मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ५४ * | २२१ |
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| पुरातनस्य कल्पस्य पुराणानि विदुर्बुधाः।<br>धन्यं यशस्यमायुष्यं पुराणानामनुक्रमम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि स याति परमां गतिम्॥ ७२<br>इदं पवित्रं यशसो निधान-<br> मिदं पितृणामतिवल्लभं च।<br>इदं च देवेष्वमृतायितं च<br> नित्यं त्विदं पापहरं च पुंसाम्॥ ७३* | विद्वान्लोग इन पुराणोंको पुरातन कल्पकी कथाएँ मानते हैं। इन पुराणोंका अनुक्रम धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम गतिको प्राप्त हो जाता है। यह परम पवित्र और यशका खजाना है। यह पितरोंको परम प्रिय है। यह देवताओंमें अमृतके समान प्रतिष्ठित है और नित्य मनुष्योंके पापका हरण करनेवाला है॥ ६७—७३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पुराणानुक्रमणिकाभिधानं नाम त्रिपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पुराणानुक्रमणिकाभिधान नामक तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५३॥
चौवनवाँ अध्याय
नक्षत्र-पुरुष-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके बाद अब मैं व्रत और उपवाससे समन्वित सभी दान-धर्मोंका पूर्णरूपसे उसी प्रकार वर्णन कर रहा हूँ, जैसे इस मृत्युलोकमें मत्स्यभगवान्ने मनुके प्रति किया था। इसी प्रकार महादेवजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके संवादमें धर्म, काम और अर्थको सिद्ध करनेवाला जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे भी बतला रहा हूँ। पूर्वकालकी बात है, एक बार भगवान् शङ्कर, जो तीन नेत्रोंसे युक्त, कामदेवके शत्रु और कामदेवके शरीरको दग्ध कर देनेवाले हैं, कैलास पर्वतके शिखरपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उसी समय देवर्षि नारदने उनके पास जाकर ऐसा प्रश्न किया॥ १—३॥ |
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि दानधर्मानशेषतः।<br>व्रतोपवाससंयुक्तान् यथा मत्स्योदितानिह॥ १<br><br>महादेवस्य संवादे नारदस्य च धीमतः।<br>यथावृत्तं प्रवक्ष्यामि धर्मकामार्थसाधकम्॥ २<br><br>कैलासशिखरासीनमपृच्छन्नारदः पुरा।<br>त्रिनयनमनङ्गारिमनङ्गाङ्गहरं हरम्॥ ३ | |
| नारद उवाच | **नारदजीने पूछा—**भगवन्! आप तो देवेश्वरोंके भी देव तथा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रके अधीश्वर हैं, इसलिये यह बताइये कि आपका अथवा भगवान् विष्णुका भक्त पुरुष किस प्रकार धन-सम्पत्ति, नीरोगता, सौन्दर्य, आयु, भाग्य और सौभाग्यरूपी सम्पत्तिसे सम्पन्न हो सकता है? अथवा विधवा स्त्री (जन्मान्तरमें) किस प्रकार समस्त गुणों एवं सौभाग्यसे संयुक्त हो सकती है? तथा देव! इस लोकमें कोई अन्य मुक्तिदायक व्रत हो तो क्रमशः उसे भी बतलाइये॥ ४-५॥ |
| भगवन् देवदेवेश ब्रह्मविष्ण्विन्द्रनायक।<br>श्रीमदारोग्यरूपायुर्भाग्यसौभाग्यसम्पदा ।<br>संयुक्तस्तव विष्णोर्वा पुमान् भक्तः कथं भवेत्॥ ४<br><br>नारी वा विधवा सर्वगुणसौभाग्यसंयुता।<br>क्रमान्मुक्तिप्रदं देव किञ्चिद् व्रतामिहोच्यताम्॥ ५ |
* पुराण-संख्या-निर्देश-दाननिरूपणादि प्रायः अठारह पुराणोंमें ही वर्णित है। पर यहाँ तथा नारदपुराण ९१—१०८में यह कुछ विस्तारसे निरूपित है। गीतामें ब्रह्मसूत्रका, ब्रह्मसूत्रमें गीताका, पुराणोंमें महाभारतका तथा परस्पर एक-दूसरेका एवं महाभारतमें पुराणोंका ठीक-ठीक वर्णन व्यासजीके अद्भुत दिव्य ज्ञान एवं वैदुष्यका ही चमत्कार है।