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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

६९ भीमद्वादशी-व्रतका विधान

२५८ * मत्स्यपुराण *


विप्रेषु दत्त्वा तानेव तथा सक्तून् सुसंस्कृतान्।<br>यथान्नभुङ् महाभाग फलमक्षय्यमश्नुते ॥ ५<br><br>एकामप्युक्तवत् कृत्वा तृतीयां विधिवन्नरः।<br>एतासामपि सर्वासां तृतीयानां फलं भवेत् ॥ ६<br><br>तृतीयायां समभ्यर्च्य सोपवासो जनार्दनम्।<br>राजसूयफलं प्राप्य गतिमग्र्यां च विन्दति ॥ ७कहते हैं।* मनुष्यको चाहिये कि इस दिन स्वयं अक्षतयुक्त जलसे स्नान करके भगवान् विष्णुकी मूर्तिपर अक्षत चढ़ावे और अक्षतके साथ ही शुद्ध सत्तू ब्राह्मणोंको दान दे; तत्पश्चात् स्वयं भी उसी अन्नका भोजन करे। महाभाग! ऐसा करनेसे वह अक्षय फलका भागी हो जाता है। उपर्युक्त विधिके अनुसार एक भी तृतीयाका व्रत करनेवाला मनुष्य इन सभी तृतीया-व्रतोंके फलको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस तृतीया तिथिको उपवास करके भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति पूजा करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर अन्तमें श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है॥ १—७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽक्षयतृतीयाव्रतं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अक्षयतृतीया-व्रत नामक पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६५॥


छाछठवाँ अध्याय

सारस्वत-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

मनुरुवाच<br>मधुरा भारती केन व्रतेन मधुसूदन।<br>तथैव जनसौभाग्यं मतिं विद्यासु कौशलम् ॥ १<br>अभेदश्चापि दम्पत्योस्तथा बन्धुजनेन च।<br>आयुश्च विपुलं पुंसां तन्मे कथय माधव ॥ २मनुने पूछा—मधुसूदन! किस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्योंको मधुर वाणी, जनतामें उत्कृष्ट सौभाग्य, उत्तम बुद्धि, विद्याओंमें निपुणता, पति-पत्नीमें अभेद, बन्धुजनोंके साथ प्रेम और दीर्घायुकी प्राप्ति हो सकती है? माधव! वह व्रत मुझे बतलाइये॥ १-२॥
मत्स्य उवाच<br>सम्यक् पृष्टं त्वया राजञ्छृणु सारस्वतं व्रतम्।<br>यस्य संकीर्तनादेव तुष्यतीह सरस्वती ॥ ३<br>यो मद्भक्तः पुमान् कुर्यादेतद् व्रतमनुत्तमम्।<br>तद्वासरादौ सम्पूज्य विप्रान्नेतान् समाचरेत् ॥ ४<br>अथवाऽऽदित्यवारेण ग्रहताराबलेन च।<br>पायसं भोजयेद् विप्रान् कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ५<br>शुक्लवस्त्राणि दत्त्वा च सहिरण्यानि शक्तितः।<br>गायत्रीं पूजयेद् भक्त्या शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ६मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! तुमने तो बड़ा उत्तम प्रश्न किया है। अच्छा सुनो! अब मैं उस सारस्वत-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसकी चर्चामात्र करनेसे इस लोकमें सरस्वतीदेवी प्रसन्न हो जाती हैं। जो पुरुष मेरा भक्त हो, उसे पञ्चमीके दिन इस श्रेष्ठ व्रतका अनुष्ठान प्रारम्भ करना चाहिये। आरम्भ-कालमें ब्राह्मणोंके पूजनका विधान है। अथवा रविवारको जब ग्रह और तारा आदि अनुकूल हों, ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर उन ब्राह्मणोंको खीरका भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसहित श्वेत वस्त्र दान करे। फिर श्वेत पुष्पमाला और चन्दन आदि उपकरणोंद्वारा भक्तिपूर्वक

* ध्यान रहे, सामान्यतया अक्षतके द्वारा विष्णुका पूजन निषिद्ध है—'नाक्षतैरर्चयेद् विष्णुम्' (पद्म० ६। ९६। २०)। पर केवल इस दिन अक्षतसे उनकी पूजाका विधान है। अन्यत्र अक्षतके स्थानपर सफेद तिलका विधान है। इस व्रतकी विस्तृत विधि भविष्यपुराण एवं 'व्रत-कल्पद्रुम' में है। इसी तिथिको सत्ययुगका प्रारम्भ तथा परशुरामजीका जन्म भी हुआ था।

* अध्याय ६६ * । २५९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यथा न देवि भगवान् ब्रह्मलोके पितामहः।<br>त्वां परित्यज्य संतिष्ठेत् तथा भव वरप्रदा॥ ७<br>वेदाः शास्त्राणि सर्वाणि गीतनृत्यादिकं च यत्।<br>न विहीनं त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः॥ ८<br>लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा मतिः।<br>एताभिः पाहि अष्टाभिस्तनुभिर्मां सरस्वति॥ ९<br>एवं सम्पूज्य गायत्रीं वीणाक्षमालधारिणीम्।<br>शुक्लपुष्पाक्षतैर्भक्त्या सकमण्डलुपुस्तकाम्।<br>मौनव्रतेन भुञ्जीत सायं प्रातस्तु धर्मवित्॥ १०<br>पञ्चम्यां प्रतिपक्षं च पूजयेद् ब्रह्मवासिनीम्।<br>तथैव तण्डुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम्।<br>क्षीरं दद्याद्धिरण्यं च गायत्री प्रीयतामिति॥ ११<br>संध्यायां च तथा मौनमेतत् कुर्वन् समाचरेत्।<br>नान्तरा भोजनं कुर्याद् यावन्मासास्त्रयोदश॥ १२<br>समाप्ते तु व्रते कुर्याद् भोजनं शुक्लतण्डुलैः।<br>पूर्वं सवस्त्रयुग्मं च दद्याद् विप्राय भोजनम्॥ १३<br>देव्या वितानं घण्टां च सितनेत्रे पयस्विनीम्।<br>चन्दनं वस्त्रयुग्मं च दद्याच्च शिखरं पुनः॥ १४<br>तथोपदेष्टारमपि भक्त्या सम्पूजयेद् गुरुम्।<br>वित्तशाठ्येन रहितो वस्त्रमाल्यानुलेपनैः॥ १५गायत्रीदेवीकी पूजा करके यों प्रार्थना करे—'देवि! जैसे ब्रह्मलोकमें भगवान् पितामह आपको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं रुकते, उसी प्रकारका वर मुझे भी प्रदान करें। देवि! जैसे वेद, सम्पूर्ण शास्त्र तथा गीत-नृत्य आदि जितनी कलाएँ हैं, वे सभी आपके बिना नहीं रह सकतीं, उसी प्रकारकी सिद्धियाँ मुझे भी प्राप्त हों। सरस्वति! आप अपनी लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा और मति—इन आठ मूर्तियोंद्वारा मेरी रक्षा करें।' इस प्रकार धर्मज्ञ पुरुष वीणा, रुद्राक्ष-माला, कमण्डलु और पुस्तक धारण करनेवाली गायत्रीकी श्वेत पुष्प, अक्षत आदिसे भक्तिपूर्वक पूजा कर प्रातः एवं सायंकाल मौन धारण करके भोजन करे तथा प्रत्येक पक्षकी पञ्चमी तिथिको ब्रह्मवासिनी (वेद-विद्याकी अधिष्ठात्री)-का पूजन कर घृतपूर्ण पात्रसहित एक सेर चावल, दूध और सुवर्णका दान करे और कहे—'गायत्रीदेवी मुझपर प्रसन्न हों।' यह कर्म सायंकालमें मौन धारण करके करना चाहिये। तेरह महीनेतक प्रातः और सायंकालके बीच भोजन न करनेका विधान है। व्रत समाप्त हो जानेपर पहले ब्राह्मणको दो वस्त्रोंसहित भोजन-पदार्थका दान करके तत्पश्चात् स्वयं श्वेत चावलोंका भोजन करे। पुनः देवीके निमित्त वितान (चाँदोवा या चाँदनी), घण्टा, दो श्वेत (चाँदीके बने हुए) नेत्र, दुधारू गौ, चन्दन, दो वस्त्र और सिरका कोई आभूषण दान करना चाहिये। तदनन्तर उपदेश करनेवाले अर्थात् कर्म करानेवाले गुरुका भी कृपणतारहित होकर वस्त्र, पुष्पमाला, चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजन करे॥ ३—१५॥
अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् सारस्वतं व्रतम्।<br>विद्यावानर्थसंयुक्तो रक्तकण्ठश्च जायते॥ १६<br>सरस्वत्याः प्रसादेन ब्रह्मलोके महीयते।<br>नारी वा कुरुते या तु सापि तत्फलगामिनी।<br>ब्रह्मलोके वसेद् राजन् यावत् कल्पायुतत्रयम्॥ १७<br>सारस्वतं व्रतं यस्तु शृणुयादपि यः पठेत्।<br>विद्याधरपुरे सोऽपि वसेत् कल्पायुतत्रयम्॥ १८जो मनुष्य इस (उपर्युक्त) विधिके अनुसार सारस्वतव्रतका अनुष्ठान करता है, वह विद्या-सम्पन्न, धनवान् और मधुरभाषी हो जाता है; साथ ही सरस्वतीकी कृपासे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा राजन्! यदि कोई स्त्री इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी उस फलको प्राप्त करती है और तीस कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें निवास करती है। जो मनुष्य इस सारस्वत-व्रतका पाठ अथवा श्रवण करता है वह भी विद्याधर-लोकमें तीस कल्पोंतक निवास करता है॥ १६-१८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सारस्वतव्रतं नाम षट्षष्ठितमोऽध्यायः॥ ६६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सारस्वत-व्रत नामक छाछठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६६॥

