मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २३८ | * मत्स्यपुराण * |
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| अनेकलोकान् स महत्तमादीन्<br>भुक्त्वा परार्धद्वयमङ्गनाभिः।<br>सहैव विष्णोः परमं पदं यत्<br>प्राप्नोति तद्योगबलेन भूयः॥ ५६ | वह पुनः परार्ध (ब्रह्माजीकी पिछली आधी आयु)-तक देवाङ्गनाओंके साथ अनेक महत्तम लोकोंका सुख भोगनेके पश्चात् ब्रह्माजीके साथ ही योगबलसे श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तडागविधिर्नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तडागविधि नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५८॥
उनसठवाँ अध्याय
वृक्ष लगानेकी विधि
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
|---|---|
| पादपानां विधिं सूत यथावद् विस्तराद् वद।<br>विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्यापनं बुधैः।<br>ये च लोकाः स्मृतास्तेषां तानिदानीं वदस्व नः॥ १ | सूतजी! अब आप हमें विस्तारके साथ वृक्ष लगानेकी यथार्थ विधि बतलाइये। विद्वानोंको किस विधिसे वृक्ष लगाने चाहिये तथा वृक्षारोपण करनेवालोंके लिये जिन लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, उन्हें भी आप इस समय हमलोगोंको बतलाइये॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
| पादपानां विधिं वक्ष्ये तथैवोद्यानभूमिषु।<br>तडागविधिवत् सर्वमासाद्य जगदीश्वर॥ २ | [यही प्रश्न जब मनुने मत्स्य-भगवान्से किया था तो इसे उनसे मत्स्य (भगवान्)-ने कहा था।] जगदीश्वर! मैं बगीचेमें वृक्षोंके लगानेकी विधि तुम्हें बतलाता हूँ। तड़ागकी प्रतिष्ठाके विषयमें जो विधान बतलाया गया है, उसीके समान सारी विधि समझनी चाहिये। |
| ऋत्विङ्मण्डपसम्भारमाचार्यं चैव तद्विधम्।<br>पूजयेद् ब्राह्मणांस्तद्वद्धेमवस्त्रानुलेपनैः॥ ३ | इसमें भी ऋत्विज्, मण्डप, सामग्री और आचार्यको पूर्ववत् रखे। उसी प्रकार सुवर्ण, वस्त्र और चन्दनद्वारा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। |
| सर्वौषध्युदकैः सिक्तान् दध्यक्षतविभूषितान्।<br>वृक्षान् माल्यैरलङ्कृत्य वासोभिरभिवेष्टयेत्॥ ४ | रोपे गये पौधोंको सर्वौषधिमिश्रित जलसे सींचे। फिर उनके ऊपर दही और अक्षत छोड़े। उसके बाद उन्हें पुष्पमालाओंसे अलंकृत कर वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। |
| सूच्या सौवर्णया कार्यं सर्वेषां कर्णवेधनम्।<br>अञ्जनं चापि दातव्यं तद्धेमशलाकया॥ ५ | सोनेकी सूईसे सबका कर्णवेध करे। उसी प्रकार सोनेकी सलाईसे अञ्जन भी लगाना चाहिये। |
| फलानि सप्त चाष्टौ वा कलधौतानि कारयेत्।<br>प्रत्येकं सर्ववृक्षाणां वेद्यां तान्यधिवासयेत्॥ ६ | सात अथवा आठ सुवर्णके फल बनवावे, फिर इन फलोंके साथ सभी वृक्षोंको वेदीपर स्थापित कर दे। |
| धूपोऽत्र गुग्गुलः श्रेष्ठस्ताम्रापात्रैरधिष्ठितान्।<br>सर्वान् धान्यस्थितान् कृत्वा वस्त्रगन्धानुलेपनैः॥ ७ | वहाँ गुग्गुलका धूप देना श्रेष्ठ माना गया है। वृक्षोंको पृथक्-पृथक् ताम्रपात्रमें रखकर उन्हें सप्तधान्यसे आवृत करे तथा उनके ऊपर वस्त्र और चन्दन चढ़ाये। |
| कुम्भान् सर्वेषु वृक्षेषु स्थापयित्वा नरेश्वर।<br>सहिरण्यानशेषांस्तान् कृत्वा बलिनिवेदनम्॥ ८ | नरेश्वर! फिर प्रत्येक वृक्षके पास कलश-स्थापन करके उन सभी कलशोंमें स्वर्ण-खण्ड डाले, फिर बलि प्रदान करके उनकी पूजा करे। |