मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२५४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्रतान्ते करकं पूर्णमेतेषां मासि मासि च।<br>दद्याद् द्विकालवेलायां पूर्णपात्रेण संयुतम्॥ १८<br>लड्डुकाञ्छ्वेतवर्णांश्च संयावमथ पूरिकाः।<br>घारिकानप्यपूंपांश्च पिष्टापूंपांश्च मण्डकान्॥ १९<br>क्षीरं शाकं च दध्यन्नमिण्डर्योऽशोकवर्तिकाः।<br>माघादिक्रमशो दद्यादेतानि करकोपरि॥ २०<br>कुमुदा माधवी गौरी रम्भा भद्रा जया शिवा।<br>उमा रतिः सती तद्वन्मङ्गला रतिलालसा॥ २१<br>क्रमान्माघादि सर्वत्र प्रीयतामिति कीर्तयेत्। | इस प्रकार इन महीनोंके क्रमसे प्रत्येक मासमें व्रतकी समाप्ति के समय सायंकालकी वेलामें उपर्युक्त पदार्थोंसे भरा हुआ एक करवा पूर्णपात्रसहित ब्राह्मणको दान करे। इसी तरह श्वेत रंगके लड्डू, गोझिया, पूरी, घेवर, पूआ, आटेका बना हुआ पूआ, मण्डक (एक प्रकारका पिष्टक), दूध, शाक, दही-मिश्रित अन्न, इण्डरी (एक प्रकारकी रोटी) और अशोकवर्तिका (सेंवई)—इन पदार्थोंको माघ आदि मासक्रमसे करवाके ऊपर रखकर दान करनेका विधान है। फिर कुमुदा, माधवी, गौरी, रम्भा, भद्रा, जया, शिवा, उमा, रति, सती, मङ्गला, रतिलालसा प्रसन्न हों—ऐसा कहकर माघ आदि सभी मासोंमें क्रमशः कीर्तन करना चाहिये॥ १२—२१ १/२॥ |
| सर्वत्र पञ्चगव्येन प्राशनं समुदाहृतम्।<br>उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिष्यते॥ २२ | सभी मासोंके व्रतमें पञ्चगव्यका प्राशन (भक्षण) बतलाया गया है। इन सभी व्रतोंमें उपवास करनेका विधान है। यदि उपवास करनेमें असमर्थ हो तो रात्रिमें एक बार तारिकाओंके निकल आनेपर भोजन किया जा सकता है। |
| पुनर्माघे तु सम्प्राप्ते शर्करां करकोपरि।<br>कृत्वा तु काञ्चनीं गौरीं पञ्चरत्नसमन्विताम्॥ २३<br>हैमीमङ्गुष्ठमात्रां च साक्षसूत्रकमण्डलुम्।<br>चतुर्भुजामिन्दुयुतां सितनेत्रपटावृताम्॥ २४ | वर्षान्तमें पुनः माघमास आनेपर गौरीकी एक सोनेकी मूर्ति बनवाये जो अँगूठेके बराबर लम्बी हो। वह चार भुजाओं और ललाटमें चन्द्रमासे युक्त हो। उसे पञ्चरत्नोंसे विभूषित और दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित कर दे। |
| तद्वद् गोमिथुनं शुक्लं सुवर्णास्यं सिताम्बरम्।<br>सवस्त्रभाजनं दद्याद् भवानी प्रीयतामिति॥ २५ | फिर करवामें शक्कर भरकर उसीके ऊपर उस मूर्तिको स्थापित करके रुद्राक्षकी माला और कमण्डलुसहित ब्राह्मणको दान कर दे। उसी प्रकार गौके जोड़ेको, जिनका रंग श्वेत और मुख सुवर्णसे मढ़ा हुआ हो, जो श्वेत वस्त्रसे आच्छादित हों, अन्य वस्त्र और पात्रके सहित दान करके 'भवानी प्रसन्न हों' यों कहकर प्रार्थना करनी चाहिये। |
| अनेन विधिना यस्तु रसकल्याणिनीव्रतम्।<br>कुर्यात् स सर्वपापेभ्यस्तत्क्षणादेव मुच्यते॥ २६<br>नवार्बुदसहस्रं तु न दुःखी जायते नरः। | जो मनुष्य इस विधिके अनुसार रसकल्याणिनीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह उसी क्षण समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और नौ अरब एक हजार वर्षोंतक कष्टमें नहीं पड़ता। |
| सुवर्णकमलं गौरि मासि मासि ददन्नरः।<br>अग्निष्टोमसहस्रस्य यत्फलं तदवाप्नुयात्॥ २७ | गौरि! इसी प्रकार जो मनुष्य प्रत्येक मासमें स्वर्णनिर्मित कमलका दान करता है वह हजारों अग्निष्टोम-यज्ञोंका जो फल होता है, उसे प्राप्त कर लेता है। |
| नारी वा कुरुते या तु कुमारी वा वरानने।<br>विधवा या तथा नारी सापि तत्फलमाप्नुयात्।<br>सौभाग्यारोग्यसम्पन्ना गौरीलोके महीयते॥ २८ | वरानने! सधवा स्त्री, कुमारी अथवा विधवा स्त्री—कोई भी यदि इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी उस फलको प्राप्त करती है, साथ ही सौभाग्य और आरोग्यसे सम्पन्न होकर गौरी-लोकमें पूजित होती है। |