भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 254

| इदमिह मदनेन पूर्वमिष्टं <br> शतधनुषा कृतवीर्यसूनुना च। <br> कृतमथ वरुणेन नन्दिना वा <br> किमु जननाथ ततो यदुद्भवः स्यात्॥ ४९ | जननाथ ! पूर्वकालमें कामदेवने, राजा शतधन्वाने, कार्तवीर्य अर्जुनने, वरुणदेवने तथा नन्दीने भी इस अद्भुत व्रतका अनुष्ठान किया था। इस प्रकार इस व्रतके अनुष्ठानसे जैसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय॥ ४३—४९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सौभाग्यशयनव्रतं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सौभाग्यशयनव्रत नामक साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६०॥


इकसठवाँ अध्याय

अगस्त्य और वसिष्ठकी दिव्य उत्पत्ति, उर्वशी अप्सराका प्राकट्य और अगस्त्यके लिये अर्घ्य-प्रदान करनेकी विधि एवं माहात्म्य

नारद उवाचनारदजीने पूछा—
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महर्जनः। <br> तपः सत्यं च सप्तैते देवलोकाः प्रकीर्तिताः॥ १ <br> पर्यायेण तु सर्वेषामाधिपत्यं कथं भवेत्। <br> इह लोके शुभं रूपमायुः सौभाग्यमेव च। <br> लक्ष्मीश्च विपुला नाथ कथं स्यात् पुरसूदन॥ २त्रिपुरविनाशक महेश्वर ! भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—ये सात देवलोक बतलाये गये हैं। इन सबपर क्रमशः आधिपत्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है? तथा नाथ ! इस लोकमें सुन्दर रूप, दीर्घायु, सौभाग्य और विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? (कृपया इसे बतलाइये)॥ १-२॥
महेश्वर उवाचभगवान् महेश्वरने कहा—
पुरा हुताशनः सार्धं मारुतेन महीतले। <br> आदिष्टः पुरुहूतेन विनाशाय सुरद्विषाम्॥ ३ <br> निर्दग्धेषु ततस्तेन दानवेषु सहस्रशः। <br> तारकः कमलाक्षश्च कालदंष्ट्रः परावसुः। <br> विरोचनश्च संग्रामादपलायंस्तपोधन॥ ४ <br> अम्भः सामुद्रमाविश्य संनिवेशमकुर्वत। <br> अशक्या इति तेऽप्यग्निमारुताभ्यामुपेक्षिताः॥ ५ <br> ततः प्रभृति ते देवान् मनुष्यान् सभुजङ्गमान्। <br> सम्पीड्य च मुनीन् सर्वान् प्रविशन्ति पुनर्जलम्॥ ६ <br> एवं वर्षसहस्राणि वीराः पञ्च च सप्त च। <br> जलदुर्गबलाद् ब्रह्मन् पीडयन्ति जगत्त्रयम्॥ ७ <br> ततः परमथो वह्निमारुतावमराधिपः। <br> आदिदेश चिरादम्बुनिधिरेष विशोष्यताम्॥ ८तपोधन ! पूर्वकालकी बात है, एक बार इन्द्रने भूतलपर देवद्रोही असुरोंका विनाश करनेके लिये वायुके साथ अग्निको आज्ञा दी। तब अग्निद्वारा हजारों दानवोंको जलाकर भस्म कर दिये जानेपर तारक, कमलाक्ष, कालदंष्ट्र, परावसु और विरोचन आदि प्रधान दानव रणभूमिसे भाग खड़े हुए और समुद्रके जलमें प्रविष्ट होकर (वहाँ छिपकर) निवासस्थान बनाकर रहने लगे। उस समय अग्नि और वायुने भी 'अब ये सर्वथा अशक्त, निर्जीव हो गये हैं'—ऐसा समझकर उनकी उपेक्षा कर दी। तबसे वे दानव जलसे निकलकर देवताओं, नागों (सामान्य) मनुष्यों और समस्त मुनियोंको बुरी तरह पीड़ित कर पुनः जलमें प्रविष्ट हो जाते थे। ब्रह्मन् ! इस प्रकार वे पाँच-सात ही दानववीर हजारों वर्षोंसे अपने जलदुर्गके बलपर त्रिलोकीको पीड़ा पहुँचा रहे थे। तब यह सब देखकर देवेश्वर इन्द्रने अग्नि और वायुको आज्ञा दी कि 'आपलोग इस समुद्रको सुखा डालें।