२६०* मत्स्यपुराण *

सड़सठवाँ अध्याय

सूर्य-चन्द्र-ग्रहणके समय स्नानकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>चन्द्रादित्योपरागे तु यत् स्नानमभिधीयते।<br>तदहं श्रोतुमिच्छामि द्रव्यमन्त्रविधानवित्॥ १**मनुने पूछा—**द्रव्य और मन्त्रोंकी विधियोंके ज्ञाता (पूर्ण वेदविद्) भगवन्! सूर्य एवं चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर स्नानकी जैसी विधि बतलायी गयी है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>यस्य राशिं समासाद्य भवेद् ग्रहणसम्प्लवः।<br>तस्य स्नानं प्रवक्ष्यामि मन्त्रौषधविधानतः॥ २<br>चन्द्रोपरागं सम्प्राप्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>सम्पूज्य चतुरो विप्रान् शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ ३<br>पूर्वमेवोपरागस्य समासाद्यौषधादिकम्।<br>स्थापयेच्चतुरः कुम्भानव्रणान् सागरानिति॥ ४मत्स्यभगवान्‌ने कहा—(राजन्!) जिस पुरुषकी राशिपर ग्रहणका प्लावन (लगना) होता है, उसके लिये मन्त्र और औषधके विधानपूर्वक स्नान बतला रहा हूँ। ऐसे मनुष्यको चाहिये कि चन्द्र-ग्रहणके अवसरपर चार ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर श्वेत पुष्प और चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे। ग्रहणके पूर्व ही औषध आदिको एकत्र कर ले। फिर छिद्ररहित चार कलशोंकी, उनमें समुद्रकी भावना करके स्थापना करे। फिर उनमें
गजाश्वरथ्यावल्मीकसंगमाद्दहदगोकुलात् ।<br>राजद्वारप्रदेशाच्च मृदानीय चाक्षिपेत्॥ ५सप्तमृत्तिका—हाथीसार, घुड़शाल, वल्मीक (बल्मोट-दियाँड़), नदीके संगम, सरोवर, गोशाला और राजद्वारसे मिट्टी लाकर डाल दे।
पञ्चगव्यं च कुम्भेषु शुद्धमुक्ताफलानि च।<br>रोचनां पद्मशङ्खौ च पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ ६<br>स्फटिकं चन्दनं श्वेतं तीर्थवारि ससर्षपम्।<br>राजदन्तं सकुमुदं तथैवोशीरगुग्गुलम्।<br>एतत् सर्वं विनिक्षिप्य कुम्भेष्वावाहयेत् सुरान्॥ ७तत्पश्चात् उन कलशोंमें पञ्चगव्य, शुद्ध मुक्ताफल, गोरोचन, कमल, शङ्ख, पञ्चरत्न, स्फटिक, श्वेत चन्दन, तीर्थ-जल, सरसों, राजदन्त (एक ओषधिविशेष), कुमुद (कोइयाँ), खस, गुग्गुल—यह सब डालकर उन कलशोंपर देवताओंका आवाहन करे। (आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—)
सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः।<br>आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः॥ ८‘यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदियाँ, नद और जलप्रद तीर्थ यहाँ पधारें।’
योऽसौ वज्रधरो देव आदित्यानां प्रभुर्मतः।<br>सहस्रनयनश्चेन्द्रो ग्रहपीडां व्यपोहतु॥ ९(इसके बाद प्रार्थना करे—) ‘जो देवताओंके स्वामी माने गये हैं तथा जिनके एक हजार नेत्र हैं, वे वज्रधारी इन्द्रदेव मेरी ग्रहणजन्य पीडाको दूर करें।
मुखं यः सर्वदेवानां सप्तार्चिरमितद्युतिः।<br>चन्द्रोपरागसम्भूतामग्निः पीडां व्यपोहतु॥ १०जो समस्त देवताओंके मुखस्वरूप, सात ज्वालाओंसे युक्त और अतुल कान्तिवाले हैं, वे अग्निदेव चन्द्र-ग्रहणसे उत्पन्न हुई मेरी पीडाका विनाश करें।
यः कर्मसाक्षी भूतानां धर्मो महिषवाहनः।<br>यमश्चन्द्रोपरागोत्थां मम पीडां व्यपोहतु॥ ११जो समस्त प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं तथा महिष जिनका वाहन है, वे धर्मस्वरूप यम चन्द्र-ग्रहणसे उद्भूत हुई मेरी पीडाको मिटायें।
२६२* मत्स्यपुराण *
परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्।<br>सूर्यग्रहे सूर्यनाम सदा मन्त्रेषु कीर्तयेत्॥ २३<br>अधिकाः पद्मरागाः स्युः कपिलां च सुशोभनाम्।<br>प्रयच्छेच्च निशाम्पत्ये चन्द्रसूर्योपरागयोः॥ २४<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शक्रलोके महीयते॥ २५पुनरागमनरहित परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सूर्य-ग्रहणमें मन्त्रोंमें सदा सूर्यका नाम उच्चारण करना चाहिये। इसके अतिरिक्त चन्द्र-ग्रहण एवं सूर्य-ग्रहण—दोनों अवसरोंपर सूर्यके निमित्त पद्मराग मणि और निशापति चन्द्रमाके निमित्त एक सुन्दर कपिला गौका दान करनेका विधान है। जो मनुष्य इस (ग्रहणस्नानकी विधि)-को नित्य सुनता अथवा दूसरेको श्रवण कराता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २२—२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे चन्द्रादित्योपरागस्नानविधिर्नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें चन्द्रादित्योपरागस्नान-विधि नामक सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६७॥


अड़सठवाँ अध्याय

सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

<center>नारद उवाच</center><br>किमुद्वेगाद्भुते कृत्यमलक्ष्मीः केन हन्यते।<br>मृतवत्साभिषेकादिकार्येषु च किमिष्यते॥ १**नारदजीने पूछा—**प्रभो! किसी आकस्मिक एवं वेगशाली कष्टके प्राप्त होनेपर उसकी निवृत्तिके लिये तथा अद्भुत शान्तिके* लिये कौन-सा व्रत करना चाहिये? किस व्रतके अनुष्ठानसे दरिद्रताका विनाश किया जा सकता है तथा जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं, उस मृतवत्सा स्त्रीके स्नान आदि कार्योंमें उसकी शान्तिके लिये किस व्रतका विधान है?॥ १॥
<center>श्रीभगवानुवाच</center><br>पुरा कृतानि पापानि फलन्त्यस्मिंस्तपोधन।<br>रोगदौर्गत्यरूपेण तथैवेष्टवधेन च॥ २<br><br>तद्विघाताय वक्ष्यामि सदा कल्याणकारकम्।<br>सप्तमीस्नपनं नाम जनपीडाविनाशनम्॥ ३<br><br>बालानां मरणं यत्र क्षीरपाणां प्रदृश्यते।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च यौवने चापि वर्तताम्॥ ४<br><br>शान्तये तत्र वक्ष्यामि मृतवत्साभिषेचनम्।<br>एतदेवाद्वभुतोद्वेगचित्तभ्रमविनाशनम् ॥ ५**श्रीभगवान्‌ने कहा—**तपोधन! पूर्वजन्ममें किये हुए पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं सदा कल्याणकारी सप्तमीस्नपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीडाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुँहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु देखी जाती है वहाँ उसकी शान्तिके लिये मैं इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यही समस्त अद्भुत नामक उत्पातों, उद्वेगों और चित्तभ्रमका भी विनाशक है॥ २—५॥

* सामवेदीय 'अद्भुतब्राह्मण' (ताण्डव २६) तथा अथर्वपरिशिष्ट ७२ में अद्भुत शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।

* अध्याय ६८ * २६३


| भविष्यति च वाराहो यत्र कल्पस्तपोधन।<br>वैवस्वतश्च तत्रापि यदा तु मनुरुत्तमः ॥ ६<br>भविष्यति च तत्रैव पञ्चविंशतिमं यदा।<br>कृतं नाम युगं तत्र हैहयान्वयवर्धनः।<br>भविता नृपतिर्वीरः कृतवीर्यः प्रतापवान् ॥ ७<br>स सप्तद्वीपमखिलं पालयिष्यति भूत लम्।<br>यावद्वर्षसहस्राणि सप्तसप्तति नारद ॥ ८<br>जातमात्रं च तस्यापि यावत् पुत्रशतं तथा।<br>च्यवनस्य तु शापेन विनाशमुपयास्यति ॥ ९<br>सहस्रबाहुश्च यदा भविता तस्य वै सुतः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् सम्भूतो नृपलक्षणैः ॥ १०<br>कृतवीर्यस्तदाऽऽराध्य सहस्रांशुं दिवाकरम्।<br>उपवासैर्व्रतैर्दिव्यैर्वेदसूक्तैश्च नारद।<br>पुत्रस्य जीवनायालभेतत् स्नानमवाप्स्यति ॥ ११<br>कृतवीर्येण वै पृष्ट इदं वक्ष्यति भास्करः।<br>अशेषदुष्टशमनं सदा कल्मषनाशनम् ॥ १२ | तपोधन! जब वाराह-कल्प आयेगा, उसमें भी जब श्रेष्ठ वैवस्वत मनुका कार्यकाल होगा, उसमें जब पचीसवाँ कृतयुग आयेगा तब कृतवीर्य नामका एक प्रतापी एवं शूरवीर नरेश उत्पन्न होगा जो हैहयवंशकी वृद्धि करनेवाला होगा। नारद! वह सतहत्तर हजार वर्षोंतक सातों द्वीपोंकी समस्त पृथ्वीका पालन करेगा। उसके सौ पुत्र होंगे, परंतु महर्षि च्यवनके शापसे वे सभी जन्मते ही नष्ट हो जायँगे। नारद! जब उसके सहस्र भुजाधारी, मृग-नेत्र-सरीखे नेत्रोंवाला, शोभाशाली एवं सम्पूर्ण राज-लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र उत्पन्न होगा तब राजा कृतवीर्य अपने उस पुत्रके दीर्घ जीवनकी प्राप्तिके निमित्त उपवास, व्रत तथा दिव्य वेद-सूक्तोंद्वारा सहस्रकिरणधारी सूर्यकी आराधना करके इस विशेष स्नान (स्नपनव्रत)-को प्राप्त करेगा। उस समय कृतवीर्यद्वारा पूछे जानेपर भगवान् सूर्य अखिल दोषोंके शामक एवं पापनाशक इस व्रतको बतलायेंगे ॥ ६–१२ ॥ |

सूर्य उवाच

| अलं क्लेशेन महता पुत्रस्तव नराधिप।<br>भविष्यति चिरंजीवी किंतु कल्मषनाशनम् ॥ १३<br>सप्तमीस्नपनं वक्ष्ये सर्वलोकहिताय वै।<br>जातस्य मृतवत्सायाः सप्तमे मासि नारद।<br>अथवा शुक्लसप्तम्यामेतत् सर्वं प्रशस्यते ॥ १४<br>ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>बालस्य जन्मनक्षत्रं वर्जयेत् तां तिथिं बुधः।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च कृत्यं स्यादितरेषु च ॥ १५<br>गोमयेनानुलिप्तायां भूमावेकाग्निवत् तदा।<br>तण्डुलै रक्तशालीयैश्चरुं गोक्षीरसंयुतम्।<br>निर्वपेत् सूर्यरुद्राभ्यां तन्मन्त्राभ्यां विधानतः ॥ १६<br>कीर्तयेत् सूर्यदैवत्यं समाचिं च घृताहुतीः।<br>जुहुयाद् रुद्रसूक्तेन तद्वद् रुद्राय नारद ॥ १७ | **भगवान् सूर्य कहेंगे—**नरेश्वर! अब तुम अधिक कष्ट मत सहन करो, तुम्हारा पुत्र चिरंजीवी होगा, किंतु सम्पूर्ण लोकोंके हितके हेतु मैं जिस पापनाशक सप्तमीस्नपन-व्रतका वर्णन करूँगा, उसका अनुष्ठान तुम्हें भी करना चाहिये। नारद! मृतवत्सा स्त्रीके नवजात शिशुके लिये सातवें महीनेमें अथवा शुक्लपक्षकी किसी भी सप्तमी तिथिको यह सारा कार्य प्रशस्त माना गया है। यदि उस तिथिको बालकका जन्म-नक्षत्र पड़ता हो तो बुद्धिमान् कर्ताको उस तिथिका त्याग कर देना चाहिये। उसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये भी किये जानेवाले कार्यमें इसका विचार करना आवश्यक है। व्रतारम्भमें व्रती ग्रहबल एवं ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर एकाग्निक उपासककी भाँति गो-दुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान पकाये, फिर सूर्य और रुद्रको पृथक्-पृथक् उनके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक वह हव्यान प्रदान करे। उस समय सूर्यसूक्तकी सात ऋचाओंका पाठ करे और अग्निमें घीकी सात आहुतियोंसे हवन करे। नारद! रुद्रके लिये भी उसी प्रकार |

