मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ६१ * | २४७ |
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| मलयस्यैकदेशे तु वैखानसविधानतः।<br>सभार्यः संवृतो विप्रैस्तपश्चक्रे सुदुश्चरम्॥ ३७<br><br>ततः कालेन महता तारकादतिपीडितम्।<br>जगद् वीक्ष्य स कोपेन पीतवान् वरुणालयम्॥ ३८<br><br>ततोऽस्य वरदाः सर्वे बभूवुः शङ्करादयः।<br>ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् वरदानाय जग्मतुः।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते यदभीष्टं च वै मुने॥ ३९ | रहकर मलयपर्वतके एक प्रदेशमें वैखानस-विधिके अनुसार अत्यन्त कठोर तप किया था। चिरकालके पश्चात् तारकासुरद्वारा जगत्को अत्यन्त पीड़ित देखकर वे कुपित हो गये और समुद्रको पी गये। यह देखकर शङ्कर आदि सभी देवता उन्हें वर देनेके लिये उत्सुक हो उठे। उसी समय ब्रह्मा और भगवान् विष्णु वर प्रदान करनेके निमित्त उनके निकट गये और बोले—'मुने! आपका कल्याण हो! आपको जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लीजिये'॥ ३०—३९॥ |
| अगस्त्य उवाच<br>यावद् ब्रह्मसहस्राणां पञ्चविंशतिकोटयः।<br>वैमानिको भविष्यामि दक्षिणाचलवर्त्मनि॥ ४०<br>मद्विमानोदये कुर्याद् यः कश्चित् पूजनं मम।<br>स समलोकाधिपतिः पर्यायेण भविष्यति॥ ४१ | अगस्त्य बोले— देव! मैं एक सहस्र ब्रह्माओंके पचीस करोड़ वर्षोंतक दक्षिणाचलके मार्गमें विमानपर स्थित होकर निवास करूँ। उस समय मेरे विमानके उदय होनेपर जो कोई मनुष्य मेरा पूजन करे, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति हो जाय॥ ४०-४१॥ |
| ईश्वर उवाच<br>एवमस्त्विति तेऽप्युक्त्वा जग्मुर्देवा यथागतम्।<br>तस्मादर्घः प्रदातव्यो ह्यगस्त्यस्य सदा बुधैः॥ ४२ | ईश्वरने कहा— नारद! तब वे देवगण भी 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। इसलिये विद्वानोंको अगस्त्यके लिये सदा अर्घ्य प्रदान करते रहना चाहिये॥ ४२॥ |
| नारद उवाच<br>कथमर्घप्रदानं तु कर्तव्यं तस्य वै विभो।<br>विधानं यदगस्त्यस्य पूजने तद् वदस्व मे॥ ४३ | नारदजीने पूछा— विभो! अगस्त्यके लिये किस विधिसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिये? तथा उनके पूजनका क्या विधान है? यह मुझे बतलाइये?॥ ४३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>प्रत्यूषसमये विद्वान् कुर्यादस्योदये निशि।<br>स्नानं शुक्लतिलैस्तद्वच्छुक्लमाल्याम्बरो गृही॥ ४४<br>स्थापयेदव्रणं कुम्भं माल्यवस्त्रविभूषितम्।<br>पञ्चरत्नसमायुक्तं घृतपात्रसमन्वितम्॥ ४५<br>अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव<br>सौवर्णमेवायतबाहुदण्डम् ।<br>चतुर्मुखं कुम्भमुखे निधाय<br>धान्यानि सप्ताम्बरसंयुतानि॥ ४६<br>सकांस्यपात्राक्षतशुक्तियुक्तं<br>मन्त्रेण दद्याद् द्विजपुङ्गवाय।<br>उत्क्षिप्य लम्बोदरदीर्घबाहु-<br>मनन्यचेता यमदिङ्मुखः सन्॥ ४७ | ईश्वरने कहा— नारद! विद्वान् गृहस्थको चाहिये कि वह अगस्त्यके उदयसे संयुक्त रात्रिमें प्रातःकाल श्वेत तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उसी प्रकार श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे। तत्पश्चात् एक छिद्ररहित कलश स्थापित करे और उसे पुष्पमाला तथा वस्त्रसे विभूषित कर दे। उसके भीतर पञ्चरत्न डाल दे और पार्श्वभागमें घीसे भरा हुआ एक पात्र रख दे। साथ ही काँसेका पात्र चावल भरकर उसके ऊपर सीप अथवा शङ्ख रखकर प्रस्तुत करे। फिर अँगूठेके बराबर लम्बी सोनेकी एक ऐसी पुरुषाकार प्रतिमा बनवाये, जिसमें चार मुख दीख पड़ते हों और जिसकी भुजाएँ लम्बी हों, उसे कलशके मुखमें स्थापित कर दे। उसके निकट पृथक्-पृथक् सात वस्त्रोंमें बँधी हुई धान्य-राशि भी रखे। तदनन्तर अनन्य चित्तसे दक्षिणाभिमुख हो लम्बे उदर और लम्बी भुजाओंवाली अगस्त्यमुनिकी उस प्रतिमाको (घड़ेसे) निकालकर हाथमें लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी सामग्रियोंसहित सुपात्र ब्राह्मणको दान कर दे। |