भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 256
२४६* मत्स्यपुराण *

| तपसा तस्य भीतेन विघ्नार्थं प्रेषितावुभौ।<br>शक्रेण माधवानङ्गावप्सरोगणसंयुतौ ॥ २२<br>तदा तद्गीतवाद्येन नाङ्गरागादिना हरिः।<br>न काममाधवाभ्यां च विषयान् प्रति चुक्षुभे ॥ २३<br>तदा काममधुस्त्रीणां विषादमगमद् गणः।<br>संक्षोभाय ततस्तेषां स्वोरुदेशान्नराग्रजः।<br>नारीमुत्पादयामास त्रैलोक्यजनमोहिनीम् ॥ २४<br>संक्षुब्धास्तु तया देवास्तौ तु देववरावुभौ।<br>अप्सरोभिः समक्षं हि देवानामकब्रवीद्धरिः॥ २५<br>अप्सरा इति सामान्या देवानामकब्रवीद्धरिः।<br>उर्वशीति च नाम्नेयं लोके ख्यातिं गमिष्यति ॥ २६<br>ततः कामयमानेन मित्रेणाहूय सोर्वशी।<br>उक्ता मां रमयस्वेति बाढमित्यब्रवीत् तु सा ॥ २७<br>गच्छन्ती चाम्बरं तद्वत् स्तोकमिन्दीवरेक्षणा।<br>वरुणेन धृता पश्चाद् वरुणं नाभ्यनन्दत ॥ २८<br>मित्रेणाहं वृता पूर्वमद्य भार्या न ते विभो।<br>उवाच वरुणश्चित्तं मयि संन्यस्य गम्यताम् ॥ २९ | उनकी तपस्यासे भयभीत हुए इन्द्रने उसमें विघ्न डालनेके लिये अप्सराओंके साथ वसन्त-ऋतु और कामदेव—दोनोंको भेजा। उस समय श्रीहरि न तो उनके गाने, बजाने अथवा अङ्गराग आदिसे ही प्रभावित हुए, न वसन्त और कामदेवद्वारा उपस्थित किये गये विषय-भोगोंके प्रति ही उनका मन क्षुब्ध हुआ। यह देखकर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंका समूह विषादमें डूब गया। तत्पश्चात् नरके अग्रज नारायणने उन्हें विशेषरूपसे क्षुब्ध करनेके हेतु अपने ऊरुप्रदेशसे एक ऐसी नारीको उत्पन्न किया, जो त्रिलोकीके मनुष्योंको मोहित करनेवाली थी। उस स्त्रीने समस्त देवताओं तथा उन दोनों देवश्रेष्ठोंको भलीभाँति क्षुब्ध कर दिया। उस समय श्रीहरिने अप्सराओंके सामने ही देवताओंसे कहा—'देवगण! यह एक अप्सरा है। यह लोकमें उर्वशी-नामसे प्रसिद्ध होगी'॥ २१—२९॥ | | गतायां बाढमित्युक्त्वा मित्रः शापमदात्तदा।<br>तस्यै मानुषलोके त्वं गच्छ सोमसुतात्मजम् ॥ ३०<br>भजस्वेति यतो वेश्याधर्म एष त्वया कृतः।<br>जलकुम्भे ततो वीर्यं मित्रेण वरुणेन च।<br>प्रक्षिप्तमथ संजातौ द्वावेव मुनिसत्तमौ ॥ ३१<br>निमिर्नाम सह स्त्रीभिः पुरा द्यूतमदीव्यत।<br>तत्रान्तरेऽभ्याजगाम वसिष्ठो ब्रह्मसम्भवः॥ ३२<br>तस्य पूजामकुर्वन्तं शशाप स मुनिर्नृपम्।<br>विदेहस्त्वं भवस्वेति ततस्तेनाप्यसौ मुनिः॥ ३३<br>अन्योन्यशापाच्च तयोर्विगते इव चेतसी।<br>जग्मतुः शापनाशाय ब्रह्माणं जगतः पतिम् ॥ ३४<br>अथ ब्रह्मण आदेशालोचनेष्ववसन्निभिः।<br>निमेषाः स्युश्च लोकानां तद्विश्रामाय नारद ॥ ३५<br>वसिष्ठोऽप्यभवत् तस्मिन् जलकुम्भे च पूर्ववत्।<br>ततः श्वेतश्चतुर्बाहुः साक्षसूत्रकमण्डलुः।<br>अगस्त्य इति शान्तात्मा बभूव ऋषिसत्तमः ॥ ३६ | तदनन्तर एक घड़ेसे मित्र और वरुणके अंशसे दो मुनिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए। प्राचीनकालकी बात है, एक बार जब महाराज निमि स्त्रियोंके साथ जुआ खेल रहे थे, उसी समय ब्रह्मपुत्र महर्षि वसिष्ठ उनके पास आये, किंतु राजाने उनका स्वागत-सत्कार नहीं किया। तब वसिष्ठ मुनिने राजाको शाप दे दिया—'तुम विदेह—देहरहित हो जाओ।' तब राजाने भी मुनिको वही शाप दे दिया। इस प्रकार एक-दूसरेके शापवश दोनोंकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। तब वे दोनों शापसे छुटकारा पानेके लिये जगत्पति ब्रह्माके पास गये। वहाँ ब्रह्माके आदेशसे राजा निमिका प्राणियोंके नेत्रोंमें निवास हुआ। नारद! उन्हींको विश्राम देनेके लिये लोगोंके निमेष (पलकोंका गिरना और खुलना) होते रहते हैं। वसिष्ठ भी पहलेकी तरह उसी जलकुम्भसे प्रकट हुए। तदुपरान्त उसी जलकुम्भसे ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त शान्त स्वभाववाले थे। उनका गौर वर्ण था, उनके चार भुजाएँ थीं तथा वे अक्षसूत्र (यज्ञोपवीत) और कमण्डलु धारण किये हुए थे। विप्रोंसे घिरे हुए अगस्त्यने अपनी पत्नीके साथ |

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