७० पण्यस्त्री-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

२६४ * मत्स्यपुराण * होतव्याः समिधश्चात्र तथैवार्कपलाशयोः । यवकृष्णातिलैर्होमः कर्तव्योऽष्टशतं पुनः ॥ १८ व्याहृतिभिस्तथाऽऽज्येन तथैवाष्टशतं पुनः। हुत्वा स्नानं च कर्तव्यं मङ्गलं येन धीमता ॥ १९ विप्रेण वेदविदुषा विधिवद् दर्भपाणिना । स्थापयित्वा तु चतुरः कुम्भान् कोणेषु शोभनान् ॥ २० पञ्चमं च पुनर्मध्ये दध्यक्षतविभूषितम् । स्थापयेदव्रणं कुम्भं समर्चेनाभिमन्त्रितम् ॥ २१ सौरेण तीर्थतोयेन पूर्णं रत्नसमन्वितम् । सर्वान् सर्वौषधैर्युक्तान् पञ्चगव्यसमन्वितान् । पञ्चरत्नफलैः पुष्पैर्वासोभिः परिवेष्टयेत् ॥ २२ गजाश्वरथ्यावल्मीकात् संगमाद्ध्रदगोकुलात् । संशुद्धां मृदानीय सर्वेष्वेव विनिक्षिपेत् ॥ २३ चतुर्ष्वपि च कुम्भेषु रत्नगर्भेषु मध्यमम् । गृहीत्वा ब्राह्मणस्तत्र सौरान् मन्त्रानुदीरयेत् ॥ २४ नारीभिः सप्तसंख्याभिर्व्यङ्गाङ्गीभिरत्र च। पूजिताभिर्यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः । सविप्राभिश्च कर्तव्यं मृतवत्साभिषेचनम् ॥ २५ दीर्घायुरस्तु बालोऽयं जीवपुत्रा च भामिनी । आदित्यश्चन्द्रमाः सार्धं ग्रहनक्षत्रमण्डलैः ॥ २६ सशक्रा लोकपाला वै ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । ते ते चान्ये च देवौघाः सदा पान्तु कुमारकम् ॥ २७ मित्रः शनिर्वा हुतभुग् ये च बालग्रहाः क्वचित् । पीडां कुर्वन्तु बालस्य मा मातुर्जनकस्य वै ॥ २८ ततः शुक्लाम्बरधरा कुमारपतिसंयुता । सप्तकं पूजयेद् भक्त्या स्त्रीणामथ गुरुं पुनः ॥ २९ काञ्चनीं च ततः कुर्यात् ताम्रपात्रोपरिस्थिताम् । प्रतिमां धर्मराजस्य गुरवे विनिवेदयेत् ॥ ३० रूद्रसूक्तकी ऋचाओंका पाठ एवं उनके द्वारा हवन करना चाहिये। इस व्रतमें हवनके लिये मन्दार और पलाशकी समिधा होनी चाहिये। पुनः जौं और काले तिलद्वारा एक सौ आठ बार हवन करनेका विधान है। उसी प्रकार व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्)- के उच्चारणपूर्वक एक सौ आठ बार घीकी आहुति देनी चाहिये। इस प्रकार हवन करके बुद्धिमान् व्रती पुनः स्नान करे; क्योंकि इससे मङ्गलकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर हाथमें कुश लिये हुए वेदज्ञ ब्राह्मणद्वारा वेदीके चारों कोणोंमें चार सुन्दर कलश स्थापित कराये। पुनः उसके बीचमें छिद्ररहित पाँचवाँ कलश स्थापित करे। उसे दही- अक्षतसे विभूषित करके सूर्यसम्बन्धिनी सात ऋचाओंसे अभिमन्त्रित कर दे। फिर उसे तीर्थ-जलसे भरकर उसमें रत्न या सुवर्ण डाल दे। इसी प्रकार सभी कलशोंमें सर्वौषधि, पञ्चगव्य, पञ्चरत्न, फल और पुष्प डालकर उन्हें वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर हाथीसार, घुड़शाल, विमवट, नदीके संगम, तालाब, गोशाला और राजद्वारसे शुद्ध मिट्टी लाकर उन सभी कलशोंमें छोड़ दे ॥ १३-२३ ॥ तदनन्तर कार्यकर्ता ब्राह्मण रत्नगर्भित चारों कलशोंके मध्यमें स्थित पाँचवें कलशको हाथमें लेकर सूर्य-मन्त्रोंका पाठ करे तथा सात ऐसी स्त्रियोंद्वारा, जो किसी अङ्गसे हीन न हों तथा जिनकी यथाशक्ति पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पूजा की गयी हो, ब्राह्मणके साथ-साथ उस घड़ेके जलसे मृतवत्सा स्त्रीका अभिषेक कराये। (अभिषेकके समय इस प्रकार कहे-) 'यह बालक दीर्घायु और यह स्त्री जीवपुत्रा (जीवित पुत्रवाली) हो। सूर्य, ग्रहों और नक्षत्र-समूहोंसहित चन्द्रमा, इन्द्रसहित लोकपालगण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, इनके अतिरिक्त अन्यान्य जो देव-समूह हैं, वे सभी इस कुमारकी सदा रक्षा करें। सूर्य, शनि, अग्नि अथवा अन्यान्य जो कोई बालग्रह हों वे सभी इस बालकको तथा इसके माता- पिताको कहीं भी कष्ट न पहुँचायें।' अभिषेकके पश्चात् वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करके अपने बच्चे और पतिके साथ उन सातों स्त्रियोंकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः गुरुकी पूजा करके धर्मराजकी स्वर्णमयी प्रतिमाको ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित करके गुरुको निवेदित कर दे।

* अध्याय ६८ *२६५
वस्त्रकाञ्चनरत्नौघैर्भक्ष्यैः सघृतपायसैः ।<br>पूजयेद् ब्राह्मणॉस्तद्वद् वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥ ३१<br>भुक्त्वा च गुरुणा चेयमुच्चार्या मन्त्रसन्ततिः ।<br>दीर्घायुरस्तु बालोऽयं यावद्वर्षशतं सुखी ॥ ३२<br>यत्किञ्चिदस्य दुरितं तत् क्षिप्तं वडवानले ।<br>ब्रह्मा रुद्रो वसुः स्कन्दो विष्णुः शक्रो हुताशनः ॥ ३३<br>रक्षन्तु सर्वे दुष्टेभ्यो वरदाः सन्तु सर्वदा ।<br>एवमादीनि वाक्यानि वदन्तं पूजयेद् गुरुम् ॥ ३४<br>शक्तितः कपिलां दद्यात् प्रणम्य च विसर्जयेत् ।<br>चरुं च पुत्रसहिता प्रणम्य रविशङ्करौ ॥ ३५<br>हुतशेषं तदाश्नीयादादित्याय नमोऽस्त्विति ।<br>इदमेवाद्भुतोद्वेगदुःस्वप्नेषु प्रशस्यते ॥ ३६उसी प्रकार कृपणता छोड़कर अन्य ब्राह्मणोंका भी वस्त्र, सुवर्ण, रत्नसमूह आदिसे पूजन करके उन्हें घी और खीरसहित भक्ष्य पदार्थोंका भोजन कराये। भोजनोपरान्त गुरुदेवको इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—'यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्षोंतक सुखका उपभोग करे। इसका जो कुछ पाप था उसे बडवानलमें डाल दिया गया। ब्रह्मा, रुद्र, वसुगण, स्कन्द, विष्णु, इन्द्र और अग्नि—ये सभी दुष्ट ग्रहोंसे इसकी रक्षा करें और सदा इसके लिये वरदायक हों।' इस प्रकारके वाक्योंका उच्चारण करनेवाले गुरुदेवका यजमान पूजन करे। अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें एक कपिला गौ प्रदान करे और फिर प्रणाम करके विदा कर दे। तत्पश्चात् मृतवत्सा स्त्री पुत्रको गोदमें लेकर सूर्यदेव और भगवान् शंकरको नमस्कार करे और हवनसे बचे हुए हव्यान्नको 'सूर्यदेवको नमस्कार है'—यह कहकर खा जाय। यही व्रत आश्चर्यजनक उद्विग्नता और दुःस्वप्न आदिमें भी प्रशस्त माना गया है॥ २४—३६॥
कर्तुर्जन्मदिनर्क्षं च त्यक्त्वा सम्पूजयेत् सदा ।<br>शान्त्यर्थं शुक्लसप्तम्यामेतत् कुर्वन् न सीदति ॥ ३७<br>सदानेन विधानेन दीर्घायुरभवन्नरः ।<br>संवत्सराणामयुतं शशास पृथिवीमिमाम् ॥ ३८<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सप्तमीस्नपनं रविः ।<br>कथयित्वा द्विजश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३९<br>एतत् सर्वं समाख्यातं सप्तमीस्नानमुत्तमम् ।<br>सर्वदुष्टोपशमनं बालानां परमं हितम् ॥ ४०<br>आरोग्यं भास्करादिच्छेद् धनमिच्छेद्धुताशनात् ।<br>ईश्वराज्ज्ञानमन्विच्छेन्मोक्षमिच्छेज्जनार्दनात् ॥ ४१<br>एतन्महापातकनाशनं स्यात्<br>परं हितं बालविवर्धनं च ।<br>शृणोति यश्चैन्नमनन्यचेता-<br>स्तस्यापि सिद्धिं मुनयो वदन्ति ॥ ४२इस प्रकार कर्ताके जन्मदिनके नक्षत्रको छोड़कर शान्ति-प्राप्तिके हेतु शुक्ल-पक्षकी सप्तमी तिथिमें सदा (सूर्य और शंकरका) पूजन करना चाहिये; क्योंकि इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाला कभी कष्टमें नहीं पड़ता। जो मनुष्य सदा इस विधानके अनुसार इस व्रतका अनुष्ठान करता है वह दीर्घायु होता है। (इसी व्रतके प्रभावसे) कृतवीर्यने दस हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीपर शासन किया था। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार सूर्यदेव इस पुण्यप्रद, परम पावन और आयुवर्धक सप्तमीस्नपन-व्रतका विधान बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार मैंने इस सप्तमीस्नपन-व्रतका, जो सर्वश्रेष्ठ, समस्त दोषोंको शान्त करनेवाला और बालकोंके लिये परम हितकारक है, समग्ररूपसे वर्णन कर दिया। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)-से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये। यह व्रत बड़े-से-बड़े पापोंका विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत-विधानको श्रवण करता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा मुनियोंका कथन है॥ ३७—४२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सप्तमीस्नपनव्रतं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सप्तमीस्नपन-व्रत नामक अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६८॥

