भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नेत्रे मदनवासिन्यै विश्वधाम्ने त्रिशूलिनः।<br>भ्रुवौ नृत्यप्रियायै तु ताण्डवेशाय शूलिनः॥ ९<br>देव्या ललाटमिन्द्राण्यै हव्यवाहाय वै विभोः।<br>स्वाहायै मुकुटं देव्या विभोर्गङ्गाधराय वै॥ १०<br>विश्वकायौ विश्वमुखौ विश्वपादकरौ शिवौ।<br>प्रसन्नवदनौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ ११'मदनवासिन्यै नमः, विश्वधाम्ने नमः' से दोनों नेत्रोंका, 'नृत्यप्रियायै नमः, ताण्डवेशाय नमः' से दोनों भौंहोंका, 'इन्द्राण्यै नमः, हव्यवाहाय नमः' से ललाटका तथा 'स्वाहायै नमः, गङ्गाधराय नमः' से मुकुटका पूजन करे। तत्पश्चात् विश्व जिनका शरीर है, जो विश्वके मुख, पाद और हस्तस्वरूप तथा मङ्गलकारक हैं, जिनके मुखपर प्रसन्नता झलकती रहती है, उन पार्वती और परमेश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ। (ऐसा कहकर उनके चरणोंमें लुढ़क पड़े।)॥ ९—११॥
एवं सम्पूज्य विधिवदग्रतः शिवयोः नमः।<br>पद्मोत्पलानि रजसा नानावर्णेन कारयेत्॥ १२<br>शङ्खचक्रे सकटके स्वस्तिकाङ्कुशचामरान्।<br>यावन्तः पांसवस्तत्र रजसः पतिता भुवि।<br>तावद् वर्षसहस्त्राणि शिवलोके महीयते॥ १३<br>चत्वारि घृतपात्राणि सहिरण्यानि शक्तितः।<br>दत्त्वा द्विजाय करकमुदकान्नसमन्वितम्।<br>प्रतिपक्षं चतुर्मासं यावदेतन्निवेदयेत्॥ १४<br>ततस्तु चतुरो मासान् पूर्ववत् करकोपरि।<br>चत्वारि सक्तुपात्राणि तिलपात्राण्यतः परम्॥ १५<br>गन्धोदकं पुष्पवारि चन्दनं कुङ्कुमोदकम्।<br>अपक्वं दधि दुग्धं च गोशृङ्गोदकमेव च॥ १६<br>पिष्टोदकं तथा वारि कुष्ठचूर्णान्वितं पुनः।<br>उशीरसलिलं तद्वद् यवचूर्णोदकं पुनः॥ १७<br>तिलोदकं च सम्प्राश्य स्वपेन्मार्गशिरादिषु।<br>मासेषु पक्षद्वितयं प्राशनं समुदाहृतम्॥ १८<br>सर्वत्र शुक्लपुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।<br>दानकाले च सर्वत्र मन्त्रमेतमुदीरयेत्॥ १९<br>गौरी मे प्रीयतां नित्यमघनाशाय मङ्गला।<br>सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्वसिद्धये॥ २०<br>संवत्सरान्ते लवणं गुडकुम्भं च सर्जिकाम्।<br>चन्दनं नेत्रपट्टं च सहिरण्याम्बुजेन तु॥ २१<br>उमामहेश्वरं हैमं तद्दिक्षुफलैर्युतम्।<br>सतूलावरणां शय्यां सविश्रामां निवेदयेत्।<br>सपत्नीकाय विप्राय गौरी मे प्रीयतामिति॥ २२इस प्रकार विधिके अनुसार पूजन कर पुनः शिव-पार्वतीकी मूर्तिके अग्रभागमें विभिन्न प्रकारके रङ्गोंवाले रजसे कमलका आकार बनवाये। साथ ही कटकसहित शङ्ख, चक्र, स्वस्तिक, अङ्कुश और चँवरको भी चित्रित करे। ऐसा करते समय वहाँ भूतलपर जितने रजःकण गिरते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक व्रती शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसहित घीसे भरे हुए चार पात्र और अन्न एवं जलसे युक्त करवा ब्राह्मणको दान करे। ऐसा चार मासतक प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीयाको करना चाहिये। इसके बाद चार मासतक पहलेकी तरह करवापर सत्तूसे पूर्ण चार पात्र रखकर तथा उसके बाद चार मासतक करवापर तिलपूर्ण चार पात्र रखकर दान करे। व्रतीको मार्गशीर्ष आदि मासोंमें क्रमशः गन्धोदक (सुगन्धमिश्रित जल), पुष्पवारि (फूलयुक्त जल), चन्दनमिश्रित जल, कुङ्कुमयुक जल, बिना पका हुआ दही, दूध, गोशृङ्गोदक (गौके सींगसे स्पर्श कराया हुआ जल), पिष्टोदक (पीठीयुक्त जल), कुष्ठ (गन्धक)-के चूर्णसे युक्त जल, उशीर (खस)-मिश्रित जल, यवके चूर्णसे युक्त जल तथा तिलमिश्रित जलका भक्षण करके रात्रिमें शयन करना चाहिये। यह प्राशन (भक्षण) प्रत्येक मासमें दोनों पक्षोंमें करनेका विधान है। सभी महीनोंके पूजनमें श्वेत पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं। सभी मासोंमें दानके समय इस प्रकारका मन्त्र उच्चारण करना चाहिये—'गौरी नित्य मुझपर प्रसन्न रहें, मङ्गला मेरे पापोंका विनाश करें, ललिता मुझे सौभाग्य प्रदान करें और भवानी मेरे लिये सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्रदात्री हों।' इस प्रकार वर्षके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसहित नमक, गुड़से भरा हुआ घट, सज्जी, चन्दन, आँखोंको ढँकनेके लिये वस्त्र, गत्रा और नाना प्रकारके फलोंके साथ स्वर्णनिर्मित उमा और महेश्वरकी मूर्ति सपत्नीक ब्राह्मणको दान कर दे। उस समय रूईसे भरा हुआ गद्दा, चादर और तकियासे युक्त सुन्दर शय्या भी दान करनेका विधान है। (दान करनेके पश्चात् उनसे यों प्रार्थना करे—) 'गौरीदेवी मुझपर प्रसन्न हों'॥ १२—२२॥