भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

२५२ * मत्स्यपुराण *

गर्भिणी सूतिका नक्तं कुमारी वाथ रोगिणी।<br>यद्यशुद्धा तदान्येन कारयेत् प्रयता स्वयम्॥ ३६<br><br>इमामनन्तफलदां यस्तृतीयां समाचरेत्।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं शिवलोके महीयते॥ ३७<br><br>वित्तहीनोऽपि कुरुते वर्षत्रयमुपोषणैः।<br>पुष्पमन्त्रविधानेन सोऽपि तत्फलमाप्नुयात्॥ ३८<br><br>नारी वा कुरुते या तु कुमारी विधवाथवा।<br>सापि तत्फलमाप्नोति गौर्यनुग्रहलालिता॥ ३९<br><br>इति पठति शृणोति वा<br>य इत्थं गिरितनयाव्रतमिन्द्रलोकसंस्थः।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-<br>रमरवधूजनकिन्नरैश्च पूज्यः॥ ४०गर्भिणी एवं सूतिका (सौरीमें पड़ी हुई) स्त्री नक्तव्रत (रातमें भोजन) करे। कुमारी और रोगिणी अथवा अशुद्ध स्त्री स्वयं नियमपूर्वक रहकर दूसरेके द्वारा व्रतका अनुष्ठान कराये। जो मानव अनन्त फल प्रदान करनेवाली इस तृतीयाके व्रतका अनुष्ठान करता है, वह सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। निर्धन पुरुष भी यदि तीन वर्षोंतक उपवास करके पुष्प और मन्त्र आदिके द्वारा इस व्रतका अनुष्ठान करता है तो उसे भी उस फलकी प्राप्ति होती है। सधवा स्त्री, कुमारी अथवा विधवा—जो कोई भी इस व्रतका पालन करती है, वह भी गौरीकी कृपासे लालित होकर उस फलको प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार जो मनुष्य गिरीश-नन्दिनी पार्वतीके इस व्रतको पढ़ता अथवा सुनता है, वह इन्द्रलोकमें वास करता है तथा जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवताओं, देवाङ्गनाओं और किन्नरोंद्वारा पूजनीय हो जाता है॥ ३५–४०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽनन्ततृतीयाव्रतं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनन्ततृतीया-व्रत नामक बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६२॥


तिरसठवाँ अध्याय

रसकल्याणिनी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाच<br><br>अथान्यामपि वक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम्।<br>रसकल्याणिनीमेनां पुराकल्पविदो विदुः॥ १<br><br>माघमासे तु सम्प्राप्ते तृतीयां शुक्लपक्षतः।<br>प्रातर्गव्येन पयसा तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ २<br><br>स्नापयेन्मधुना देवीं तथैवेक्षुरसेन च।<br>दक्षिणाङ्गानि सम्पूज्य ततो वामानि पूजयेत्॥ ३<br><br>गन्धोदकेन च पुनः पूजनं कुङ्कुमेन वै।<br>ललितायै नमो देव्याः पादौ गुल्फौ ततोऽर्चयेत्।<br>जङ्घां जानुं तथा शान्त्यै तथैवोरुं श्रियै नमः॥ ४ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं एक अन्य तृतीयाका भी वर्णन कर रहा हूँ जो पापोंका विनाश करनेवाली है, तथा जिसे पुराकल्पके ज्ञातालोग 'रस-कल्याणिनी' के नामसे जानते हैं। माघका महीना आनेपर शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको प्रातःकाल व्रतीको गो-दुग्ध और तिलमिश्रित जलसे स्नान करना चाहिये। (इस प्रकार स्वयं शुद्ध होकर) फिर देवीकी मूर्तिको मधु और गन्नेके रससे स्नान करावे। तत्पश्चात् सुगन्धित जलसे शुद्ध स्नान कराकर कुङ्कुमका अनुलेप करे। पूजनमें दक्षिणाङ्गकी पूजा कर लेनेके पश्चात् वामाङ्गकी पूजा करनेका विधान है। 'ललितायै नमः' से देवीके दोनों चरणों तथा दोनों गुल्फोंकी अर्चना करे। 'शान्त्यै नमः' से जंघाओं और जानुओंका, 'श्रियै नमः' से ऊरुओंका,