मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ६५ * २५७
| आर्द्रानन्दकरी नाम्ना तृतीयाैषा सनातनी।<br>यामुपोष्य नरो याति शाम्भोर्यत् परमं पदम्॥ २३<br>इह लोके सदानन्दमाप्नोति धनसम्पदः।<br>आयुरारोग्यसम्पत्त्या न कश्चिच्छोकमाप्नुयात्॥ २४<br>नारी वा कुरुते या तु कुमारी विधवा च या।<br>सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता॥ २५<br>प्रतिपक्षमृपोष्यैवं मन्त्रार्चनविधानवित्।<br>रुद्राणीलोकमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ २६<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>शक्रलोके स गन्धर्वैः पूज्यतेऽपि युगत्रयम्॥ २७<br>आनन्ददां सकलदुःखहरां तृतीयां<br>या स्त्री करोत्यविधवा विधवाथवापि।<br>सा स्वे गृहे सुखशतान्यनुभूय भूयो<br>गौरीपदं सदयिता दयिता प्रयाति॥ २८ | यह आर्द्रानन्दकरी नामकी सनातनी तृतीया है, जिसका व्रतोपवास करके मनुष्य उस स्थानको प्राप्त होता है जो शिवजीका परमपद कहलाता है। वह इस लोकमें धन-सम्पत्ति, दीर्घायु और नीरोगतारूप सम्पत्तिसे युक्त होकर सुखका उपभोग करता है। उसे कोई शोक नहीं प्राप्त होता। यदि सधवा नारी, कुमारी अथवा विधवा इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी देवीकी कृपासे लालित होकर उसी फलको प्राप्त होती है। इसी प्रकार मन्त्र और अर्चा-विधिका ज्ञाता मनुष्य प्रत्येक पक्षमें इस व्रतका अनुष्ठान कर रुद्राणीके उस लोकमें जाता है जहाँसे पुनरागमन नहीं होता। जो मानव नित्य इस व्रतको सुनता अथवा सुनाता है वह तीन युगोंतक इन्द्रलोकमें गन्धर्वोंद्वारा पूजित होता है। जो स्त्री, चाहे वह सधवा हो अथवा विधवा, इस सम्पूर्ण दुःखोंको हरण करनेवाली एवं आनन्ददायिनी तृतीयाका अनुष्ठान करती है वह नारी पतिसहित अपने घरमें सैकड़ों प्रकारके सुखोंका अनुभव करके पुनः गौरी-लोकमें चली जाती है॥ २३—२८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आर्द्रानन्दकरीतृतीयाव्रतं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रत नामक चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६४॥
पैंसठवाँ अध्याय
अक्षयतृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | भगवान् शंकरने कहा— |
|---|---|
| अथान्यमपि वक्ष्यामि तृतीयां सर्वकामदाम्।<br>यस्यां दत्तं हुतं जप्तं सर्वं भवति चाक्षयम्॥ १<br>वैशाखशुक्लपक्षे तु तृतीया यैरुपोषिता।<br>अक्षयं फलमाप्नोति सर्वस्य सुकृतस्य च॥ २<br>सा तथा कृत्तिकोपेता विशेषेण सुपूजिता।<br>तत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वमक्षयमुच्यते॥ ३<br>अक्षया संततिस्तस्य तस्यां सुकृतमक्षयम्।<br>अक्षतैः पूज्यते विष्णुस्तेन साक्षया स्मृता।<br>अक्षतैस्तु नराः स्नाता विष्णोर्दत्त्वा तथाक्षताम्॥ ४ | नारद! अब मैं सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली एक अन्य तृतीयाका वर्णन कर रहा हूँ, जिसमें दान देना, हवन करना और जप करना सभी अक्षय हो जाता है। जो लोग वैशाखमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाके दिन व्रतोपवास करते हैं, वे अपने समस्त सत्कर्मोंका अक्षय फल प्राप्त करते हैं। वह तृतीया यदि कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त हो तो विशेषरूपसे पूज्य मानी गयी है। उस दिन दिया गया दान, किया हुआ हवन और जप सभी अक्षय बतलाये गये हैं। इस व्रतका अनुष्ठान करनेवालेकी संतान अक्षय हो जाती है और उस दिनका किया हुआ पुण्य अक्षय हो जाता है। इस दिन अक्षतके द्वारा भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है, इसीलिये इसे अक्षय-तृतीया |