भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 249
* अध्याय ५९ *२३९
यथास्वं लोकपालानामिन्द्रादीनां विशेषतः।<br>वनस्पतेश्च विद्वद्भिर्होमः कार्यो द्विजातिभिः ॥ ९<br>ततः शुक्लाम्बरधरां सौवर्णकृतभूषणाम् ।<br>सकांस्यदोहां सौवर्णशृङ्गाभ्यामतिशालिनीम्।<br>पयस्विनीं वृक्षमध्यादुत्सृजेद् गामुदङ्मुखीम्॥ १०<br>ततोऽभिषेकमन्त्रेण वाद्यमङ्गलगीतकैः।<br>ऋग्यजुःसाममन्त्रैश्च वारुणैरभितस्तथा।<br>तैरेव कुम्भैः स्नपनं कुर्युर्ब्राह्मण पुङ्गवाः ॥ ११<br>स्नातः शुक्लाम्बरस्तद्वद् यजमानोऽभिपूजयेत् ।<br>गोभिर्विभवतः सर्वानृत्विजस्तान् समाहितः ॥ १२<br>हेमसूत्रैः सकटकैरङ्गुलीयपवित्रकैः ।<br>वासोभिः शयनीयैश्च तथोपस्करपादुकैः।<br>क्षीरेण भोजनं दद्याद् यावद्दिनचतुष्टयम् ॥ १३<br>होमश्च सर्षपैः कार्यो यवैः कृष्णतिलैस्तथा।<br>पलाशसमिधः शस्तास्तृतीयेऽह्नि तथोत्सवः ।<br>दक्षिणा च पुनस्तद्वद् देया तत्रापि शक्तितः ॥ १४<br>यद् यदिष्टतमं किञ्चित् तत्तद् दद्यादमत्सरी।<br>आचार्ये द्विगुणं दद्यात् प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥ १५रातमें विद्वान् द्विजातियोंद्वारा इन्द्रादि लोकपालों तथा वनस्पतिके निमित्त वित्तानुसार हवन कराये। तदनन्तर दूध देनेवाली एक गौको लाकर उसे श्वेत वस्त्र ओढ़ाये। उसके मस्तकपर सोनेकी कँलगी लगाये, सींगोंको सोनेसे मँढ़ा दे। उसको दूहनेके लिये काँसेकी दोहनी प्रस्तुत करे। इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न उस गौको उत्तराभिमुख खड़ी करके वृक्षोंके बीचसे छोड़े। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मण बाजों और मङ्गलगीतोंकी ध्वनिके साथ अभिषेकके मन्त्र—तीनों वेदोंकी वरुणसम्बन्धिनी ऋचाएँ पढ़ते हुए उक्त कलशोंके जलसे यजमानका अभिषेक करें। अभिषेकके पश्चात् यज्ञकर्ता पुरुष श्वेत वस्त्र धारण करे और अपनी सामर्थ्यके अनुसार सावधानीपूर्वक गौ, सोनेकी जंजीर, कड़े, अँगूठी, पवित्री, वस्त्र, शय्या शय्योपयोगी सामान तथा चरणपादुका देकर सम्पूर्ण ऋत्विजोंका पूजन करे। इसके बाद चार दिनोंतक उन्हें दूधके साथ भोजन कराये तथा सरसोंके दाने, जौ और काले तिलोंसे होम कराये। होममें पलाश (ढाक) की लकड़ी उत्तम मानी गयी है। वृक्षारोपणके पश्चात् चौथे दिन विशेष उत्सव करे। उसमें भी अपनी शक्तिके अनुसार पुनः उसी प्रकार दक्षिणा दे। जो-जो वस्तु अपनेको अधिक प्रिय हो, ईर्ष्या छोड़कर उस-उसका दान करे। आचार्यको दूनी दक्षिणा दे तथा प्रणाम करके यज्ञकी समाप्ति करे॥२—१५॥
अनेन विधिना यस्तु कुर्याद् वृक्षोत्सवं बुधः ।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति फलं चानन्त्यमश्नुते ॥ १६<br>यश्चैकमपि राजेन्द्र वृक्षं संस्थापयेन्नरः ।<br>सोऽपि स्वर्गे वसेद् राजन् यावदिन्द्रायुतत्रयम् ॥ १७<br>भूतान् भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद् द्रुमसंमितान् ।<br>परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम् ॥ १८<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः ।<br>सोऽपि सम्पूजितो देवैर्ब्रह्मलोके महीयते ॥ १९जो विद्वान् उपर्युक्त विधिसे वृक्षारोपणका उत्सव करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा वह अक्षय फलका भागी होता है। राजेन्द्र! जो मनुष्य इस प्रकार एक भी वृक्षकी स्थापना करता है, राजन्! वह भी जबतक तीस इन्द्र समाप्त हो जाते हैं, तबतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। वह जितने वृक्षोंका रोपण करता है, अपने पहले और पीछेकी उतनी ही पीढ़ियोंका वह उद्धार कर देता है तथा उसे पुनरावृत्तिसे रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसङ्गको सुनता या सुनाता है, वह भी देवताओंद्वारा सम्मानित और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है*॥ १६–१९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृक्षोत्सवो नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृक्षोत्सव नामक उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५९ ॥


* वृक्ष मुनियों तथा कवियोंको बहुत प्रिय थे। वृक्ष-उद्यानादि रोपण-प्रतिष्ठाकी सभी विधियाँ पद्म, भविष्य, स्कन्दादि पुराणोंमें बहुत विस्तारसे हैं। अमरसिंह, कालिदासादिने भी इनका खूब वर्णन किया है। मत्स्यपुराणमें वृक्षोंका वर्णन बार-बार मिलेगा।

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