मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ५८ * २३७
| आथर्वणेन संस्नातां पुनर्मामेत्यथेति च।<br>आपो हि ष्ठेति मन्त्रेण क्षिप्त्वाऽऽगत्य च मण्डपम्॥ ४६ | 'पुनर्मामेति०' तथा 'आपो हि ष्ठा मयो०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा उसे जलमें डालकर पुनः सब लोग यज्ञमण्डपमें आ जायँ और यजमान सदस्योंकी पूजा |
| पूजयित्वा सदस्यांस्तु बलिं दद्यात् समन्ततः।<br>पुनर्दिनानि होतव्यं चत्वारि मुनिसत्तमाः॥ ४७ | कर सब ओर देवताओंके उद्देश्यसे बलि अर्पण करे। इसके बाद लगातार चार दिनोंतक हवन होना चाहिये। |
| चतुर्थीकर्म कर्तव्यं देया तत्रापि शक्तितः।<br>दक्षिणा राजशार्दूल वरुणक्षमापणं ततः॥ ४८ | राजसिंह! चौथे दिन चतुर्थी-कर्म करना उचित है। उसमें भी यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। तदनन्तर वरुणसे क्षमा-प्रार्थना करके यज्ञ-सम्बन्धी जितने पात्र और |
| कृत्वा तु यज्ञपात्राणि यज्ञोपकरणानि च।<br>ऋत्विग्भ्यस्तु समं दत्त्वा मण्डपं विभजेत् पुनः।<br>हेमपात्रीं च शय्यां च स्थापकाय निवेदयेत्॥ ४९ | सामग्री हों, उन्हें ऋत्विजोंमें बराबर बाँट देना चाहिये। फिर मण्डपको भी विभाजित करे। सुवर्णपात्र और शय्या व्रतारम्भ करानेवाले ब्राह्मणको दान कर दे। इसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, एक सौ आठ, |
| ततः सहस्रं विप्राणामथवाष्टशतं तथा।<br>भोजनीयं यथाशक्ति पञ्चाशद् वाथ विंशतिः।<br>एवमेष पुराणेषु तडागविधिरुच्यते॥ ५० | पचास अथवा बीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। पुराणों (एवं कल्पसूत्रों)-में तालाबकी प्रतिष्ठाके लिये यही विधि बतलायी गयी है। सभी कुआँ, बावली और |
| कूपवापीषु सर्वासु तथा पुष्करिणीषु च।<br>एष एव विधिर्दृष्टः प्रतिष्ठासु तथैव च॥ ५१ | पुष्करिणीके लिये भी यही विधि है। देवताओंकी प्रतिष्ठामें भी ऐसा ही विधान समझना चाहिये। प्रासाद (महल अथवा मन्दिर) और बगीचे आदिके प्रतिष्ठा-कार्यमें केवल (कुछ) मन्त्रोंका ही भेद है। विधि-विधान प्रायः एक-से ही हैं। उपर्युक्त विधिकायदि |
| मन्त्रतस्तु विशेषः स्यात् प्रासादोद्यानभूमिषु।<br>अयं त्वशक्तावर्धेन विधिर्दृष्टः स्वयम्भुवा।<br>अल्पे त्वेकाग्निवत् कृत्वा वित्तशाठ्यादृते नृणाम्॥ ५२ | पूर्णतया पालन करनेकी शक्ति न हो तो आधे व्ययसे भी यह कार्य सम्पन्न हो सकता है। यह बात ब्रह्माजीने कही है। किंतु इस अल्प विधानमें भी मनुष्यको कृपणताका त्याग कर एकाग्नि ब्राह्मणकी भाँति दान आदि करना चाहिये॥ ४०-५२॥ |
| प्रावृट्काले स्थिते तोये ह्यग्निष्टोमफलं स्मृतम्।<br>शरत्काले स्थितं यत् स्यात्तदुक्तफलदायकम्।<br>वाजपेयातिरात्राभ्यां हेमन्ते शिशिरे स्थितम्॥ ५३ | जिस पोखरेमें केवल वर्षाकालमें ही जल रहता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञके बराबर फल देनेवाला होता है। जिसमें शरत्कालतक जल रहता हो, उसका भी यही फल है। हेमन्त और शिशिरकालतक रहनेवाला जल |
| अश्वमेधसमं प्राह वसन्तसमये स्थितम्।<br>ग्रीष्मेऽपि तत्स्थितं तोयं राजसूयाद् विशिष्यते॥ ५४ | क्रमशः वाजपेय और अतिरात्र नामक यज्ञका फल देता है। वसन्तकालतक टिकनेवाले जलको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाया गया है तथा जो जल ग्रीष्मकालतक वर्तमान रहता है, वह राजसूय-यज्ञसे भी अधिक फल देनेवाला होता है॥ ५३-५४॥ |
| एतान् महाराज विशेषधर्मान्<br>करोति योऽप्यागमशुद्धबुद्धिः।<br>स याति रुद्रालयमाशु पूतः<br>कल्पाननेकान् दिवि मोदते च॥ ५५ | महाराज! जो मनुष्य पृथ्वीपर इन विशेष धर्मोंका पालन करता है, वह शुद्धचित्त होकर शिवजीके लोकमें जाता है और वहाँ अनेक कल्पोंतक दिव्य आनन्दका अनुभव करता है। |