भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 1098 में से

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* अध्याय ६२ *२५१
जातीपुष्पैर्मार्गशीर्षे पौषे पीतैः कुरण्टकैः।<br>कुन्दकुङ्कुमपुष्पैस्तु देवीं माघे तु पूजयेत्।<br>सिन्धुवारेण जात्या वा फाल्गुनेऽप्यर्चयेदुमाम्॥ २३<br>चैत्रे तु मल्लिकाशोकैर्वैशाखे गन्धपाटलैः।<br>ज्येष्ठे कमलमन्दारैराषाढे चम्पकाम्बुजैः।<br>कदम्बैरथ मालत्या श्रावणे पूजयेदुमाम्॥ २४<br>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्।<br>बिल्वपत्रार्कपुष्पं च गवां शृङ्गोदकं तथा॥ २५<br>पञ्चगव्यं च बिल्वं च प्राशयेत् क्रमशस्तदा।<br>एतद् भाद्रपदाद्यं तु प्राशनं समुदाहृतम्॥ २६मार्गशीर्षमें जाती (मालती)-के पुष्पोंसे, पौषमें पीले कुरण्टक (कटसरैया)-के पुष्पोंसे, माघमें कुन्द और कुङ्कुमके पुष्पोंसे करनी चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुनमें सिन्दुवार अथवा मालतीके पुष्पोंसे उमाकी अर्चना करे। चैत्रमें मल्लिका और अशोकके पुष्पोंसे, वैशाखमें गन्धपाटलके फूलोंसे, ज्येष्ठमें कमल और मन्दारके कुसुमोंसे, आषाढ़में चम्पा एवं कमल-पुष्पोंसे और श्रावणमें कदम्ब तथा मालतीके फूलोंसे पार्वतीकी पूजा करनी चाहिये। इसी तरह भाद्रपदसे आरम्भ कर आश्विन आदि बारह महीनोंमें क्रमशः गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, बिल्व-पत्र, मदारका पुष्प, गोशृङ्गोदक, पञ्चगव्य और बेलका नैवेद्य अर्पण करनेका विधान है। क्रमशः भाद्रपदसे लेकर श्रावणतक प्रत्येक मासके लिये ये नैवेद्य बतलाये गये हैं॥ १६—२६॥
प्रतिपक्षं च मिथुनं तृतीयायां वरानने।<br>ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव शिवं गौरीं प्रकल्प्य च॥ २७<br>भोजयित्वार्चयेद् भक्त्या वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पुंसः पीताम्बरे दद्यात् स्त्रियै कौसुम्भवाससी॥ २८<br>निष्पावाजाजिलवणमिक्षुदण्डगुडान्वितम् ।<br>स्त्रियै दद्यात् फलं पुंसे सुवर्णोत्पलसंयुतम्॥ २९<br>यथा न देवि देवेशस्त्वत्वां परित्यज्य गच्छति।<br>तथा मां सम्परित्यज्य पतिर्नान्यत्र गच्छतु॥ ३०<br>कुमुदा विमलानन्ता भवानी च सुधा शिवा।<br>ललिता कमला गौरी सती रम्भाथ पार्वती॥ ३१<br>नभस्यादिषु मासेषु प्रीयतामित्युदीरयेत्।<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्॥ ३२<br>मिथुनानि चतुर्विंशद् दश द्वौ च समर्चयेत्।<br>अष्टौ षड् वाप्यथ पुनश्चानुमासं समर्चयेत्॥ ३३<br>पूर्वं दत्त्वा तु गुरवे शेषानप्यर्चयेद् बुधः।<br>उक्तानन्ततृतीयेषा सदानन्तफलप्रदा॥ ३४वरानने! प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको एक ब्राह्मण-दम्पतिको उनमें शिव-पार्वतीकी कल्पना कर भोजन कराकर उनकी वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दनसे भक्तिपूर्वक अर्चना करे तथा पुरुषको दो पीताम्बर और स्त्रीको दो पीली साड़ियाँ प्रदान करे। फिर ब्राह्मणी-स्त्रीको निष्पाव (बड़ी मटर या सेम), जीरा, नमक, ईंख, गुड़, फल और फूल आदि सौभाग्यष्टक देकर और पुरुषको सुवर्णनिर्मित कमल देकर यों प्रार्थना करे—'देवि! जिस प्रकार देवाधिदेव भगवान् महादेव आपको छोड़कर नहीं जाते, उसी प्रकार मेरे भी पतिदेव मुझे छोड़कर अन्यत्र न जायें।' पुनः कुमुदा, विमला, अनन्ता, भवानी, सुधा, शिवा, ललिता, कमला, गौरी, सती, रम्भा और पार्वतीदेवीके इन नामोंका उच्चारण करके प्रार्थना करे कि आप क्रमशः भाद्रपद आदि मासोंमें प्रसन्न हों। व्रतकी समाप्तिमें सुवर्ण-निर्मित कमलसहित शय्या दान करे और चौबीस अथवा बारह द्विज-दम्पतियोंकी पूजा करे। पुनः प्रतिमास आठ या छः दम्पतियोंका पूजन करते रहनेका विधान है। विद्वान् व्रती सर्वप्रथम गुरुको दान देकर तत्पश्चात् दूसरे ब्राह्मणोंकी अर्चना करे। देवि! इस प्रकार मैंने इस अनन्त-तृतीयाका वर्णन कर दिया, जो सदा अनन्त फलकी प्रदायिका है॥२७—३४॥
सर्वपापहरां देवि सौभाग्यारोग्यवर्धिनीम्।<br><br>न चैनां वित्तशाठ्येन कदाचिदपि लङ्घयेत्।<br><br>नरो वा यदि वा नारी वित्तशाठ्यात् पतत्यधः॥ ३५देवि! यह अनन्ततृतीया समस्त पापोंकी विनाशिका तथा सौभाग्य और नीरोगताकी वृद्धि करनेवाली है, इसका कृपणता-वश कभी भी उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये; क्योंकि चाहे पुरुष हो या स्त्री—कोई भी कृपणताके वशीभूत होकर यदि इसका उल्लङ्घन करता है तो उसका अधःपतन हो जाता है।
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