भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 263
* अध्याय ६३ *२५३

| मदालसायै तु कटिममलायै तथोदरम्।<br>स्तनौ मदनवासिन्यै कुमुदायै च कन्थराम्॥ ५<br><br>भुजं भुजाग्रं माधव्यै कमलायै मुखस्मिते।<br>भ्रूललाटे च रुद्राण्यै शंकरायै तथालकान्॥ ६<br><br>मुकुटं विश्ववासिन्यै शिरः कान्त्यै तथार्चयेत्।<br>मदनायै ललाटं तु मोहनायै पुनर्भुवौ॥ ७<br><br>नेत्रे चन्द्रार्धधारिण्यै तुष्ट्यै च वदनं पुनः।<br>उत्कण्ठिन्यै नमः कण्ठममृतायै नमः स्तनौ॥ ८<br><br>रम्भायै वामकुक्षिं च विशोकायै नमः कटिम्।<br>हृदयं मन्मथाधिष्ठ्यै पाटलायै तथोदरम्॥ ९<br><br>कटिं सुरतवासिन्यै तथोरुं चम्पकप्रिये।<br>जानुजङ्घे नमो गौर्यै गायत्र्यै घुटिके नमः॥ १०<br><br>धराधरायै पादौ तु विश्वकायै नमः शिरः।<br>नमो भवान्यै कामिन्यै कामदेव्यै जगत्प्रिये॥ ११ | 'मदालसायै नमः' से कटिभागका, 'अमलायै नमः' से उदरका, 'मदनवासिन्यै नमः' से दोनों स्तनोंका, 'कुमुदायै नमः' से कंधोंका, 'माधव्यै नमः' से भुजाओं और भुजाओंके अग्रभागका, 'कमलायै नमः' से मुख और मुसकानका, 'रुद्राण्यै नमः' से भौंहों और ललाटका, 'शङ्करायै नमः' से बालोंका, 'विश्ववासिन्यै नमः' से मुकुटका और 'कान्त्यै नमः' से सिरका पूजन करे। पुनः (पूजनका अन्य क्रम बतलाते हैं—) 'मदनायै नमः' से ललाटकी, 'मोहनायै नमः' से दोनों भौंहोंकी, 'चन्द्रार्धधारिण्यै नमः' से दोनों नेत्रोंकी, 'तुष्ट्यै नमः' से मुखकी, 'उत्कण्ठिन्यै नमः' से कण्ठकी, 'अमृतायै नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'रम्भायै नमः' से बायीं कुक्षिकी, 'विशोकायै नमः' से कटिभागकी, 'मन्मथाधिष्ठ्यै नमः' से हृदयकी, 'पाटलायै नमः' से उदरकी, 'सुरतवासिन्यै नमः' से कटिप्रदेशकी, 'चम्पकप्रियायै नमः' से ऊरुओंकी, 'गौर्यै नमः' से जंघाओं और जानुओंकी, 'गायत्र्यै नमः' से घुटनोंकी, 'धराधरायै नमः' से दोनों चरणोंकी और 'विश्वकायै नमः' से सिरकी पूजा करके 'भवान्यै नमः', 'कामिन्यै नमः', 'कामदेव्यै नमः', 'जगत्प्रियायै नमः' कहकर चरणोंमें प्रणिपात (प्रणाम) करना चाहिये ॥ १-११॥ | | एवं सम्पूज्य विधिवद् द्विजदाम्पत्यमर्चयेत्।<br>भोजयित्वाऽन्नपानेन मधुरेण विमत्सरः॥ १२<br><br>जलपूरितं तथा कुम्भं शुक्लाम्बरयुगद्वयम्।<br>दत्त्वा सुवर्णकमलं गन्धमाल्यैः समर्चयेत्॥ १३<br><br>प्रीयतामत्र कुमुदा गृह्णीयाल्लवणव्रतम्।<br>अनेन विधिना देवीं मासि मासि सदार्चयेत्॥ १४ | इस प्रकार विधि-विधानके साथ देवीकी पूजा करके एक द्विज-दम्पतिका भी पूजन करना चाहिये। उस समय व्रती अहंकाररहित हो अर्थात् विनम्रतापूर्वक उन्हें मधुर अन्न और जलका भोजन कराकर दो श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित एवं स्वर्णनिर्मित कमलसहित जलसे भरा हुआ घड़ा प्रदान करे फिर चन्दन और पुष्पमाला आदिसे उनकी अर्चना करे, तथा इस प्रकार कहे—'इस व्रतसे कुमुदा देवी प्रसन्न हों।' ऐसा कहकर उस दिन लवण-व्रत ग्रहण करे अर्थात् नमक खाना छोड़ दे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सदा देवीकी अर्चना करनी चाहिये। | | लवणं वर्जयेन्माघे फाल्गुने च गुडं पुनः।<br>तैलं राजिं तथा चैत्रे वर्ज्यं च मधु माधवे॥ १५<br><br>पानकं ज्येष्ठमासे तु आषाढे चाथ जीरकम्।<br>श्रावणे वर्जयेत् क्षीरं दधि भाद्रपदे तथा॥ १६<br><br>घृतमाश्वयुजे तद्वदूर्जे वर्ज्यं च माक्षिकम्।<br>धान्यकं मार्गशीर्षे तु पौषे वर्ज्या च शर्करा॥ १७ | व्रतीको माघमें नमक और फाल्गुनमें गुड़ नहीं खाना चाहिये। चैत्रमें तेल और पीली सरसों (या राई) तथा वैशाखमें मधु वर्जित है। ज्येष्ठमासमें पानक (एक प्रकारका पेय पदार्थ या ताम्बूल), आषाढ़में जीरा, श्रावणमें दूध और भाद्रपदमें दही निषिद्ध है। इसी प्रकार आश्विनमें घी और कार्तिकमें मधुका निषेध किया गया है। मार्गशीर्षमें धनिया और पौषमें शक्कर वर्जित है। |