२६६ * मत्स्यपुराण *


उनहत्तरवाँ अध्याय

भीमद्वादशी-व्रतका विधान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br>पुरा रथन्तरे कल्पे परिपृष्टो महात्मना।<br>मन्दरस्थो महादेवः पिनाकी ब्रह्मणा स्वयम्॥ १मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! प्राचीन रथन्तरकल्पकी बात है, पिनाकधारी भगवान् शंकर मन्दराचलपर विराजमान थे। उस समय महात्मा ब्रह्माजीने स्वयं ही उनके पास जाकर प्रश्न किया॥ १॥
ब्रह्मोवाच<br>कथमारोग्यमैश्वर्यमनन्तममरेश्वर ।<br>स्वल्पेन तपसा देव भवेन्मोक्षोऽथवा नृणाम्॥ २<br><br>किंमज्ञातं महादेव त्वत्प्रसादादधोक्षज।<br>स्वल्पकेनाथ तपसा महत्फलमिहोच्यताम्॥ ३ब्रह्माजीने पूछा— देवेश्वर! थोड़ी-सी तपस्यासे मनुष्योंको नीरोगता, अनन्त ऐश्वर्य और मोक्षकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? महादेव! आपके लिये कुछ अज्ञात तो है नहीं, अर्थात् आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये अधोक्षज! आपकी कृपासे थोड़ी-सी तपस्याद्वारा इस लोकमें महान् फलकी प्राप्तिका क्या उपाय है? यह बतलाइये॥ २-३॥
मत्स्य उवाच<br>एवं पृष्टः स विश्वात्मा ब्रह्मणा लोकभावनः।<br>उमापतिरुवाचेदं मनसः प्रीतिकारकम्॥ ४मत्स्यभगवान्ने कहा— ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर जगत्की उत्पत्ति एवं वृद्धि करनेवाले विश्वात्मा उमानाथ शिव मनको प्रिय लगनेवाले वचन बोले॥ ४॥
ईश्वर उवाच<br>अस्माद् रथन्तरात् कल्पात् त्रयोविंशात् पुनर्यदा।<br>वाराहो भविता कल्पस्तस्य मन्वन्तरे शुभे॥ ५<br><br>वैवस्वताख्ये संजाते सप्तमे सप्तलोककृत्।<br>द्वापराख्यं युगं तद्वदष्टाविंशतिमं जगुः॥ ६<br><br>तस्यान्ते स महादेवो वासुदेवो जनार्दनः।<br>भारावतरणार्थाय त्रिधा विष्णुर्भविष्यति॥ ७<br><br>द्वैपायनऋषिस्तद्वद् रौहिणेयोऽथ केशवः।<br>कंसादिदर्पमथनः केशवः क्लेशनाशनः॥ ८<br><br>पुरीं द्वारवतीं नाम साम्प्रतं या कुशस्थली।<br>दिव्यानुभावसंयुक्तामधिवासाय शार्ङ्गिणः।<br>त्वष्टा ममाज्ञया तद्वत् करिष्यति जगत्पतेः॥ ९<br><br>तस्यां कदाचिदासीनः सभायाममितद्युतिः।<br>भार्याभिर्वृष्णिभिश्चैव भूभृद्भिर्भूरिदक्षिणैः॥ १०<br><br>कुरुभिर्देवगन्धर्वैरभितः कैटभार्दनः।<br>प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्मसंवर्धिनीषु च॥ ११ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! इस तेईसवें रथन्तरकल्पके पश्चात् जब पुनः वाराहकल्प आयेगा, तब उसके सातवें वैवस्वत नामक मङ्गलमय मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर अट्ठाईसवें द्वापर नामक युगके अन्तमें सातों लोकोंके रचयिता देवाधिदेव जनार्दन भगवान् विष्णु वासुदेवरूपसे पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये अपनेको महर्षि द्वैपायन, रोहिणीनन्दन बलराम और केशवरूपसे तीन भागोंमें विभक्त करके अवतीर्ण होंगे। वे कष्टहारी केशव कंस आदि राक्षसोंके मदको चूर्ण करेंगे। शार्ङ्गधनुषधारी उन जगत्पतिके निवासके लिये मेरी आज्ञासे विश्वकर्मा द्वारवती (द्वारका) नामकी पुरीका निर्माण करेंगे, जो समस्त दिव्य भावोंसे युक्त होगी। वह इस समय कुशस्थली नामसे विख्यात है। वहीं कभी जब द्वारकाकी सभामें दानवराज कैटभके संहारक अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्नियों, वृष्णिवंशी पुरुषों, प्रचुर दक्षिणा देनेवाले राजाओं, कौरवों और देव-गन्धर्वोंसे घिरे हुए बैठे रहेंगे और धर्मकी वृद्धि करनेवाली पौराणिक कथाएँ होती रहेंगी,
* अध्याय ६१ *२६७

| कथान्ते भीमसेनेन परिपृष्टः प्रतापवान्।<br>त्वया पृष्टस्य धर्मस्य रहस्यस्यास्य भेदकृत्॥ १२<br><br>भविता स तदा ब्रह्मन् कर्ता चैव वृकोदरः।<br>प्रवर्तकोऽस्य धर्मस्य पाण्डुपुत्रो महाबलः॥ १३<br><br>यस्य तीक्ष्णो वृको नाम जठरे हव्यवाहनः।<br>मया दत्तः स धर्मात्मा तेन चासौ वृकोदरः॥ १४<br><br>मतिमान् दानशीलश्च नागायुतबलो महान्।<br>भविष्यत्यजरः श्रीमान् कंदर्प इव रूपवान्॥ १५<br><br>धार्मिकस्याप्यशक्तस्य तीव्राग्नित्वादुपोषणे।<br>इदं व्रतमशेषाणां व्रतानामधिकं यतः॥ १६<br><br>कथयिष्यति विश्वात्मा वासुदेवो जगद्गुरुः।<br>अशेषयज्ञफलदमशेषाघविनाशनम् ॥ १७<br><br>अशेषदुष्टशमनमशेषसुरपूजितम् ।<br>पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>भविष्यं च भविष्याणां पुराणानां पुरातनम्॥ १८<br><br><center>वासुदेव उवाच</center><br>यद्यष्टमीचतुर्दश्योर्द्वादशीष्वथ भारत।<br>अन्येष्वपि दिनर्क्षेषु न शक्तस्त्वमुपोषितुम्॥ १९<br><br>ततः पुण्यां तिथिमिमां सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>उपोष्य विधिनानेन गच्छ विष्णोः परं पदम्॥ २०<br><br>माघमासस्य दशमी यदा शुक्ला भवेत् तदा।<br>घृतेनाभ्यञ्जनं कृत्वा तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ २१<br><br>तथैव विष्णुमभ्यर्च्य नमो नारायणाय च।<br>कृष्णाय पादौ सम्पूज्य शिरः सर्वात्मने नमः॥ २२<br><br>वैकुण्ठायेति वै कण्ठमुरः श्रीवत्सधारिणे।<br>शङ्खिने चक्रिणे तद्वद् गदिने वरदाय वै।<br>सर्वं नारायणस्यैवं सम्पूज्या बाहवः क्रमात्॥ २३ | तब कथाकी समाप्तिपर भीमसेन प्रतापी श्रीकृष्णसे वैसा ही प्रश्न करेंगे, जो तुम्हारे द्वारा पूछा गया है और इस धर्मके रहस्यके भेदको प्रकट करनेवाला है। ब्रह्मन्! उस समय पाण्डुपुत्र महाबली भीमसेन इस धर्मके कर्ता एवं प्रवर्तक होंगे। उनके उदरमें मेरे द्वारा दिये गये वृक नामक तीक्ष्ण अग्निका निवास होगा, इसी कारण वे धर्मात्मा 'वृकोदर' नामसे विख्यात होंगे। वे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न, दानशील, दस हजार हाथियोंके सदृश बलशाली, महत्त्वयुक्त, जरारहित, लक्ष्मीवान् और कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली होंगे। भीमसेनके धर्मात्मा होनेपर भी उदरमें तीव्र अग्निके स्थित रहनेके कारण उपवासमें असमर्थ जानकर विश्वात्मा जगद्गुरु भगवान् वासुदेव उन्हें यह व्रत बतलायेंगे; क्योंकि यह सम्पूर्ण व्रतोंमें श्रेष्ठ है। यह समस्त यज्ञोंका फलदाता, सम्पूर्ण पापोंका विनाशक, अखिल दोषोंका शामक, समस्त देवताओंद्वारा सम्मानित, सम्पूर्ण पवित्र पदार्थोंमें परम पवित्र, निखिल मङ्गलोंमें श्रेष्ठ मङ्गलरूप, भविष्यमें सर्वाधिक भव्य और पुरातनोंमें विशेष पुरातन है॥ ५—१८॥<br><br>भगवान् वासुदेव कहेंगे— भारत! यदि तुम अष्टमी, चतुर्दशी, द्वादशी तिथियोंमें तथा अन्यान्य दिनों और नक्षत्रोंमें उपवास करनेमें असमर्थ हो तो मैं तुम्हें एक पापविनाशिनी तिथिका परिचय देता हूँ। उस दिन निम्नाङ्कित विधिसे उपवास कर तुम श्रीविष्णुके परम धामको प्राप्त करो। जिस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी दशमी* तिथि आये, उस दिन (व्रतीको चाहिये कि) समस्त शरीरमें घी लगाकर तिलमिश्रित जलसे स्नान करे तथा 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रसे भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। 'श्रीकृष्णाय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी और 'सर्वात्मने नमः' कहकर मस्तककी पूजा करे। 'वैकुण्ठाय नमः' इस मन्त्रसे कण्ठकी और 'श्रीवत्सधारिणे नमः' इससे वक्षःस्थलकी अर्चा करे। फिर 'शङ्खिने नमः', 'चक्रिणे नमः', 'गदिने नमः', वरदाय नमः तथा 'सर्वं नारायणस्य' (सब कुछ नारायणका ही है)—ऐसा कहकर आवाहन आदिके क्रमसे भगवान्की बाहुओंकी पूजा करे॥ १९—२३॥ |


* अन्य पुराणोंमें तथा एकादशीमाहात्म्य आदिमें ज्येष्ठ शुक्ल ११को निर्जला या भीमसेनी एकादशी अथवा द्वादशी कहा गया है।

२६८ * मत्स्यपुराण *

दामोदरायेत्युदरं मेढ्रं पञ्चशराय वै।<br>ऊरू सौभाग्यनाथाय जानुनी भूतधारिणे॥ २४<br><br>नमो नीलाय वै जङ्घे पादौ विश्वसृजे नमः।<br>नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै॥ २५<br><br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै धृष्ट्यै हृष्ट्यै नमो नमः।<br>नमो विहङ्गनाथाय वायुवेगाय पक्षिणे।<br>विषप्रमाथिने नित्यं गरुडं चाभिपूजयेत्॥ २६<br><br>एवं सम्पूज्य गोविन्दमुमापतिविनायकौ।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्भक्ष्यैर्नानाविधैरपि॥ २७<br><br>गव्येन पयसा सिद्धां कृसरामथ वाग्यतः।<br>सर्पिषा सह भुक्त्वा च गत्वा शतपदं बुधः॥ २८<br><br>न्यग्रोधं दन्तकाष्ठमथवा खादिरं बुधः।<br>गृहीत्वा धावयेद् दन्तानाचान्तः प्रागुदङ्मुखः॥ २९<br><br>ब्रूयात् सायंतनीं कृत्वा संध्यामस्तमिते रवौ।<br>नमो नारायणायेति त्वामहं शरणं गतः॥ ३०'इसके बाद 'दामोदराय नमः' कहकर उदरका, 'पञ्चशराय नमः' इस मन्त्रसे जननेन्द्रियका, 'सौभाग्यनाथाय नमः' इससे दोनों जंघोंका, 'भूतधारिणे नमः' से दोनों घुटनोंका, 'नीलाय नमः' इस मन्त्रसे पिंडलियों (घुटनेसे नीचेके भाग)-का और 'विश्वसृजे नमः' इससे पुनः दोनों चरणोंका पूजन करे। तत्पश्चात् 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'धृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे भगवती लक्ष्मीकी पूजा करे। इसके बाद 'विहङ्गनाथाय नमः', 'वायुवेगाय नमः', 'पक्षिणे नमः', 'विषप्रमाथिने नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा सदा गरुडकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार गन्ध, पुष्प, धूप तथा नाना प्रकारके पकवानोंद्वारा श्रीकृष्णकी, महादेवजीकी तथा गणेशजीकी भी पूजा करे। फिर गौके दूधकी बनी हुई खीर लेकर घीके साथ मौनपूर्वक भोजन करे। भोजनके अनन्तर विद्वान् पुरुष सौ पग चलकर बरगद अथवा खैरकी दाँतुन ले उसके द्वारा दाँतोंको साफ करे, फिर मुँह धोकर आचमन करे। सूर्यास्त होनेके बाद पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख बैठकर सायंकालीन संध्या करे। उसके अन्तमें यह कहे—'भगवान् श्रीनारायणको नमस्कार है। भगवन्! मैं आपकी शरणमें आया हूँ।' (इस प्रकार प्रार्थना करके रात्रिमें शयन करे।)॥ २४—३०॥
एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य च केशवम्।<br>रात्रिं च सकलां स्थित्वा स्नानं च पयसा तथा॥ ३१<br><br>सर्पिषा चापि दहनं हुत्वा ब्राह्मणपुङ्गवैः।<br>सहैव पुण्डरीकाक्ष द्वादश्यां क्षीरभोजनम्॥ ३२<br><br>करिष्यामि यतात्माहं निर्विघ्नेनास्तु तच्च मे।<br>एवमुक्त्वा स्वपेद् भूमावितिहासकथां पुनः॥ ३३<br><br>श्रुत्वा प्रभाते संजाते नदीं गत्वा विशाम्पते।<br>स्नानं कृत्वा मुदा तद्वत् पाषण्डानभिवर्जयेत्॥ ३४<br><br>उपास्य संध्यां विधिवत् कृत्वा च पितृतर्पणम्।<br>प्रणम्य च हृषीकेशं समलोकैकमीश्वरम्॥ ३५<br><br>गृहस्य पुरतो भक्त्या मण्डपं कारयेद् बुधः।<br>दशहस्तमथाष्टौ वा करान् कुर्याद् विशांपते॥ ३६दूसरे दिन एकादशीको निराहार रहकर भगवान् केशवकी पूजा करे और रातभर बैठा रहकर प्रातःकाल दूध या जलसे स्नान करे। फिर अग्निमें घीकी आहुति देकर प्रार्थना करे—'पुण्डरीकाक्ष! मैं जितेन्द्रिय होकर द्वादशीको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ ही खीरका भोजन करूँगा। मेरा यह व्रत निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण हो।' यह कहकर इतिहास-पुराणकी कथा सुननेके पश्चात् भूमिपर शयन करे। राजन्! सबेरा होनेपर जाकर नदीमें प्रसन्नतापूर्वक स्नान करे। पाखण्डियोंके संसर्गसे दूर रहे। विधिपूर्वक संध्योपासन करके पितरोंका तर्पण करे। फिर सातों लोकोंके एकमात्र अधीश्वर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके बुद्धिमान् व्रती घरके सामने भक्तिपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये। राजन्! वह मण्डप दस अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा होना चाहिये।

