मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ६१ * | २४५ |
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| यस्मादस्मद्द्विषामेष शरणं वरुणालयः।<br>तस्माद् भवद्भ्यामद्यैव क्षयमेष प्रणीयताम्॥ ९<br>तावूचतुस्ततः शक्रमुभौ शम्बरसूदनम्।<br>अधर्म एष देवेन्द्र सागरस्य विनाशनम्॥ १०<br>यस्माज्जीवनिकायस्य महतः संक्षयो भवेत्।<br>तस्मान्न पापमद्यावां करवावः पुरंदर॥ ११<br>अस्य योजनमात्रेऽपि जीवकोटिशतानि च।<br>निवसन्ति सुरश्रेष्ठ स कथं नाशमर्हति॥ १२ | 'चूँकि यह वरुणका निवासस्थान समुद्र हमारे शत्रुओंका आश्रयस्थान बना हुआ है, इसलिये आपलोग आज ही इसे नष्ट कर दें।' तब वे दोनों (अग्नि और वायु) शम्बरासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रसे बोले—'देवेन्द्र! समुद्रका विनाश कर देना—यह महान् अधर्म होगा। पुरंदर! ऐसा करनेसे बहुत बड़े जीव-समुदायका विनाश हो जायगा, इसलिये हमलोग आज यह पाप नहीं करना चाहते। सुरश्रेष्ठ! इस समुद्रके एक योजन (चार मील)-के विस्तारमें ही सैकड़ों करोड़ जीव निवास करते हैं, भला, उनका विनाश कैसे किया जा सकता है!'॥३—१२॥ | | एवमुक्तः सुरेन्द्रस्तु कोपात् संरक्तलोचनः।<br>उवाचेदं वचो रोषात्रिर्दहन्निव पावकम्॥ १३<br>न धर्माधर्मसंयोगं प्राप्नुवन्त्यमराः क्वचित्।<br>भवतस्तु विशेषेण माहात्म्यं चाधितिष्ठति॥ १४<br>मदाज्ञालङ्घनं यस्मान्मारुतेन समं त्वया।<br>मुनिव्रतमहिंसादि परिगृह्य त्वया कृतम्।<br>धर्मार्थशास्त्ररहितं शत्रुं प्रति विभावसो॥ १५<br>तस्मादेकेन वपुषा मुनिरूपेण मानुषे।<br>मारुतेन समं लोके तव जन्म भविष्यति॥ १६<br>यदा च मानुषत्वेऽपि त्वयागस्त्येन शोषितः।<br>भविष्यत्युदधिर्वह्ने तदा देवत्वमाप्स्यसि॥ १७<br>इतीन्द्रशापात् पतितौ तत्क्षणात् तौ महीतले।<br>अवाप्तावेकदेहेन कुम्भाज्जन्म तपोधन॥ १८<br>मित्रावरुणयोर्वीर्याद् वसिष्ठस्यानुजोऽभवत्।<br>अगस्त्य इत्युग्रतपाः सम्बभूव पुनर्मुनिः॥ १९ | उनके ऐसा कहनेपर क्रोधके कारण सुरेन्द्रके नेत्र लाल हो गये। तब वे अपनी क्रोधाग्निसे अग्निको जलाते हुएकी तरह यह वचन बोले—'विभावसो! देवताओंपर कहीं भी धर्म और अधर्मका प्रभाव नहीं पड़ता। आपमें तो यह महत्त्व विशेषरूपसे वर्तमान है। चूँकि आपने वायुके साथ मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है और अहिंसा आदि मुनि-व्रत धारण कर धर्म, अर्थ और शास्त्रसे विहीन शत्रुके प्रति उपेक्षा की है, इसलिये मानवलोकमें वायुके साथ आपका एक शरीरसे मुनिरूपमें जन्म होगा। अग्ने! मानव-योनिमें उत्पन्न होनेपर भी जब आपद्वारा अगस्त्यरूपसे समुद्र सोख लिया जायगा, तब पुनः आपको देवत्वकी प्राप्ति होगी।' तपोधन! इस प्रकार इन्द्रके शापसे वे दोनों (अग्नि और वायु) उसी क्षण पृथ्वीतलपर गिर पड़े और एक ही शरीरसे (दोनोंने) घड़ेसे जन्म धारण किया। वे मित्रावरुणके वीर्यसे उत्पन्न होकर वसिष्ठके अनुज हुए। आगे चलकर वे दोनों संयुक्त उग्रतपस्वी अगस्त्य मुनिके नामसे विख्यात हुए॥ १३—१९॥ | | नारद उवाच<br>सम्भूतः स कथं भ्राता वसिष्ठस्याभवन्मुनिः।<br>कथं च मित्रावरुणौ पितरावस्य तौ स्मृतौ।<br>जन्म कुम्भादगस्त्यस्य कथं स्यात् पुरसूदन॥ २० | नारदजीने पूछा—त्रिपुरसूदन! वे मुनि जन्म धारण करनेके पश्चात् वसिष्ठके भ्राता कैसे हो गये? वे दोनों मित्रावरुण इनके पिता कैसे कहलाये? तथा अगस्त्य मुनिका घड़ेसे जन्म कैसे हुआ? (यह सब हम जानना चाहते हैं।)॥२०॥ | | ईश्वर उवाच<br>पुरा पुराणपुरुषः कदाचिद् गन्धमादने।<br>भूत्वा धर्मसुतो विष्णुश्चचार विपुलं तपः॥ २१ | ईश्वरने कहा—नारद! पूर्वकालमें पुराणपुरुष भगवान् विष्णु किसी समय धर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न होकर गन्धमादन पर्वतपर महान् तपस्यामें संलग्न थे। |