भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243
* अध्याय ५८ *२३३

अठ्ठावनवाँ अध्याय

तालाब, बगीचा, कुआँ, बावली, पुष्करिणी तथा देवमन्दिरकी प्रतिष्ठा आदिका विधान

| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! सूर्यपुत्र मनुने जलाशयके भीतर अवस्थित मत्स्यरूपधारी भगवान् विष्णुसे पूछा—'देवेश! अब मैं आपसे तालाब, बगीचा, कुआँ, बावली, पुष्करिणी तथा देवमन्दिरकी प्रतिष्ठा आदिकी विधि पूछ रहा हूँ। नाथ! इन कार्योंमें ऋत्विज् कैसे होने चाहिये? वेदी किस प्रकारकी बनती है? दक्षिणाका प्रमाण कितना होता है? समय कौन-सा उत्तम होता है? स्थान कैसा होना चाहिये? आचार्य किन-किन गुणोंसे युक्त हों तथा कौन-से पदार्थ प्रशस्त माने गये हैं—यह सब हमें यथार्थरूपसे बतलाइये॥ १—३॥ | | जलाशयगतं विष्णुमुवाच रविनन्दनः।<br>तडागारामकूपानां वापीषु नलिनीषु च॥ १<br>विधिं¹ पृच्छामि देवेश देवतायतनेषु च।<br>के तत्र चर्त्विजो नाथ वेदी वा कीदृशी भवेत्॥ २<br>दक्षिणावलयः कालः स्थानमाचार्य एव च।<br>द्रव्याणि कानि शस्तानि सर्वमाचक्ष्व तत्त्वतः॥ ३ | | | मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा—महाबाहु राजन्! सुनो; तालाब आदिकी प्रतिष्ठाका जो विधान है, उसका वेदवक्ताओंने पुराणोंमें इस रूपमें वर्णन किया है। उत्तरायण आनेपर शुभ शुक्लपक्षमें ब्राह्मणद्वारा कोई पवित्र दिन निश्चित करा ले। उस दिन ब्राह्मणोंका वरण करे और तालाबके समीप, जहाँकी भूमि पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू हो, चार हाथ लम्बी और उतनी ही चौड़ी चौकोर सुन्दर वेदी बनाये। वेदी सब ओर समतल हो और उसका मुख चारों दिशाओंमें हो। फिर सोलह हाथका मण्डप तैयार कराये, जिसके चारों ओर एक-एक दरवाजा हो। वेदीके सब ओर कुण्डोंका निर्माण कराये। नृप-नन्दन! कुण्डोंकी संख्या नौ, सात या पाँच होनी चाहिये, इससे कम-बेशी नहीं। कुण्डोंकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक अरत्नि²की हो तथा वे सभी तीन-तीन मेखलाओंसे सुशोभित हों। उनमें यथास्थान योनि और मुख भी बने होने चाहिये। योनिकी लम्बाई एक बित्ता और चौड़ाई छः-सात अङ्गुलकी हो तथा कुण्डकी गहराई एक हाथ, मेखलाएँ तीन पर्व³ ऊँची होनी चाहिये। ये चारों ओरसे एक समान—एक रंगकी बनी हों। सबके समीप ध्वजा और पताकाएँ लगायी जायें। | | शृणु राजन् महाबाहो तडागादिषु यो विधिः।<br>पुराणेष्वितिहासोऽयं पठ्यते वेदवादिभिः॥ ४<br>प्राप्य पक्षं शुभं शुक्लं सम्प्राप्ते चोत्तरायणे।<br>पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्॥ ५<br>प्रागुदक्प्रवणे देशे तडागस्य समीपतः।<br>चतुर्हस्तां शुभां वेदीं चतुरस्त्रां चतुर्मुखाम्॥ ६<br>तथा षोडशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।<br>वेद्याश्च परितो गर्ता रत्निमात्रास्त्रिमेखलाः॥ ७<br>नव सप्ताथ वा पञ्च नातिरिक्ता नृपात्मज।<br>वितस्तिमात्रा योनिः स्यात् षट्सप्ताङ्गुलिविस्तृता॥ ८<br>गर्त्ताश्च हस्तमात्राः स्युस्त्रिपर्वोच्छ्रितमेखलाः।<br>सर्वतस्तु सवर्णाः स्युः पताकाध्वजसंयुताः॥ ९ | |


१. इसकी पूरी विस्तृत विधि भविष्यपुराण, मध्यमपर्व भाग ३, अध्याय २०, (अग्निपुराण ६४) एवं प्रतिष्ठामहोदधि, प्रतिष्ठाकल्पलता, प्रतिष्ठातत्त्वादर्श आदिमें है। पद्म० सृष्टिखं० २७ की विधि तो ठीक इसी प्रकार है। भविष्यपुराणमें प्रायः १ हजार श्लोक हैं। इस अध्यायमें कुण्ड-मण्डप-वेदी-निर्माणसहित यज्ञकी भी संक्षिप्त विधि आ गयी है। इसकी विस्तृत जानकारीके लिये कुण्ड-मण्डप-सिद्धि तथा आह्निकसूत्रावली आदि द्रष्टव्य हैं।
२. कोहनीसे लेकर मुट्ठी बँधे हुए हाथतककी लम्बाईको 'रत्नि' या अरत्नि कहते हैं।
३. अङ्गुलियोंके पोरको 'पर्व' कहते हैं।

मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 243, कुल 1098 में से · BharatKosha