मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२४८ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| श्वेतां च दद्याद् यदि शक्तिरस्ति<br>रौप्यैः खुरैर्हेममुखीं सवत्साम्।<br>धेनुं नरः क्षीरवतीं प्रणम्य<br>स्रग्वस्त्रघण्टाभरणां द्विजाय॥ ४८<br><br>आसप्तरात्रोदयमेतदस्य<br>दातव्यमेतत् सकलं नरेण।<br>यावत्सप्ताः सप्त दशाथ वा स्यु-<br>रथोध्वंमप्यत्र वदन्ति केचित्॥ ४९ | साथ ही यदि धनसम्पत्तिरूपी शक्ति हो तो गृहस्थ पुरुष एक श्वेत वर्णकी बछड़ेवाली दुधारू गौको सोनेके मुख और चाँदीके खुरोंसे संयुक्त करे तथा उसे माला, वस्त्र और घंटीसे विभूषित करके नमस्कारपूर्वक ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार गृहस्थ पुरुषको अगस्त्योदयसे सात रात्रियोंतक इन सभी वस्तुओंका दान करना चाहिये। इस विधानको सात अथवा दस वर्षोंतक करना चाहिये। कुछ लोग इससे आगे भी इसकी अवधि बतलाते हैं॥ ४८—४९॥ |
| काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।<br>मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते।<br>प्रत्यब्दं तु फलत्यागमेवं कुर्वन्न सीदति<sup>१</sup>॥ ५० | तदनन्तर यों प्रार्थना करते हुए अर्घ्य प्रदान करे—'कुम्भसे उत्पन्न होनेवाले अगस्त्यजी! आपके शरीरका रंग कासके पुष्पके सदृश उज्ज्वल है, आपकी उत्पत्ति अग्नि और वायुसे हुई है और आप मित्रावरुणके पुत्र हैं, आपको नमस्कार है।' इस प्रकार फलत्यागपूर्वक प्रतिवर्ष अर्घ्य प्रदान करनेवाला पुरुष कष्टभागी नहीं होता। |
| होमं कृत्वा ततः पश्चाद् वर्जयेन्मानवः फलम्।<br>अनेन विधिना यस्तु पुमानर्घ्यं निवेदयेत्॥ ५१ | तत्पश्चात् हवन करके कार्य समाप्त करे। उस समय मनुष्यको फलकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। जो पुरुष इस विधिके अनुसार अगस्त्यको अर्घ्य निवेदित करता है, वह सुन्दर रूप और नीरोगतासे युक्त होकर इस मृत्युलोकमें पुनः जन्म धारण करता है। |
| इमं लोकं स चाप्नोति रूपारोग्यसमन्वितः।<br>द्वितीयेन भुवर्लोकं स्वर्लोकं च ततः परम्॥ ५२ | इसी प्रकार वह दूसरे अर्घ्यसे भुवर्लोकको और तीसरेसे उससे भी श्रेष्ठ स्वर्लोकको जाता है। |
| सप्तैव लोकानाप्नोति सप्तार्घ्यान् यः प्रयच्छति।<br>यावदायुश्च यः कुर्यात् परं ब्रह्माधिगच्छति॥ ५३ | इसी तरह जो मनुष्य उन (सात) दिनोंमें अर्घ्य देता है, वह क्रमशः सातों लोकोंको प्राप्त होता है तथा जो आयुपर्यन्त इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ ५०—५३॥ |
| इह पठति शृणोति वा य<br>एतद् युगलमुनिप्रभवार्घ्यसम्प्रदानम्।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि<br>विष्णोर्भवनगतः परिपूज्यतेऽमरौघैः॥ ५४ | जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें इन दोनों (वसिष्ठ और अगस्त्य) मुनियोंकी उत्पत्ति और अगस्त्य मुनिके अर्घ्यप्रदान<sup>२</sup> के वृत्तान्तको पढ़ता अथवा सुनता है या ऐसा करनेकी सलाह देता है, वह विष्णुलोकमें जाकर देवगणोंद्वारा पूजित होता है॥ ५४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽगस्त्योत्पत्तिपूजाविधानं नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अगस्त्योत्पत्तिपूजा-विधान नामक इकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६१॥
१. यहाँ पूनावाली प्रतिमें तीन श्लोक अधिक हैं।
२. अगस्त्यार्घ्यपर ऋग्वेद १। १७९। ६ से लेकर अग्नि, गरुड, वृहद्धर्म आदि पुराणोंतकमें अपार सामग्री भरी पड़ी है। हेमाद्रि, गोपाल तथा रत्नाकर आदिने भी इन्हें अपने व्रत-निबन्धोंमें कई पृष्ठोंमें संगृहीत किया है। ऋक् प्रथम मण्डलमें दीर्घतमा १६४ सू० के बाद १९१ सूक्तोंतकके ये ही द्रष्टा हैं।