मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२५० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अर्थ |
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| वरदायै नमः पादौ तथा गुल्फौ श्रियै नमः।<br>अशोकायै नमो जङ्घे पार्वत्यै जानुनी तथा॥ ११<br>ऊरू मङ्गलकारिण्यै वामदेव्यै तथा कटिम्।<br>पद्मोदरायै जठरमुरः कामश्रियै नमः॥ १२<br>करौ सौभाग्यदायिन्यै बाहूदरमुखं श्रियै।<br>दन्तान् दर्पणवासिन्यै स्मरदायै स्मितं नमः॥ १३<br>गौर्यै नमस्तथा नासामुत्पलायै च लोचने।<br>तुष्ट्यै ललाटमलकान् कात्यायन्यै शिरस्तथा॥ १४<br>नमो गौर्यै नमो धिष्ण्यै नमः कान्त्यै नमः श्रियै।<br>रम्भायै ललितायै च वासुदेव्यै नमो नमः॥ १५ | 'वरदायै नमः' से दोनों चरणोंका, 'श्रियै नमः' से दोनों गुल्फोंका, 'अशोकायै नमः' से दोनों जाँघोंका, 'पार्वत्यै नमः' से दोनों जानुओंका, 'मङ्गलकारिण्यै नमः' से दोनों ऊरुओंका, 'वामदेव्यै नमः' से कटिप्रदेशका, 'पद्मोदरायै नमः' से उदरका तथा 'कामश्रियै नमः' से वक्षःस्थलका अर्चन करे; फिर 'सौभाग्यदायिन्यै नमः' से दोनों हाथोंका, 'श्रियै नमः' से बाहु, उदर और मुखका, 'दर्पणवासिन्यै नमः' से दाँतोंका, 'स्मरदायै नमः' से मुसकानका, 'गौर्यै नमः' से नासिकाका, 'उत्पलायै नमः' से नेत्रोंका, 'तुष्ट्यै नमः' से ललाटका, 'कात्यायन्यै नमः' से सिर और बालोंका पूजन करना चाहिये। तदुपरान्त 'गौर्यै नमः', 'धिष्ण्यै नमः', 'कान्त्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'रम्भायै नमः', 'ललितायै नमः' और 'वासुदेव्यै नमः' कहकर देवीके चरणोंमें प्रणिपात करना चाहिये॥ ४—१५॥ |
| एवं सम्पूज्य विधिवदग्रतः पद्ममालिखेत्।<br>पत्रैर्द्वादशभिर्युक्तं कुङ्कुमेन सकर्णिकम्॥ १६<br>पूर्वेण विन्यसेद् गौरीमपर्णां च ततः परम्।<br>भवानीं दक्षिणे तद्वद् रुद्राणीं च ततः परम्॥ १७<br>विन्यसेत् पश्चिमे सौम्यां सदा मदनवासिनीम्।<br>वायव्ये पाटलावासामुत्तरेण ततोऽप्युमाम्॥ १८<br>लक्ष्मीं स्वाहां स्वधां तुष्टिं मङ्गलां कुमुदां सतीम्।<br>रुद्रं च मध्ये संस्थाप्य ललितां कर्णिकोपरि।<br>कुसुमैरक्षतैर्वारिभिर्नमस्कारेण विन्यसेत्॥ १९<br>गीतमङ्गलनिर्घोषान् कारयित्वा सुवासिनीः।<br>पूजयेद् रक्तवासोभी रक्तमाल्यानुलेपनैः।<br>सिन्दूरं गन्धचूर्णं च तासां शिरसि पातयेत्॥ २०<br>सिन्दूरकुङ्कुमस्नानमिष्टं सत्याः सदा यतः।<br>तथोपदेष्टारमपि पूजयेद् यत्नतो गुरुम्।<br>न पूज्यते गुरुर्यत्र सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ २१<br>नभस्ये पूजयेद् गौरीमुत्पलैरसितैः सदा।<br>बन्धुजीवैराश्वयुजे कार्तिके शतपत्रकैः॥ २२ | इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके मूर्तिके आगे कुङ्कुमसे बारह पत्तोंसे युक्त कर्णिकासहित कमल बनाये। उसके पूर्वभागमें गौरी, उसके बाद अपर्णा, दक्षिणभागमें भवानी और नैर्ऋत्य कोणमें रुद्राणीको स्थापित करे। पुनः पश्चिममें सदा सौम्य स्वभावसे रहनेवाली मदनवासिनी, वायव्यकोणमें पाटला और उत्तरमें पुष्पमें निवास करनेवाली उमाकी स्थापना करे। मध्यभागमें लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा, तुष्टि, मङ्गला, कुमुदा और सतीको स्थित करे। कमलके मध्यमें रुद्रकी स्थापना करके कर्णिकाके ऊपर ललितादेवीको स्थित करे। तत्पश्चात् गीत और माङ्गलिक बाजाका आयोजन कराकर पुष्प, श्वेत अक्षत और जलसे देवीकी अर्चना करके उन्हें नमस्कार करे। फिर लाल वस्त्र, लाल पुष्पोंकी माला और लाल अङ्गरागसे सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा उनके सिर (माँग)-में सिन्दूर और कुङ्कुम लगावे; क्योंकि सिन्दूर और कुङ्कुम सती देवीको सदा अभीष्ट हैं। तदनन्तर उपदेश करनेवाले गुरु अर्थात् आचार्यकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये; क्योंकि जहाँ आचार्यकी पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। गौरीदेवीकी पूजा सदा भाद्रपदमासमें नीले कमलसे, आश्विनमें बन्धुजीव (गुलदपहरिया)-के फूलोंसे, कार्तिकमें शतपत्रक (कमल)-के पुष्पोंसे, |