७१ अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय ६१ *२६९
संस्कृतहिन्दी
चतुर्हस्तां शुभां कुर्याद् वेदीमरिनिषूदन।<br>चतुर्हस्तप्रमाणं च विन्यसेत् तत्र तोरणम्॥ ३७<br><br>आरोप्य कलशं तत्र दिक्पालान् पूजयेत् ततः।<br>छिद्रेण जलसम्पूर्णमथ कृष्णाजिनस्थितः।<br>तस्य धारां च शिरसा धारयेत् सकलां निशाम्॥ ३८<br><br>तथैव विष्णोः शिरसि क्षीरधारां प्रपातयेत्।<br>अरत्निमात्रं कुण्डं च कुर्यात् तत्र त्रिमेखलम्॥ ३९<br><br>योनिवक्त्रं च तत् कृत्वा ब्राह्मणैः यवसर्पिषी।<br>तिलांश्च विष्णुदैवत्यैर्मन्त्रैरेकाग्निवत् तदा॥ ४०<br><br>हुत्वा च वैष्णवं सम्यक् चरुं गोक्षीरसंयुतम्।<br>निष्पावार्धप्रमाणां वै धारामाज्यस्य पातयेत्॥ ४१शत्रुसूदन! उसके भीतर चार हाथकी सुन्दर वेदी बनवाये। वेदीके ऊपर चार हाथका तोरण लगाये। फिर (सुदृढ़ खम्भोंके आधारपर) एक कलश रखे और दिक्पालोंकी पूजा करे, उसमें नीचेकी ओर (उड़दके दानेके बराबर) छेद कर दे। तदनन्तर उसे जलसे भरे और स्वयं उसके नीचे काला मृगचर्म बिछाकर बैठ जाय। कलशसे गिरती हुई धाराको सारी रात अपने मस्तकपर धारण करे। उसी प्रकार भगवान् विष्णुके सिरपर दूधकी धारा गिराये। फिर उनके निमित्त एक कुण्ड बनवाये, जो हाथभर लंबा, उतना ही चौड़ा और उतना ही गहरा हो। उसके ऊपरी किनारेपर तीन मेखलाएँ बनवाये। उसमें यथास्थान योनि और मुखके चिह्न बनवाये। तदनन्तर ब्राह्मण (कुण्डमें अग्नि प्रज्वलित कर) एकाग्निक उपासककी तरह जौ, घी और तिलोंका श्रीविष्णु-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा हवन करे। फिर गो-दुग्धसे बने हुए चरुका हवन करके विधिपूर्वक वैष्णवयागका सम्पादन करे। फिर कुण्डके मध्यमें मटरकी दालके बराबर मोटी घीकी धारा गिराये॥ ३१—४१॥
जलकुम्भान् महावीर्य स्थापयित्वा त्रयोदश।<br>भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तान् सितवस्त्रैरलंकृतान्॥ ४२<br>युक्तानौदुम्बरैः पात्रैः पञ्चरत्नसमन्वितान्।<br>चतुर्भिर्बह्वृचैर्होमस्तत्र कार्य उदङ्मुखैः॥ ४३<br>रुद्रजाप्यंश्चतुर्भिश्च यजुर्वेदपरायणैः।<br>वैष्णवानि तु सामानि चतुरः सामवेदिनः।<br>अरिष्टवर्गसहितान्यभितः परिपाठयेत्॥ ४४<br>एवं द्वादश तान् विप्रान् वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूजयेदङ्गुलीयैश्च कटकैर्हेमसूत्रकैः॥ ४५<br>वासोभिः शयनीयैश्च वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>एवं क्षपातिवाह्या च गीतमङ्गलनिःस्वनैः॥ ४६<br>उपाध्यायस्य च पुनर्द्विगुणं सर्वमेव तु।<br>ततः प्रभाते विमले समुत्थाय त्रयोदश॥ ४७<br>गां वै दद्यात् कुरुश्रेष्ठ सौवर्णमुखसंयुताः।<br>पयस्विनीः शीलवतीः कांस्यदोहसमन्विताः॥ ४८<br>रौप्यखुराः सवस्त्राश्च चन्दनेनाभिषेचिताः।<br>तास्तु तेषां ततो भक्त्या भक्ष्यभोज्यान्नतर्पितान्॥ ४९महावीर्य! फिर जलसे भरे हुए तेरह कलशोंकी स्थापना करे। वे नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंसे युक्त और श्वेत वस्त्रोंसे अलंकृत होने चाहिये। उनके साथ उदुम्बर-पात्र तथा पञ्चरत्नका होना भी आवश्यक है। वहाँ चार ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तरकी ओर मुख करके हवन करें, चार यजुर्वेदी विप्र रुद्राध्यायका पाठ करें तथा चार सामवेदी ब्राह्मण चारों ओरसे अरिष्टवर्गसहित वैष्णवसामका गान करते रहें। इस प्रकार उपर्युक्त बारह ब्राह्मणोंको वस्त्र, पुष्प, चन्दन, अँगूठी, कड़े, सोनेकी जंजीर, वस्त्र तथा शय्या आदि देकर उनका पूर्ण सत्कार करे। इस कार्यमें धनकी कृपणता न करे। इस प्रकार गीत और माङ्गलिक शब्दोंके साथ रात्रि व्यतीत करे। उपाध्याय (आचार्य या पुरोहित)-को सब वस्तुएँ अन्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा दूनी मात्रामें अर्पण करे। कुरुश्रेष्ठ! रात्रिके बाद जब निर्मल प्रभातका उदय हो, तब शयनसे उठकर (नित्यकर्मके पश्चात्) मुखपर सोनेके पत्रसे विभूषित की हुई तेरह गौएँ दान करनी चाहिये। वे सब-की-सब दूध देनेवाली और सीधी हों। उनके खुर चाँदीसे मँढ़े हुए हों तथा उन सबको वस्त्र ओढ़ाकर चन्दनसे विभूषित किया गया हो। गौओंके साथ काँसेका दोहनपात्र भी होना चाहिये। गोदानके पश्चात् उन सभी ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे
२७०* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
कृत्वा वै ब्राह्मणान् सर्वानन्नैर्नानाविधैस्तथा।<br>भुक्त्वा चाक्षारलवणमात्मना च विसर्जयेत्॥ ५०तृप्त करके स्वयं भी क्षार लवणसे रहित अन्नका भोजन करके ब्राह्मणोंको विदा करे॥४२—५०॥
अनुगम्य पदान्यष्टौ पुत्रभार्यासमन्वितः।<br>प्रीयतामत्र देवेशः केशवः क्लेशनाशनः॥ ५१पुत्र और स्त्रीके साथ आठ पगोंतक उनके पीछे-पीछे जाय और इस प्रकार प्रार्थना करे—'हमारे इस कार्यसे देवताओंके स्वामी भगवान् श्रीविष्णु, जो सबका क्लेश दूर करनेवाले हैं, प्रसन्न हों।
शिवस्य हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये शिवः।<br>यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्ति चायुषः॥ ५२श्रीशिवके हृदयमें श्रीविष्णु हैं और श्रीविष्णुके हृदयमें श्रीशिव विराजमान हैं। मैं यदि इन दोनोंमें अन्तर न देखता होऊँ तो इस धारणासे मेरी आयु बढ़े तथा कल्याण हो।' यह कहकर
एवमुच्चार्य तान् कुम्भान् गाश्चैव शयनानि च।<br>वासांसि चैव सर्वेषां गृहाणि प्रापयेद् बुधः॥ ५३बुद्धिमान् व्रती उन कलशों, गौओं, शय्याओं तथा वस्त्रोंको सब ब्राह्मणके घर पहुँचा दे।
अभावे बहुशय्यानामेकामपि सुसंस्कृताम्।<br>शय्यां दद्याद् द्विजातेश्च सर्वोपस्करसंयुताम्॥ ५४अधिक शय्याएँ सुलभ न हों तो गृहस्थ पुरुष एक ही सुसज्जित एवं सभी उपकरणोंसे सम्पन्न शय्या ब्राह्मणको दान करे।
इतिहासपुराणानि वाचयित्वातिवाहयेत्।<br>तद्दिनं नरशार्दूल य इच्छेद् विपुलां श्रियम्॥ ५५नरसिंह! जिसे विपुल लक्ष्मीकी अभिलाषा हो, उसे वह दिन इतिहास और पुराणोंके श्रवणमें ही बिताना चाहिये।
तस्मात् त्वं सत्त्वमालम्ब्य भीमसेन विमत्सरः।<br>कुरु व्रतमिदं सम्यक् स्नेहात् तव मयेरितम्॥ ५६अतः भीमसेन! तुम भी सत्त्वगुणका आश्रय ले, मात्सर्यका त्यागकर इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान करो। (यह बहुत गुप्त व्रत है, किंतु) स्नेहवश मैंने तुम्हें बता दिया है।
त्वया कृतमिदं वीर त्वन्नामाख्यं भविष्यति।<br>सा भीमद्वादशी ह्येषा सर्वपापहरा शुभा।<br>या तु कल्याणिनी नाम पुरा कल्पेषु पठ्यते॥ ५७वीर! तुम्हारे द्वारा इसका अनुष्ठान होनेपर यह व्रत तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगा। इसे लोग 'भीमद्वादशी' कहेंगे। यह भीमद्वादशी सब पापोंको नाश करनेवाली और शुभकारिणी होगी। प्राचीन कल्पोंमें इस व्रतको 'कल्याणिनी व्रत' कहा जाता था।
त्वमादिकर्ता भव सौकरेऽस्मिन्<br>कल्पे महावीरवरप्रधान।<br>यस्याः स्मरन् कीर्तनमप्यशेषं<br>विनष्टपापस्त्रिदशाधिपः स्यात्॥ ५८महान् वीरोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेन! इस वाराहकल्पमें तुम इस व्रतके सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता बनो। इसका स्मरण और कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्यका सारा पाप नष्ट हो जाता है और वह देवताओंका राजा इन्द्र बन जाता है॥५१–५८॥
कृत्वा च यामप्सरसामधीशा<br>वेश्या कृता ह्यन्यभवान्तरेषु।<br>आभीरकन्यातिकुतूहलेन<br>सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥ ५९जन्मान्तरमें एक अहीरकी कन्याने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वेश्या अप्सराओंकी अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोकमें उर्वशी नामसे विख्यात है।
जातातथवा वैश्यकुलोद्भवापि<br>पुलोमकन्या पुरूहूतपत्नी।<br>तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं<br>मम प्रिया सम्प्रति सत्यभामा॥ ६०इसी प्रकार वैश्यकुलमें उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्याने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव)-की पुत्रीरूपमें उत्पन्न होकर इन्द्रकी पत्नी बनी। उसके अनुष्ठान-कालमें जो उसकी सेविका थी,

