भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५८ * मत्स्यपुराण *


विप्रेषु दत्त्वा तानेव तथा सक्तून् सुसंस्कृतान्।<br>यथान्नभुङ् महाभाग फलमक्षय्यमश्नुते ॥ ५<br><br>एकामप्युक्तवत् कृत्वा तृतीयां विधिवन्नरः।<br>एतासामपि सर्वासां तृतीयानां फलं भवेत् ॥ ६<br><br>तृतीयायां समभ्यर्च्य सोपवासो जनार्दनम्।<br>राजसूयफलं प्राप्य गतिमग्र्यां च विन्दति ॥ ७कहते हैं।* मनुष्यको चाहिये कि इस दिन स्वयं अक्षतयुक्त जलसे स्नान करके भगवान् विष्णुकी मूर्तिपर अक्षत चढ़ावे और अक्षतके साथ ही शुद्ध सत्तू ब्राह्मणोंको दान दे; तत्पश्चात् स्वयं भी उसी अन्नका भोजन करे। महाभाग! ऐसा करनेसे वह अक्षय फलका भागी हो जाता है। उपर्युक्त विधिके अनुसार एक भी तृतीयाका व्रत करनेवाला मनुष्य इन सभी तृतीया-व्रतोंके फलको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस तृतीया तिथिको उपवास करके भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति पूजा करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर अन्तमें श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है॥ १—७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽक्षयतृतीयाव्रतं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अक्षयतृतीया-व्रत नामक पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६५॥


छाछठवाँ अध्याय

सारस्वत-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

मनुरुवाच<br>मधुरा भारती केन व्रतेन मधुसूदन।<br>तथैव जनसौभाग्यं मतिं विद्यासु कौशलम् ॥ १<br>अभेदश्चापि दम्पत्योस्तथा बन्धुजनेन च।<br>आयुश्च विपुलं पुंसां तन्मे कथय माधव ॥ २मनुने पूछा—मधुसूदन! किस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्योंको मधुर वाणी, जनतामें उत्कृष्ट सौभाग्य, उत्तम बुद्धि, विद्याओंमें निपुणता, पति-पत्नीमें अभेद, बन्धुजनोंके साथ प्रेम और दीर्घायुकी प्राप्ति हो सकती है? माधव! वह व्रत मुझे बतलाइये॥ १-२॥
मत्स्य उवाच<br>सम्यक् पृष्टं त्वया राजञ्छृणु सारस्वतं व्रतम्।<br>यस्य संकीर्तनादेव तुष्यतीह सरस्वती ॥ ३<br>यो मद्भक्तः पुमान् कुर्यादेतद् व्रतमनुत्तमम्।<br>तद्वासरादौ सम्पूज्य विप्रान्नेतान् समाचरेत् ॥ ४<br>अथवाऽऽदित्यवारेण ग्रहताराबलेन च।<br>पायसं भोजयेद् विप्रान् कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ५<br>शुक्लवस्त्राणि दत्त्वा च सहिरण्यानि शक्तितः।<br>गायत्रीं पूजयेद् भक्त्या शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ६मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! तुमने तो बड़ा उत्तम प्रश्न किया है। अच्छा सुनो! अब मैं उस सारस्वत-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसकी चर्चामात्र करनेसे इस लोकमें सरस्वतीदेवी प्रसन्न हो जाती हैं। जो पुरुष मेरा भक्त हो, उसे पञ्चमीके दिन इस श्रेष्ठ व्रतका अनुष्ठान प्रारम्भ करना चाहिये। आरम्भ-कालमें ब्राह्मणोंके पूजनका विधान है। अथवा रविवारको जब ग्रह और तारा आदि अनुकूल हों, ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर उन ब्राह्मणोंको खीरका भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसहित श्वेत वस्त्र दान करे। फिर श्वेत पुष्पमाला और चन्दन आदि उपकरणोंद्वारा भक्तिपूर्वक

* ध्यान रहे, सामान्यतया अक्षतके द्वारा विष्णुका पूजन निषिद्ध है—'नाक्षतैरर्चयेद् विष्णुम्' (पद्म० ६। ९६। २०)। पर केवल इस दिन अक्षतसे उनकी पूजाका विधान है। अन्यत्र अक्षतके स्थानपर सफेद तिलका विधान है। इस व्रतकी विस्तृत विधि भविष्यपुराण एवं 'व्रत-कल्पद्रुम' में है। इसी तिथिको सत्ययुगका प्रारम्भ तथा परशुरामजीका जन्म भी हुआ था।