भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३२* मत्स्यपुराण *

| मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृतम्।<br>क्षीरकुम्भोपरि पुनः कांस्यपात्राक्षतान्वितम्।<br>दद्यान्मन्त्रेण पूर्वाह्ने शालीक्षुफलसंयुतम्॥ २०<br><br>श्वेतामथ सुवर्णास्यां खुरै रौप्यैः समन्विताम्।<br>सवस्त्रभाजनां धेनुं तथा शङ्खं च शोभनम्॥ २१<br><br>भूषणैर्द्विजदाम्पत्यमलङ्कृत्य गुणान्वितम्।<br>चन्द्रोऽयं द्विजरूपेण सभार्य इति कल्पयेत्॥ २२<br><br>यथा न रोहिणी कृष्ण शय्यां सन्त्यज्य गच्छति।<br>सोमरूपस्य ते तद्वन्ममाभेदोऽस्तु भूतिभिः॥ २३<br><br>यथा त्वमेव सर्वेषां परमानन्दमुक्तिदः।<br>भुक्तिर्मुक्तिस्तथा भक्तिस्त्वयि चन्द्रास्तु ते सदा॥ २४<br><br>इति संसारभीतस्य मुक्तिकामस्य चानघ।<br>रूपारोग्यायुषामेतद्विधायकमनुत्तमम् ॥ २५<br><br>इदमेव पितॄणां च सर्वदा वल्लभं मुने।<br>त्रैलोक्याधिपतिर्भूत्वा सप्तकल्पशतत्रयम्।<br>चन्द्रलोकमवाप्नोति विद्युद् भूत्वा विमुच्यते॥ २६<br><br>नारी वा रोहिणीचन्द्रशयनं या समाचरेत्।<br>सापि तत्फलमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ २७<br><br>इति पठति शृणोति वा य इत्थं<br>मधुमथनार्चनमिन्दुकीर्तने नित्यम्।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि<br>शौरेर्भवनगतः परिपूज्यतेऽमरौघैः॥ २८ | आठ मोतियोंसे युक्त तथा दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित उन प्रतिमाओंको अक्षतसे भरे हुए काँसेके पात्रमें रखकर दुग्धपूर्ण कलशके ऊपर स्थापित कर दे और पूर्वाह्नके समय अगहनी चावल, ईख और फलके साथ उसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान कर दे। फिर जिसका मुख (थुथन) सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों, ऐसी वस्त्र और दोहिनीके साथ दूध देनेवाली श्वेत रंगकी गौ तथा सुन्दर शङ्ख प्रस्तुत करे। फिर उत्तम गुणोंसे युक्त ब्राह्मण-दम्पतिको बुलाकर उन्हें आभूषणोंसे अलङ्कृत करे तथा मनमें यह भावना रखे कि ब्राह्मण-दम्पतिके रूपमें ये रोहिणीसहित चन्द्रमा ही विराजमान हैं। तत्पश्चात् इनकी इस प्रकार प्रार्थना करे—‘श्रीकृष्ण! जिस प्रकार रोहिणी देवी चन्द्रस्वरूप आपकी शय्याको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाती हैं, उसी तरह मेरा भी इन विभूतियोंसे कभी विछोह न हो। चन्द्रदेव! आप ही सबको परम आनन्द और मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं। आपकी कृपासे मुझे भोग और मोक्ष—दोनों प्राप्त हों तथा आपमें मेरी सदा अनन्य भक्ति बनी रहे।' (इस प्रकार विनय कर शय्या, प्रतिमा तथा धेनु आदि सब कुछ ब्राह्मणको दान कर दे।) ॥ १८—२४॥<br><br>निष्पाप नारद! जो संसारसे भयभीत होकर मोक्ष पानेकी इच्छा रखता है, उसके लिये यही एक व्रत सर्वोत्तम है। यह रूप, आरोग्य और आयु प्रदान करनेवाला है। मुने! यही पितरोंको सर्वदा प्रिय है। जो पुरुष इसका अनुष्ठान करता है, वह त्रिभुवनका अधिपति होकर इक्कीस सौ कल्पोंतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। उसके बाद विद्युत् होकर मुक्त हो जाता है। अथवा जो स्त्री इस रोहिणीचन्द्रशयन नामक व्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी उसी पूर्वोक्त फलको प्राप्त होती है। साथ ही वह आवागमनसे मुक्त हो जाती है। चन्द्रमाके नामकीर्तनद्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनकी पूजाका यह प्रसङ्ग जो नित्य पढ़ता अथवा सुनता है, उसे भगवान् उत्तम बुद्धि प्रदान करते हैं तथा वह भगवान् श्रीविष्णुके धाममें जाकर देवसमूहके द्वारा पूजित होता है॥ २५—२८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे रोहिणीचन्द्रशयनव्रतं नाम सप्तपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रोहिणीचन्द्रशयन-व्रत नामक सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