भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 265
* अध्याय ६४ *२५५

| इति पठति शृणोति श्रावयेद् यः प्रसङ्गात् <br> कलिकलुषविमुक्तः पार्वतीलोकमेति। <br><br> मतिमपि च नराणां यो ददाति प्रियार्थं <br> विबुधपतिविमाने नायकः स्यादमोघः॥ २९॥ | इस प्रकार जो मनुष्य प्रसङ्गवश इस व्रतको पढ़ता, सुनता अथवा दूसरेको सुनाता है, वह कलियुगके पापोंसे मुक्त होकर पार्वती-लोकमें जाता है तथा जो मनुष्योंकी हित-कामनासे इस व्रतका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह इन्द्रके विमानमें स्थित होकर अक्षयकालतक नायक—नेताका पद प्राप्त करता है॥ २२—२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे रसकल्याणिनीव्रतं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रस-कल्याणिनी-व्रत नामक तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६३॥


चौंसठवाँ अध्याय

आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच <br><br> तथैवान्यां प्रवक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम्। <br> नाम्ना च लोके विख्यातामार्द्रानन्दकरीमिमाम्॥ १ <br><br> यदा शुक्लतृतीयायामाषाढर्क्षं भवेत् क्वचित्। <br> ब्रह्मर्क्षं या मृगक्षं वा हस्तो मूलमथापि वा। <br> दर्भगन्धोदकैः स्नानं तदा सम्यक् समाचरेत्॥ २ <br><br> शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः। <br> भवानीमर्चयेद् भक्त्या शुक्लपुष्पैः सुगन्धिभिः। <br> महादेवेन सहितामुपविष्टां महासने॥ ३ <br><br> वासुदेव्यै नमः पादौ शङ्कराय नमो हरम्। <br> जङ्घे शोकविनाशिन्यै आनन्दाय नमः प्रभो॥ ४ <br><br> रम्भायै पूजयेदूरू शिवाय च पिनाकिनः। <br> अदित्यै च कटिं देव्याः शूलिनः शूलपाणये॥ ५ <br><br> माधव्यै च तथा नाभिमथ शम्भोर्भवाय च। <br> स्तनावानन्दकारिण्यै शङ्करस्येन्दुधारिणे॥ ६ <br><br> उत्कण्ठिन्यै नमः कण्ठं नीलकण्ठाय वै हरम्। <br> करावुत्पलधारिण्यै रुद्राय च जगत्पतेः। <br> बाहू च परिरम्भिण्यै त्रिशूलाय हरस्य च॥ ७ <br><br> देव्या मुखं विलासिन्यै वृषेशाय पुनर्विभोः। <br> स्मितं सस्मेरलीलायै विश्ववक्त्राय वै विभोः॥ ८ | ईश्वरने कहा—नारद! उसी प्रकार अब मैं एक-दूसरी पापनाशिनी तृतीयाका वर्णन कर रहा हूँ जो लोकमें आर्द्रानन्दकरी नामसे विख्यात है। इसकी विधि यह है—जब कभी शुक्लपक्षकी तृतीयाको पूर्वाषाढ़ अथवा उत्तराषाढ़, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त अथवा मूल नक्षत्र पड़े तो उस समय कुश और चन्दनमिश्रित जलसे भलीभाँति स्नान करना चाहिये। फिर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दनका अनुलेप कर ले। तत्पश्चात् महादेवसहित दिव्य आसनपर विराजमान भवानीकी (स्वर्णमयी मूर्तिकी) श्वेत पुष्पों और सुगन्धित पदार्थोंद्वारा भक्तिपूर्वक अर्चना करे। (पूजनकी विधि इस प्रकार है—) ‘वासुदेव्यै नमः, शङ्कराय नमः’ से गौरी-शंकरके दोनों चरणोंका, ‘शोकविनाशिन्यै नमः, आनन्दाय नमः’ से दोनों जंघाओंका, ‘रम्भायै नमः’, ‘शिवाय नमः’ से दोनों ऊरुओंका, ‘अदित्यै नमः, शूलपाणये नमः’ से कटिप्रदेशका, ‘माधव्यै नमः, भवाय नमः’ से नाभिका, ‘आनन्दकारिण्यै नमः, इन्दुधारिणे नमः’ से दोनों स्तनोंका, ‘उत्कण्ठिन्यै नमः, नीलकण्ठाय नमः’ से कण्ठका, ‘उत्पलधारिण्यै नमः, रुद्राय नमः’ से दोनों हाथोंका, ‘परिरम्भिण्यै नमः, त्रिशूलाय नमः’ से दोनों भुजाओंका, ‘विलासिन्यै नमः, वृषेशाय नमः’ से मुखका, ‘सस्मेरलीलायै नमः, विश्ववक्त्राय नमः’ से मुसकानका, |