७२ अङ्गारक-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय ६९ * <span style="float: right;">२७१</span>


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्नातः पुरा मण्डलमेष तद्वत्<br>तेजोमयं वेदशरीरमाप।<br>अस्यां च कल्याणतिथौ विवस्वान्<br>सहस्रधारेण सहस्ररश्मिः॥ ६१<br><br>इदमेव कृतं महेन्द्रमुख्यै-<br>र्वसुभिर्देवसुरारिभिस्तथा तु।<br>फलमस्य न शक्यतेऽभिवक्तुं<br>यदि जिह्वायुतकोटयो मुखे स्युः॥ ६२वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है। पूर्वकालमें इस कल्याणमयी तिथिको सहस्र किरणधारी सूर्यने हजारों धाराओंसे स्नान किया था, इसी कारण उन्हें उस प्रकारका तेजोमय मण्डल और वेदमय शरीर प्राप्त हुआ है। महेन्द्र आदि देवताओं, वसुओं तथा असुरोंने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया है। यदि एक मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हों तो भी इसके फलका पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ५९-६२॥
कलिकलुषविदारिणीमनन्ता-<br>मिति कथयिष्यति यादवेन्द्रसूनुः।<br>अपि नरकगतान् पितॄनशेषा-<br>नलमुद्धर्तुमिहैव यः करोति॥ ६३<br><br>य इदमघविदारणं शृणोति<br>भक्त्या परिपठतीह परोपकारहेतोः।<br>तिथिमिह सकलार्थभाङ्नरेन्द्र-<br>स्तव चतुरानन साम्यतामुपैति॥ ६४<br><br>कल्याणिनी नाम पुरा बभूव<br>या द्वादशी माघदिनेषु पूज्या।<br>सा पाण्डुपुत्रेण कृता भविष्य-<br>त्यनन्तपुण्यानघ भीमपूर्वा॥ ६५ब्रह्मन्! कलियुगके पापोंको नष्ट करनेवाली एवं अनन्त फल प्रदान करनेवाली इस कल्याणमयी तिथिकी महिमाका वर्णन यादवराजकुमार भगवान् श्रीकृष्ण अपने श्रीमुखसे करेंगे। जो इसके व्रतका अनुष्ठान करता है, उसके नरकमें पड़े हुए सम्पूर्ण पितरोंका भी यह उद्धार करनेमें समर्थ है। चतुरानन! जो अत्यन्त भक्तिके साथ इस पापनाशक व्रतकी कथाको सुनता तथा दूसरोंके उपकारके लिये पढ़ता है, वह इस लोकमें जनताका स्वामी और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका भागी हो जाता है तथा परलोकमें आपकी समताको प्राप्त कर लेता है। पूर्वकल्पमें जो माघमासकी द्वादशी परम पूजनीय कल्याणिनी तिथिके नामसे प्रसिद्ध थी, वही पाण्डुनन्दन भीमसेनके व्रत करनेपर अनन्त पुण्यदायिनी 'भीमद्वादशी' के नामसे प्रसिद्ध होगी॥ ६३-६५॥
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इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भीमद्वादशीव्रतं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भीमद्वादशी-व्रत नामक उनहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६९॥

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२७२* मत्स्यपुराण *

सत्तरवाँ अध्याय

पण्यस्त्री-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ब्रह्मोवाचब्रह्माजीने पूछा—
वर्णाश्रमाणां प्रभवः पुराणेषु मया श्रुतः।<br>सदाचारस्य भगवन् धर्मशास्त्रविनिश्चयः।<br>पण्यस्त्रीणां सदाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ १॥भगवान्! मैं पुराणोंमें सभी वर्णों और आश्रमोंके सदाचारकी उत्पत्ति तथा धर्मशास्त्रके सिद्धान्तोंको तो सुन चुका, अब मैं पण्यस्त्रियों (मूल्यद्वारा खरीदी जानेवाली स्त्रियों)-के समुचित आचारको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ*॥ १॥
ईश्वर उवाचभगवान् शंकरने कहा—
तस्मिन्नेव युगे ब्रह्मन् सहस्राणि तु षोडश।<br>वासुदेवस्य नारीणां भविष्यन्त्यम्बुजोद्भव॥ २कमलोद्भव ब्रह्मन्! उसी द्वापरयुगमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी सोलह सहस्र पत्नियाँ होंगी।
ताभिर्वसन्तसमये कोकिलालिकुलाकुले।<br>पुष्पितोपवने फुल्लकह्लारसरस्तटे॥ ३एक बार वसन्त-ऋतुमें वे सभी नारियाँ खिले हुए पुष्पोंसे सुशोभित वनमें उत्फुल्ल कमल-पुष्पोंसे परिपूर्ण एक सरोवरके तटपर जायँगी। उस समय कोकिल कूज रहे होंगे, भ्रमर-समूह अपनी गुंजार चतुर्दिक् बिखेर रहे होंगे तथा शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन बह रहा होगा। इसी समय वे निश्चिन्त रूपसे एकत्र होकर जलपान आदि कार्योंमें लीन होंगी।
निर्भरं सह पत्नीभिः प्रसक्ताभिरलङ्कृतः।<br>रमयिष्यति विश्वात्मा कृष्णो यदुकुलोद्वहः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् मालतीकृतशेखरः॥ ४उस समय यदुकुलके उद्धारक विश्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी उनके साथ वहाँ भ्रमण करेंगे।
गच्छन् समीपमार्गेण साम्बः परपुरञ्जयः।<br>साक्षात् कन्दर्परूपेण सर्वाभरणभूषितः॥ ५उसी समय शत्रु-नगरीको जीतनेवाले, अलंकारोंसे सुशोभित श्रीमान् साम्ब, जिनके नेत्र मृगनेत्रसरीखे होंगे, जिनका मस्तक मालतीकी मालासे सुशोभित होगा, जो सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा रूपसे साक्षात् कामदेवके समान होंगे, उस सरोवरके समीपवर्ती मार्गसे जा निकलेंगे।
अनङ्गशरतप्ताभिः साभिलाषमवेक्षितः।<br>प्रवृद्धो मन्मथस्तासां भविष्यति यदात्मनि॥ ६उन्हें देखकर वे सभी (स्त्रियाँ) रागभरी दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगेंगी।
तदावेक्ष्य जगन्नाथः सर्वतो ध्यानचक्षुषा।<br>शापं वक्ष्यति ताः सर्वा वो हरिष्यन्ति दस्यवः।<br>मत्परोक्षं यतः कामलौल्यादीदृग्विधं कृतम्॥ ७तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण ध्यान-दृष्टिसे सारा वृत्तान्त जानकर उन्हें शाप दे देंगे—'चूँकि तुमलोगोंने मुझसे विश्वासघात किया; कामलोलुपतावश ऐसा जघन्य कार्य किया है, इसलिये चोर तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे।'
ततः प्रसादितो देव इदं वक्ष्यति शार्ङ्गभृत्।<br>ताभिः शापाभितप्ताभिर्भगवान् भूतभावनः॥ ८तत्पश्चात् शापसे संतप्त हुई उन स्त्रियोंद्वारा प्रसन्न किये जानेपर
उत्तारभूतं दाशत्वं समुद्राद् ब्राह्मणप्रियः।<br>उपदेक्ष्यत्यनन्तात्मा भाविकल्याणकारकम्॥ ९भगवान् श्रीकृष्ण जो अनन्तात्मा, ब्राह्मणोंके प्रेमी तथा प्राणियोंको भवसागरसे पार करनेवाले कर्णधार हैं, उन्हें भविष्यमें

* इस अध्यायमें कृपालु भगवान्द्वारा—'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९। ३२)-के भाव, पापयोनिकी व्याख्या तथा उनके कल्याणकी पद्धति निर्दिष्ट हुई हैं। यह अध्याय पद्म० खं० २३। ७४—१४६ तथा भविष्य० ४। १२०। १—७३ तकमें तो ज्यों-का-त्यों आता ही है।

