भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 1098 में से

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* मत्स्यपुराण *

| पूर्णं व्रते सर्वगुणान्विताय<br>वाग्रूपशीलाय च सामगाय।<br>हैमीं विशालायतबाहुदण्डां<br>मुक्ताफलेन्दूपलवज्रयुक्ताम् ॥ २१<br>जलस्य पूर्णे कलशे निविष्टा-<br>मर्चां हरेर्वस्त्रगवा सहैव।<br>शय्यां तथोपस्करभाजनादि-<br>युक्तां प्रदद्याद् द्विजपुङ्गवाय ॥ २२<br>यद्यस्ति यत्किञ्चिदिहास्ति देयं<br>दद्याद् द्विजायात्महिताय सर्वम्।<br>मनोरथं नः सफलीकुरुष्व<br>हिरण्यगर्भाच्युतरूद्ररूपिन् ॥ २३<br>सलक्ष्मीकं सभार्याय काञ्चनं पुरुषोत्तमम्।<br>शय्यां च दद्यान्मन्त्रेण ग्रन्थिभेदविवर्जिताम् ॥ २४<br>यथा न विष्णुभक्तानां वृजिनं जायते क्वचित्।<br>तथा सुरूपताऽऽरोग्यं केशवे भक्तिमुत्तमाम् ॥ २५<br>यथा न लक्ष्म्या शयनं तव शून्यं जनार्दन।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु कृष्ण जन्मनि जन्मनि ॥ २६<br>एवं निवेद्य तत् सर्वं वस्त्रमाल्यानुलेपनम्।<br>नक्षत्रपुरुषज्ञाय विप्रायथ विसर्जयेत् ॥ २७<br>भुञ्जीतातैललवणं सर्वर्क्षेष्वप्युपोषितः।<br>भोजनं च यथाशक्ति वित्तशाठ्यं विवर्जयेत् ॥ २८<br>इति नक्षत्रपुरुषमुपास्य विधिवत् स्वयम्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते ॥ २९<br>ब्रह्महत्यादिकं किञ्चिदिह वामुत्र वा कृतम्।<br>आत्मना वाथ पितृभिस्तत् सर्वं क्षयमाप्नुयात् ॥ ३०<br>इति पठति शृणोति यश्च भक्त्या<br>पुरुषवरो व्रतमङ्गनाथ कुर्यात्।<br>कलिकलुषविदारणं मुरारेः<br>सकलविभूतिफलप्रदं च पुंसां ॥ ३१ | इस प्रकार व्रतके समाप्त होनेपर जो सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न, वक्ता, सौन्दर्यशाली, सुशील और सामवेदका ज्ञाता हो, ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मणको उस स्वर्णनिर्मित एवं मुक्ताफल, चन्द्रकान्त-मणि और हीरेसे खचित जलपूर्ण कलशमें रखी हुई विशाल एवं लम्बी भुजाओंवाली श्रीहरिकी अर्चा-मूर्तिका वस्त्र और गौके साथ दान कर देना चाहिये। साथ ही पात्र आदि सभी सामग्रियोंसे युक्त शय्याका भी दान करना चाहिये। इस प्रकार उस समय अपने पास जो कुछ भी दान देनेयोग्य वस्तु हो, वह सब अपने कल्याणके लिये उस ब्राह्मणको दान कर दे और उससे यों प्रार्थना करे—'ब्रह्मा, विष्णु और शिवस्वरूप द्विजवर ! आप हमारे मनोरथको सफल कीजिये।' स्वर्णनिर्मित लक्ष्मीसहित पुरुषोत्तमभगवान्की मूर्तिका तथा ग्रन्थिभेदरहित शय्याका मन्त्रोच्चारणपूर्वक सपत्नीक ब्राह्मणको दान करनेका विधान है। उस समय ऐसी प्रार्थना करे—'भगवन् ! जैसे विष्णु-भक्तोंको कहीं भी कष्ट नहीं प्राप्त होता, वैसे ही मुझे भी (आपकी कृपासे) सुन्दर रूप, नीरोगता और आप-भगवान् केशवके प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो। जनार्दन ! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, श्रीकृष्ण ! वैसे ही मेरी भी शय्या प्रत्येक जन्ममें अशून्य बनी रहे।' इस प्रकार निवेदन कर वस्त्र, माला, चन्दन आदि सभी वस्तुएँ नक्षत्रपुरुष-व्रतके ज्ञाता ब्राह्मणको देकर व्रतका विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार सभी नक्षत्रोंमें उपवास करके एक बार तेल और नमकरहित भोजन करनेका विधान है। वह भोजन शक्तिके अनुसार उपयुक्त होना चाहिये। उसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार स्वयं विधिपूर्वक नक्षत्रपुरुषकी उपासना करके मनुष्य इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और मृत्युके पश्चात् विष्णुलोकमें पूजित होता है। साथ ही इहलोक अथवा परलोकमें अपने अथवा पितरोंद्वारा जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप घटित हुए रहते हैं, वे सभी नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अथवा स्त्री—जो कोई भी हो, उसे इस व्रतका पठन, श्रवण और अनुष्ठान करना चाहिये। भगवान् मुरारिका यह व्रत कलिके प्रभावसे घटित हुए पापोंको विदीर्ण करनेवाला और समस्त विभूतियोंके फलका प्रदाता है॥ २१—३१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नक्षत्रपुरुषव्रतं नाम चतुःपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नक्षत्रपुरुष-व्रत नामक चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥

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