः।<br>धर्मार्थकाममोक्षार्थमाग्रेयमधिकृत्य च॥ ३६<br>कल्पान्ते लैङ्गमित्युक्तं पुराणं ब्रह्मणा स्वयम्।<br>तदेकादशसाहस्रं फाल्गुन्यां यः प्रयच्छति।<br>तिलधेनुसमायुक्तं स याति शिवसाम्यताम्॥ ३७ | जिसमें कल्पान्तके समय अग्निका आश्रय लेकर देवाधिदेव महेश्वरने अग्निलिङ्गके मध्यमें स्थित रहते हुए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारोंकी प्राप्तिके लिये उपदेश दिया है, उस पुराणको स्वयं ब्रह्माने (एकादश) लैङ्ग (लिङ्ग)-पुराण नामसे अभिहित किया है। उसमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। जो मानव फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको तिलधेनुसहित इस पुराणका दान करता है, वह शिवजीकी साम्यताको प्राप्त कर लेता है। | | महावराहस्य पुनर्माहात्म्यमधिकृत्य च।<br>विष्णुनाभिहितं क्षोण्यै तद्वाराहमिहोच्यते॥ ३८<br>मानवस्य प्रसङ्गेन कल्पस्य मुनिसत्तमाः।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि तत्पुराणमिहोच्यते॥ ३९<br>काञ्चनं गरुडं कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां मधौ दद्याद् ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>वराहस्य प्रसादेन पदमाप्नोति वैष्णवम्॥ ४० | मुनिवरो! जिसमें मानककल्पके प्रसङ्गवश पुनः महावराहके माहात्म्यका आश्रय लेकर भगवान् विष्णुने पृथ्वीके प्रति उपदेश दिया है, उसे भूतलपर (द्वादश) वराहपुराण कहते हैं। उस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है। जो मनुष्य गरुड़की सोनेकी मूर्ति बनवाकर उस मूर्ति तथा तिल-धेनुके साथ इस पुराणका चैत्रमासकी पूर्णिमा तिथिको कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह वराहभगवान्की कृपासे विष्णुपदको प्राप्त कर लेता है। |


* यह ज्योतिष्टोमका एक अङ्ग है।