* अध्याय ७० *२७३
भवतीनामृषिर्दाल्भ्यो यद् व्रतं कथयिष्यति।<br>तदेवोत्तारणायालं दासीत्वेऽपि भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा ताः परिष्वज्य गतो द्वारवतीश्वरः॥ १०<br>ततः कालेन महता भारावतरणे कृते।<br>निवृत्ते मौसले तद्वत् केशवे दिवमागते॥ ११<br>शून्ये यदुकुले सर्वैःशूरैरपि जितेऽर्जुने।<br>हृतासु कृष्णपत्नीषु दाशभोग्यासु चाम्बुधौ॥ १२<br>तिष्ठन्तीषु च दौर्गत्यसंतप्तासु चतुर्मुख।<br>आगमिष्यति योगात्मा दाल्भ्यो नाम महातपाः॥ १३<br>तास्तमर्घ्येण सम्पूज्य प्रणिपत्य पुनः पुनः।<br>लालप्यमाना बहुशो बाष्पपर्याकुलेक्षणाः॥ १४<br>स्मरन्त्यो विपुलान् भोगान् दिव्यमाल्यानुलेपनम्।<br>भर्तारं जगतामीशमनन्तमपराजितम्॥ १५<br>दिव्यभावां तां च पुरीं नानारत्नगृहाणि च।<br>द्वारकावासिनः सर्वान् देवरूपान् कुमारकान्।<br>प्रश्नमेवं करिष्यन्ति मुनेरभिमुखं स्थिताः॥ १६इस प्रकार कल्याणकारी मार्गका उपदेश करेंगे—'महर्षि दाल्भ्य तुमलोगोंको जो व्रत बतलायेंगे, वही दासीत्वावस्थामें भी तुमलोगोंका उद्धार करनेमें समर्थ होगा।' यों कहकर द्वारकाधीश वहाँसे चले जायेंगे। चतुर्मुख! इसके बहुत दिन बाद जब श्रीभगवान्द्वारा पृथ्वीका भार दूर करने, मौसलयुद्ध समाप्त होने—मूसलद्वारा यदुवंशियोंके विनाश होने, भगवान् श्रीकृष्णके वैकुण्ठ पधार जाने तथा यदुकुलके वीरोंसे शून्य हो जानेपर दस्युगण अर्जुनको पराजितकर श्रीकृष्णकी पत्नियोंका अपहरण कर लेंगे और उन्हें अपनी पत्नी बना लेंगे, तब अपनी दुर्गतिसे दुःखी हुई वे सभी समुद्रमें निवास करेंगी। उसी समय महान् तपस्वी योगात्मा महर्षि दाल्भ्य वहाँ आयेंगे। तब वे ऋषिकी अर्घ्यद्वारा पूजा करके बारंबार उनके चरणोंमें प्रणिपात करेंगी और आँखोंमें आँसू भरकर अनेकों प्रकारसे विलाप करेंगी। उस समय उनको प्रचुर भोगोंका, दिव्य पुष्पमाला और अनुलेपका, अनन्त एवं अपराजित जगदीश्वर पतिका, दिव्य भावोंसे संयुक्त द्वारकापुरीका, नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित गृहोंका, द्वारकावासियोंका और देवरूपी सभी कुमारोंका स्मरण हो रहा होगा। तब वे मुनिके समक्ष खड़ी होकर इस प्रकार प्रश्न करेंगी॥ २—१६॥
स्त्रिय ऊचुः<br>दस्युभिर्भगवन् सर्वाः परिभुक्ता वयं बलात्।<br>स्वधर्माच्च्यवनेऽस्माकमस्मिंस्त्वं शरणं भव॥ १७<br>आदिष्टोऽसि पुरा ब्रह्मन् केशवेन च धीमता।<br>कस्मादीशेन संयोगं प्राप्य वेश्यात्वमागताः॥ १८<br>वेश्यानामपि यो धर्मस्तं नो ब्रूहि तपोधन।<br>कथयिष्यत्यतस्तासां स दाल्भ्यश्चैकितायनः॥ १९स्त्रियाँ कहेंगी— भगवन्! डाकुओंने बलपूर्वक (हमलोगोंका अपहरण करके) अपने वशीभूत कर लिया है। इस प्रकार हम सभी अपने धर्मसे च्युत हो गयी हैं। अब इस विषयमें आप हमलोगोंके आश्रयदाता बनें। ब्रह्मन्! इसके लिये बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पहले ही आपको आदेश दे दिया है। पता नहीं, किस घोर पाप-कर्मके कारण जगदीश्वर श्रीकृष्णका संयोग पाकर भी हमलोग कुधर्ममें आ पड़ी हैं। इसलिये तपोधन! पण्यस्त्रियोंके लिये भी जो धर्म कहे गये हैं, उन्हें हमें बताइये। उनके द्वारा यों पूछे जानेपर चेकितायन महर्षिके पुत्र दाल्भ्य उन्हें सारा वृत्तान्त बतलायेंगे॥ १७—१९॥
दाल्भ्य उवाच<br>जलक्रीडाविहारेषु पुरा सरसि मानसे।<br>भवतीनां च सर्वासां नारदोऽभ्याशमागतः॥ २०दाल्भ्य कहते हैं— नारियो! पूर्वकालमें तुमलोग अप्सराएँ थीं और सब-की-सब अग्निकी कन्याएँ थीं। एक बार जब तुमलोग मानस-सरोवरमें जलक्रीड़ाद्वारा मनोरंजन कर रही थीं, उसी समय तुमलोगोके निकट नारदजी आ पहुँचे।
२७४* मत्स्यपुराण *
हुताशनसुताः सर्वा भवन्त्योऽप्सरसः पुरा।<br>अप्रणम्यावलेपेन परिपृष्टः स योगवित्।<br>कथं नारायणोऽस्माकं भर्ता स्यादित्युपादिश॥ २१<br><br>तस्माद् वरप्रदानं वः शापश्चायमभूत् पुरा।<br>शय्याद्वयप्रदानेन मधुमाधवमासयोः॥ २२<br><br>सुवर्णोपस्करोत्सर्गाद् द्वादश्यां शुक्लपक्षतः।<br>भर्ता नारायणो नूनं भविष्यत्यन्यजन्मनि॥ २३<br><br>यदकृत्वा प्रणामं मे रूपसौभाग्यमत्सरात्।<br>परिपृष्टोऽस्मि तेनाशु वियोगो वो भविष्यति।<br>चौरैरपहताः सर्वा वेश्यात्वं समवाप्स्यथ॥ २४<br><br>एवं नारदशापेन केशवस्य च धीमतः।<br>वेश्यात्वमागताः सर्वा भवन्त्यः काममोहिताः।<br>इदानीमपि यद् वक्ष्ये तच्छृणुध्वं वराङ्गनाः॥ २५<br><br>पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु शतशः सुरैः।<br>दानवासुरदैत्येषु राक्षसेषु ततस्ततः॥ २६<br><br>तेषां व्रातसहस्राणि शतान्यपि च योषिताम्।<br>परिणीतानि यानि स्युर्बलाद् भुक्तानि यानि वै।<br>तानि सर्वाणि देवेशः प्रोवाच वदतां वरः॥ २७<br><br>इन्द्र उवाच<br><br>वेश्याधर्मेण वर्तध्वमधुना नृपमन्दिरे।<br>भक्तिमत्यो वरारोहास्तथा देवकुलेषु च॥ २८<br><br>राजानः स्वामिनस्तुल्याः सुता वापि च तत्समाः।<br>भविष्यति च सौभाग्यं सर्वासामपि शक्तितः॥ २९<br><br>यः कश्चिच्छुल्कमादाय गृहमेष्यति वः सदा।<br>निधनेनोपचार्यो वः स तदान्यत्र दाम्भिकात्॥ ३०<br><br>देवतानां पितॄणां च पुण्याहे समुपस्थिते।<br>गोभूहिरण्यधान्यानि प्रदेयानि स्वशक्तितः।<br>ब्राह्मणानां वरारोहाः कार्याणि वचनानि च॥ ३१<br><br>यच्चाप्यन्यद् व्रतं सम्यगुपदेक्ष्याम्यहं ततः।<br>अविचारेण सर्वाभिरनुष्ठेयं च तत् पुनः॥ ३२<br><br>संसारोत्तारणायालमेतद् वेदविदो विदुः।उस समय तुमलोग गर्ववश उन्हें प्रणाम न कर उन योगवेत्तासे इस प्रकार प्रश्न कर बैठीं—'देवर्षे! भगवान् नारायण किस प्रकार हमलोगोंके पति हो सकते हैं, इसका उपाय बतलाइये।' उस समय तुमलोगोंको नारदजीसे वरदान और शाप दोनों प्राप्त हुए थे। (उन्होंने कहा था—) 'यदि तुमलोग चैत्र और वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन स्वर्णनिर्मित उपकरणोंसहित दो शय्याएँ प्रदान करोगी तो निश्चय ही दूसरे जन्ममें भगवान् नारायण तुमलोगोंके पति होंगे। साथ ही सुन्दरता और सौभाग्यके अभिमानवश जो तुमलोगोंनें मुझे बिना प्रणाम किये ही मुझसे प्रश्न किया है, इस कारण तुमलोगोंका उनसे शीघ्र ही वियोग भी हो जायगा तथा डाकू तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे और तुम सभी कुधर्मको प्राप्त हो जाओगी।' इस प्रकार नारदजी एवं बुद्धिमान् भगवान् केशवके शापसे तुम सभी कामसे मोहित होकर कुधर्मको प्राप्त हो गयी हो। सुन्दरियो! इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे भी तुमलोग ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालमें घटित हुए सैकड़ों देवासुर-संग्रामोंमें देवताओंने समय-समयपर बहुत-से दानवो, असुरों, दैत्यों और राक्षसोंको मार डाला था, उनकी जो सैकड़ों-हजारों यूथ-की-यूथ पत्नियाँ थीं, जिन्हें अन्य राक्षसोंने बलपूर्वक (इसी प्रकार) ब्याह लिया था, उन सबसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवराज इन्द्रने कहा॥ २०—२७॥<br><br>**इन्द्र बोले—**भक्तिमती सुन्दरियो! तुमलोगोंको दाम्भिकोंसे सदा दूर रहना चाहिये। तुमलोगोंको देवताओं एवं पितरोंके पुण्य-पर्व आनेपर अपनी शक्तिके अनुसार गौ, पृथ्वी, स्वर्ण और अन्न आदिका दान करना तथा ब्राह्मणोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त मैं तुमलोगोंको जिस दूसरे व्रतका उपदेश दे रहा हूँ, उसका भी बिना आगा-पीछा सोचे तुम सभीको अनुष्ठान करना चाहिये। यह व्रत तुमलोगोंका संसारसे उद्धार करनेमें समर्थ है। इसे वेदवेत्तालोग ही जानते हैं॥ २८—३३ ½ ॥

७३ शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि

* अध्याय ७० * । २७५

श्लोकअर्थ
यदा सूर्यदिने हस्तः पुष्यो वाथ पुनर्वसुः॥ ३३<br>भवेत् सर्वौषधीस्नानं सम्यङ्नारी समाचरेत्।<br>तदा पञ्चशरस्यापि संनिधातुत्वमेष्यति।<br>अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमङ्गस्यानुकीर्तनैः॥ ३४<br>कामाय पादौ सम्पूज्य जङ्घे वै मोहकारिणे।<br>मेढ्रं कंदर्पनिधये कटिं प्रीतिमते नमः॥ ३५<br>नाभिं सौख्यसमुद्राय रामाय च तथोदरम्।<br>हृदयं हृदयेशाय स्तनावाह्लादकारिणे॥ ३६<br>उत्कण्ठायेति वै कण्ठमास्यानन्दकारिणे।<br>वामाङ्गं पुष्पचापाय पुष्पबाणाय दक्षिणम्॥ ३७<br>मानसायेति वै मौलिं विलोलायेति मूर्धजम्।<br>सर्वात्मने च सर्वाङ्गं देवदेवस्य पूजयेत्॥ ३८<br>नमः शिवाय शान्ताय पाशाङ्कुशधराय च।<br>गदिने पीतवस्त्राय शङ्खचक्रधराय च॥ ३९<br>नमो नारायणायेति कामदेवात्मने नमः।<br>सर्वशान्त्यै नमः प्रीत्यै नमो रत्यै नमः श्रियै॥ ४०<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै नमः सर्वार्थसम्पदे।<br>एवं सम्पूज्य देवेशमनङ्गात्मकमीश्वरम्।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्नैवेद्येन च कामिनी॥ ४१<br>तत आहूय धर्मज्ञं ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>अव्यङ्गावयवं पूज्य गन्धपुष्पार्चनादिभिः॥ ४२<br>शालेयतण्डुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम्।<br>तस्मै विप्राय सा दद्यान्माधवः प्रीयतामिति॥ ४३<br>यथेष्टाहारयुक्तं वै तमेव द्विजसत्तमम्।<br>रत्यर्थं कामदेवोऽयमिति चित्तेऽवधार्य तम्॥ ४४<br>यद् यदिच्छति विप्रेन्द्रस्तत्तत्कुर्याद् विलासिनी।<br>सर्वभावेन चात्मानमर्पयेत् स्मितभाषिणी॥ ४५जब रविवारको हस्त, पुष्य अथवा पुनर्वसु नक्षत्र आवे तो स्त्रीको सर्वौषधिमिश्रित जलसे भलीभाँति स्नान करना उचित है। ऐसा करनेसे उसे देवताकी संनिकटता प्राप्त होगी। फिर नामोंका कीर्तन करते हुए भगवान् पुण्डरीकाक्षकी यों अर्चना करनी चाहिये—'कामाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'मोहकारिणे नमः' से जङ्घाओंका, 'कंदर्पनिधये नमः' से जननेन्द्रियका, 'प्रीतिमते नमः' से कटिका, 'सौख्यसमुद्राय नमः' से नाभिका, 'रामाय नमः' से उदरका, 'हृदयेशाय नमः' से हृदयका, 'आह्लादकारिणे नमः' से दोनों स्तनोंका, 'उत्कण्ठाय नमः' से कण्ठका, 'आनन्दकारिणे नमः'-से मुखका, 'पुष्पचापाय नमः' से वामाङ्गका, 'पुष्पबाणाय नमः' से दक्षिणाङ्गका, 'मानसाय नमः'-से ललाटका, 'विलोलाय नमः' से केशोंका और 'सर्वात्मने नमः' से देवाधिदेव पुण्डरीकाक्षके सर्वाङ्गका पूजन करना चाहिये। पुनः 'शिवाय नमः', 'शान्ताय नमः', 'पाशाङ्कुशधराय नमः', 'गदिने नमः', 'पीतवस्त्राय नमः', 'शङ्खचक्रधराय नमः', 'नारायणाय नमः', 'कामदेवात्मने नमः' से भगवान् विष्णुकी पूजा करके 'सर्वशान्त्यै नमः', 'प्रीत्यै नमः', 'रत्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'सर्वार्थसम्पदे नमः' से लक्ष्मीका भी पूजन करनेका विधान है। इस प्रकार व्रतिनी नारी चन्दन, पुष्पमाला, धूप और नैवेद्य आदिसे कामदेवस्वरूप देवेश्वर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तत्पश्चात् वह सुडौल अङ्गोंवाले, धर्मज्ञ एवं वेदज्ञ ब्राह्मणको बुलाकर चन्दन, पुष्प आदि पूजन-सामग्रीद्वारा उनकी पूजा करे और घीसे भरे हुए पात्रके साथ एक सेर अगहनी चावल उस ब्राह्मणको दान करे और कहे—'माधव मुझपर प्रसन्न हों।' फिर वह विलासिनी नारी उस द्विजवरको यथेष्ट भोजन करावे॥ ३३—४५॥
एवमादित्यवारेण सर्वमेतत् समाचरेत्।<br>तण्डुलप्रस्थदानं च यावन्मासास्त्रयोदश॥ ४६<br>ततस्त्रयोदशे मासि सम्प्राप्ते तस्य भामिनी।<br>विप्रायोपस्करैर्युक्तां शय्यां दद्यात् विलक्षणाम्॥ ४७<br>सोपधानकविश्रामां सास्तरावरणां शुभाम्।<br>प्रदीपोपानहच्छत्रपादुकासनसंयुताम् ॥ ४८इस प्रकार रविवारसे प्रारम्भ करके यह सब कार्य करते रहना चाहिये। एक सेर चावलका दान तो तेरह मासतक करनेका विधान है। तेरहवाँ महीना आनेपर उस स्त्रीको चाहिये कि उपर्युक्त ब्राह्मणको समस्त उपकरणोंसे युक्त एक ऐसी विलक्षण शय्या प्रदान करे, जो गद्दा, चादर और विश्रामहेतु बने हुए तकियेसे युक्त एवं सुन्दर हो तथा उसके साथ दीपक, जूता, छाता, खड़ाऊँ और

