मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ६० * | २४३ ---|---
| माघे कृष्णतिलं तद्वत् पञ्चगव्यं च फाल्गुने।<br>ललिता विजया भद्रा भवानी कुमुदा शिवा॥ ३६<br>वासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमला सती।<br>उमा च दानकाले तु प्रीयतामिति कीर्तयेत्॥ ३७<br>मल्लिकाशोककमलं कदम्बोत्पलमालतीः।<br>कुब्जकं करवीरं च बाणमम्लानकुङ्कुमम्॥ ३८<br>सिन्धुवारं च सर्वेषु मासेषु क्रमशः स्मृतम्।<br>जपाकुसुम्भकुसुमं मालती शतपत्रिका॥ ३९<br>यथालाभं प्रशस्तानि करवीरं च सर्वदा।<br>एवं संवत्सरं यावदुपोष्य विधिवन्नरः॥ ४०<br>स्त्री भक्ता वा कुमारी वा शिवमभ्यर्च्य भक्तितः।<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम्॥ ४१<br>उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवां सह।<br>स्थापयित्वाथ शयने ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ४२ | माघमें काला तिल और फाल्गुनमें पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये तथा दानके समय ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मङ्गला, कमला, सती और उमा प्रसन्न हों—ऐसा कीर्तन करे। मल्लिका, अशोक, कमल, कदम्ब, उत्पल (नीलकमल), मालती, कुब्जक, करवीर (कनेर), बाण (कचनार या काश), ताजा कुङ्कुम और सिन्दुवार—इनके पुष्प क्रमशः सभी मासोंमें उपयुक्त माने गये हैं। जपाकुसुम, कुसुम्भ-कुसुम, मालती और शतपत्रिकाके पुष्प यदि मिल सकें तो प्रशस्त माने गये हैं, किंतु करवीर (कनेर) पुष्प तो सदा सभी महीनोंमें ग्राह्य है। इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान कर पुरुष, स्त्री या कुमारी भक्तिके साथ शिवजीकी पूजा करे। व्रतकी समाप्तिके समय सम्पूर्ण सामग्रियोंसे युक्त शय्या दान करे। उस शय्यापर शिव-पार्वतीकी सुवर्णमयी प्रतिमा और स्वर्णनिर्मित गौके साथ बैलको स्थापित कर ब्राह्मणको दान करे॥ ३२–४२॥ | | अन्यान्यपि यथाशक्ति मिथुनान्यम्बरादिभिः।<br>धान्यालङ्कारगोदानैरभ्यर्चेद् धनसंचयैः।<br>वित्तशाठ्येन रहितः पूजयेद् गतविस्मयः॥ ४३<br>एवं करोति यः सम्यक् सौभाग्यशयनव्रतम्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते।<br>फलस्यैकस्य त्यागेन व्रतमेतत् समाचरेत्॥ ४४<br>य इच्छन् कीर्तिमाप्नोति प्रतिमासं नराधिप।<br>सौभाग्यारोग्यरूपायुर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः।<br>न वियुक्तो भवेद् राजन् नवार्बुदशतत्रयम्॥ ४५<br>यस्तु द्वादश वर्षाणि सौभाग्यशयनव्रतम्।<br>करोति सप्त चाष्टौ वा श्रीकण्ठभवनेऽमरैः।<br>पूज्यमानो वसेत् सम्यग् यावत्कल्पायुतत्रयम्॥ ४६<br>नारी वा कुरुते वापि कुमारी वा नरेश्वर।<br>सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता॥ ४७<br>शृणुयादपि यश्चैव प्रदद्यादथवा मतिम्।<br>सोऽपि विद्याधरो भूत्वा स्वर्गलोके चिरं वसेत्॥ ४८ | अन्यान्य ब्राह्मण-दम्पतियोंका भी वस्त्र, धान्य, अलंकार, गोदान और प्रचुर धनसे पूजन करना चाहिये। कृपणता छोड़कर दृढ़ निश्चयके साथ भगवान्का पूजन करे। जो मनुष्य इस प्रकार उत्तम सौभाग्यशयन नामक व्रतका भलीभाँति अनुष्ठान करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। अथवा (यदि वह निष्कामभावसे इस व्रतको करता है तो) उसे नित्यपदकी प्राप्ति होती है। इस व्रतका आचरण करनेवाले पुरुषको एक फलका परित्याग कर देना चाहिये। राजन्! प्रतिमास इसका आचरण करनेवाला पुरुष यश और कीर्ति प्राप्त करता है। नरेश्वर! (सौभाग्य-शयनका दान करनेवाला पुरुष) सौभाग्य, आरोग्य, सुन्दर रूप, आयु, वस्त्र, अलंकार और आभूषणोंसे नौ अरब तीन सौ वर्षोंतक वञ्चित नहीं होता। जो बारह, आठ या सात वर्षोंतक सौभाग्यशयन-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह श्रीकण्ठ (महादेव) के लोकमें देवगणोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर तीस कल्पोंतक निवास करता है। नरेश्वर! जो विवाहिता स्त्री या कुमारी इस व्रतका पालन करती है, वह भी ललितादेवीके अनुग्रहसे लालित होकर पूर्वोक्त फलको प्राप्त करती है। जो इस व्रतकी कथाको श्रवण करता है अथवा दूसरोंको इसे करनेकी सलाह देता है, वह भी विद्याधर होकर चिरकालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। |