मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २२२ | * मत्स्यपुराण * |
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| ईश्वर उवाच<br><br>सम्यक् पृष्टं त्वया ब्रह्मन् सर्वलोकहितावहम् ।<br>श्रुतमप्यत्र यच्छान्त्यै तद् व्रतं शृणु नारद ॥ ६<br><br>नक्षत्रपुरुषं नाम व्रतं नारायणात्मकम् ।<br>पादादि कुर्याद् शीर्षान्तं विष्णुनामानुकीर्तनम् ॥ ७<br><br>प्रतिमां वासुदेवस्य मूलर्क्षादिषु चार्चयेत् ।<br>चैत्रमासं समासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ८<br><br>मूले नमो विश्वधराय पादौ<br>गुल्फावनन्ताय च रोहिणीषु ।<br>जङ्घेऽभिपूज्ये वरदाय चैव<br>द्वे जानुनी चाश्विकुमारऋक्षे ॥ ९<br><br>पूर्वोत्तराषाढयुगे तथोरू<br>नमः शिवायत्यभिपूजनीयौ ।<br>पूर्वोत्तराफल्गुनियुग्मके च<br>मेढ्रं नमः पञ्चशराय पूज्यम् ॥ १०<br><br>कटिं नमः शार्ङ्गधराय विष्णोः<br>सम्पूजयेन्नारद कृत्तिकासु ।<br>तथार्चयेद् भाद्रपदाद्वये च<br>पार्श्वे नमः केशिनिषूदनाय ॥ ११<br><br>कुक्षिद्वयं नारद रेवतीषु<br>दामोदरायेत्यभिपूजनीयम् ।<br>ऋक्षेऽनुराधासु च माधवाय<br>नमस्तथोरःस्थलमेव पूज्यम् ॥ १२<br><br>पृष्ठं धनिष्ठासु च पूजनीय-<br>मघौघविध्वंसकराय तच्च ।<br>श्रीशङ्खचक्रासिगदाधराय<br>नमो विशाखासु भुजाश्च पूज्याः ॥ १३ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! आपने तो बड़ा उत्तम प्रश्न किया, यह तो समस्त लोकोंके लिये हितकारी है। नारद! जो सुननेमात्रसे शान्ति प्रदान करनेवाला है, वह व्रत मैं बतला रहा हूँ, सुनो। नक्षत्रपुरुष* नामक एक व्रत है, जो भगवान् नारायणका स्वरूप ही है। इस व्रतमें चैत्रमास आनेपर भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करते हुए विधिपूर्वक चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्तकी एक विष्णुकी मूर्ति बनावे। फिर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर मूल आदि नक्षत्रोंमें क्रमशः भगवान् विष्णुकी उस प्रतिमाका पूजन करे। मूल-नक्षत्रमें 'विश्वधराय नमः'—'विश्वके धारकको नमस्कार है'—यों कहकर दोनों चरणोंकी, रोहिणी नक्षत्रमें 'अनन्ताय नमः'—'अनन्तको प्रणाम है'—कहकर दोनों गुल्फोंकी तथा अश्विनी नक्षत्रमें 'वरदाय नमः'—'वरदाताको अभिवादन है'—कहकर दोनों जानुओं और दोनों जङ्घाओंकी पूजा करे। पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ नक्षत्रोंमें 'शिवाय नमः'—'शिवजीको नमस्कार है'—कहकर दोनों ऊरुओंकी पूजा करे। पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रोंमें 'पञ्चशराय नमः'—'पाँच बाण धारण करनेवालेको प्रणाम है'—कहकर जननेन्द्रियकी पूजा करे। नारद! कृत्तिकानक्षत्रमें 'शार्ङ्गधराय नमः'—'शार्ङ्ग-धनुष धारण करनेवालेको अभिवादन है'—कहकर भगवान् विष्णुकी कटिका पूजन करे। इसी प्रकार पूर्वभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद नक्षत्रोंमें 'केशिनिषूदनाय नमः'—'केशी नामक असुरके संहारकको नमस्कार है'—कहकर दोनों पार्श्वभागोंकी पूजा करे। नारद! रेवती नक्षत्रमें 'दामोदराय नमः'—'दामोदरको प्रणाम है'—कहकर दोनों कुक्षियोंकी पूजा करनी चाहिये। अनुराधा नक्षत्रमें 'माधवाय नमः'—'माधव (लक्ष्मीके प्राणपति)-को अभिवादन है'—कहकर वक्षःस्थलकी पूजा करे। धनिष्ठा नक्षत्रमें 'अघौघविध्वंसकराय नमः'—'पापसमूहके विनाशकको नमस्कार है'—कहकर पृष्ठभागकी पूजा करनी चाहिये। विशाखा नक्षत्रमें 'श्रीशङ्खचक्रासिगदाधराय नमः'—'लक्ष्मी, शङ्ख, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवालेको प्रणाम है'—कहकर भुजाओंका पूजन करना चाहिये॥ ६—१३॥ |
* वामनपुराण अध्याय ८० के 'नक्षत्रपुरुष' व्रतमें भी प्रायः ये ही बातें स्वल्पान्तरसे आयी हैं। वहाँ पूजाके मन्त्र नहीं, पर दोहदपदार्थ—अभिलषित पदार्थ उपदिष्ट हैं। इस अर्चामें नक्षत्रक्रमसे नहीं, अङ्गक्रमसे निर्दिष्ट हैं। यह अद्भुत बात है।