७४ कल्याणसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

२७६ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सपत्नीकमलङ्कृत्य हेमसूत्राङ्गुलीयकैः।<br>सूक्ष्मवस्त्रैः सकटकैर्भूरिमाल्यानुलेपनैः ॥ ४९<br>कामदेवं सपत्नीकं गुडकुम्भोपरि स्थितम्।<br>ताम्रपात्रासनगतं हेमनेत्रपटावृतम् ॥ ५०<br>सकांस्यभाजनोपेतमिक्षुदण्डसमन्वितम् ।<br>दद्यादेतेन मन्त्रेण तथैकां गां पयस्विनीम् ॥ ५१<br>यथान्तरं न पश्यामि कामकेशवयोः सदा।<br>तथैव सर्वकामाप्तिरस्तु विष्णो सदा मम ॥ ५२<br>यथा न कमला देहात् प्रयाति तव केशव।<br>तथा ममापि देवेश शरीरं स्वीकुरु प्रभो ॥ ५३<br>तथा च काञ्चनं देवं प्रतिगृह्णन् द्विजोत्तमः।<br>क इदं कस्मादादिति वैदिकं मन्त्रमीरयेत् ॥ ५४<br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य विसर्ज्य द्विजपुंगवम्।<br>शय्यासनादिकं सर्वं ब्राह्मणस्य गृहं नयेत् ॥ ५५<br>ततः प्रभृति यो विप्रो रत्यर्थं गृहमागतः।<br>स मान्यः सूर्यवारे च स मन्तव्यो भवेत् तदा ॥ ५६<br>एवं त्रयोदशं यावन्मासमेवं द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेत यथाकामं प्रोषितेऽन्यं समाचरेत् ॥ ५७<br>तदनुज्ञया रूपवान् यावदभ्यागतो भवेत्।<br>आत्मनोऽपि यथाविघ्नं गर्भभूतिकरं प्रियम् ॥ ५८<br>दैवं वा मानुषं वा स्यादनुरागेण वा ततः।<br>साचारानष्टपञ्चाशद् यथाशक्त्या समाचरेत् ॥ ५९<br>एतद्धि कथितं सम्यग् भवतीनां विशेषतः।<br>अधर्मोऽयं ततो न स्याद् वेश्यानामिह सर्वदा ॥ ६०<br>पुरुहूतेन यत् प्रोक्तं दानवीषु पुरा मया।<br>तदिदं साम्प्रतं सर्वं भवतीष्वपि युज्यते ॥ ६१<br>सर्वपापप्रशमनमनन्तफलदायकम् ।<br>कल्याणीनां च कथितं तत् कुरुध्वं वराननाः ॥ ६२<br>करोति याशेषमखण्डमेतत्<br>कल्याणिनी माधवलोकसंस्था ।<br>सा पूजिता देवगणैरशेषै-<br>रानन्दकृत् स्थानमुपैति विष्णोः ॥ ६३आसनी भी हो। उस समय उस सपत्नीक ब्राह्मणको महीन वस्त्र, सोनेकी जंजीर, अँगूठी, कड़ा, अधिकाधिक पुष्पमाला और चन्दनसे अलंकृत करके गुड़से भरे हुए कलशके ऊपर स्थापित ताम्रपात्रके आसनपर सपत्नीक कामदेवकी मूर्तिको रख दे, उसे स्वर्णनिर्मित नेत्राच्छादनसे ढक दे। उसके निकट कांसेका पात्र और गन्ना भी रख दे। फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रका उच्चारण करके समग्र उपकरणोंसहित उस मूर्तिका तथा एक दुधारू गौका उस ब्राह्मणको दान करे। (दानका मन्त्र इस प्रकार है—) 'केशव! जिस प्रकार लक्ष्मी आपके शरीरसे विलग होकर कहीं अन्यत्र नहीं जातीं, देवेश्वर प्रभो! उसी प्रकार आप मेरे शरीरको भी स्वीकार कर लें।' स्वर्णमय कामदेवकी मूर्तिको ग्रहण करते समय वे द्विजवर—'कोऽदात् कस्मा अदात् कामोऽदात् कामायादात्' इत्यादि—(वाजस० सं० ७। ४८) इस वैदिक मन्त्रका उच्चारण करें। तदनन्तर वह स्त्री उन द्विजवरकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा करे और शय्या, आसन आदि दानकी सभी वस्तुएँ उनके घर भिजवा दे। इस प्रकार इस दैवकर्मको अनुरागपूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक अट्ठावन बार करना चाहिये। विशेषतः तुम्हीं लोगोंके लिये ही मैंने इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन किया है। ऐसा करनेसे पण्यस्त्रियोंको इस लोकमें कभी अधर्मका भागी नहीं होना पड़ेगा॥ ४६—६०॥<br><br>पूर्वकालमें इन्द्रने दानव-पत्नियोंके प्रति जिस व्रतका वर्णन किया था, वही सब इस समय तुमलोगोंको भी करना उचित है। सुन्दरियो! कल्याणी स्त्रियोंके समस्त पापोंको शान्त करनेवाले एवं अनन्त फलदायक जिस व्रतका मैंने वर्णन किया है, उसका तुमलोग अवश्य पालन करो। जो कल्याणमयी नारी इस व्रतका पूरा-पूरा अखण्डरूपसे पालन करती है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें स्थित होती है और अखिल देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णुके आनन्ददायक स्थानको प्राप्त होती है॥ ६१—६३॥

* अध्याय ७१ * । २७७

श्रीभगवानुवाच<br>तपोधनः सोऽप्यभिधाय चैवं<br>तदा च तासां व्रतमङ्गनानाम्।<br>स्वस्थानमेष्यत्यनु वै समस्ताः<br>व्रतं चरिष्यन्ति च वेदद्योने ॥ ६४ ॥**श्रीभगवान्‌ने कहा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार तपस्वी दाल्भ्य उन स्त्रियोंसे वाराङ्गनाओंके व्रतका वर्णन करके अपने स्थानको चले जायँगे। उसके पश्चात् वे सभी उस व्रतका अनुष्ठान करेंगी ॥ ६४ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽनङ्गदानव्रतं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनङ्गदानव्रत नामक सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥


इकहत्तरवाँ अध्याय

अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ब्रह्मोवाच<br>भगवन् पुरुषस्येह स्त्रियाश्च विरहादिकम्।<br>शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद् येन तद् वद ॥ १<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>श्रावणस्य द्वितीयायां कृष्णायां मधुसूदनः।<br>क्षीरार्णवे सपत्नीकः सदा वसति केशवः ॥ २<br><br>तस्यां सम्पूज्य गोविन्दं सर्वान् कामान् समश्रुते।<br>गोभूहिरण्यतानादि सप्तकल्पशतानुगम् ॥ ३<br><br>अशून्यशयना नाम द्वितीया सम्प्रकीर्तिता।<br>तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुमेभिर्मन्त्रैर्विधानतः ॥ ४<br><br>श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीधामन् श्रीपतेऽव्यय।<br>गार्हस्थ्यं मा प्रणशं मे यातु धर्मार्थकामदम् ॥ ५<br><br>अग्नयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम।<br>पितरो मा प्रणश्यन्तु मास्तु दाम्पत्यभेदनम् ॥ ६**ब्रह्माजीने पूछा—**भगवन्! इस लोकमें जिसका अनुष्ठान करनेसे पुरुषको पत्नीवियोग अथवा स्त्रीको पतिवियोग न हो तथा शोक एवं रोगका भय और दुःख न हो, वह व्रत बतलाइये ॥ १ ॥<br><br>**श्रीभगवान्‌ने कहा—**ब्रह्मन्! श्रावणमासके कृष्ण-पक्षकी द्वितीया तिथिको मधुसूदनभगवान् केशव लक्ष्मीसहित सदा क्षीरसागरमें निवास करते हैं, अतः उस तिथिको जो मनुष्य भगवान् गोविन्दकी पूजा कर सात सौ कल्पोंतक फल देनेवाली गौ, पृथ्वी और सुवर्णका दान करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यह द्वितीया अशून्यशयना* नामसे प्रसिद्ध है; इस दिन विधिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन कर इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंद्वारा प्रार्थना करनी चाहिये—<br>‘लक्ष्मीकान्त! आप श्रीवत्सको धारण करनेवाले, धन-सम्पत्तिके निधि और सौन्दर्यके अधीश्वर हैं। अविनाशी भगवन्! मेरा धर्म, अर्थ और कामको सिद्ध करनेवाला गृहस्थ-आश्रम कभी विनाशको न प्राप्त हो। पुरुषोत्तम! मेरे गृहमें अग्नियों और इष्ट देवताओंका कभी अभाव न हो, मेरे पितरोंका विनाश न हो और दाम्पत्य—पति-पत्नी (रूप-व्यवहार)-में कभी भेद-भाव न उत्पन्न हो।

* इस व्रतकी विस्तृत विधि वामनपुराणके १६ वें अध्यायमें है। पर यह वहाँ तथा पद्म, भविष्यादिमें कुछ अन्तरसे प्रायः इसी प्रकार निर्दिष्ट है।