भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 286

२७६ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सपत्नीकमलङ्कृत्य हेमसूत्राङ्गुलीयकैः।<br>सूक्ष्मवस्त्रैः सकटकैर्भूरिमाल्यानुलेपनैः ॥ ४९<br>कामदेवं सपत्नीकं गुडकुम्भोपरि स्थितम्।<br>ताम्रपात्रासनगतं हेमनेत्रपटावृतम् ॥ ५०<br>सकांस्यभाजनोपेतमिक्षुदण्डसमन्वितम् ।<br>दद्यादेतेन मन्त्रेण तथैकां गां पयस्विनीम् ॥ ५१<br>यथान्तरं न पश्यामि कामकेशवयोः सदा।<br>तथैव सर्वकामाप्तिरस्तु विष्णो सदा मम ॥ ५२<br>यथा न कमला देहात् प्रयाति तव केशव।<br>तथा ममापि देवेश शरीरं स्वीकुरु प्रभो ॥ ५३<br>तथा च काञ्चनं देवं प्रतिगृह्णन् द्विजोत्तमः।<br>क इदं कस्मादादिति वैदिकं मन्त्रमीरयेत् ॥ ५४<br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य विसर्ज्य द्विजपुंगवम्।<br>शय्यासनादिकं सर्वं ब्राह्मणस्य गृहं नयेत् ॥ ५५<br>ततः प्रभृति यो विप्रो रत्यर्थं गृहमागतः।<br>स मान्यः सूर्यवारे च स मन्तव्यो भवेत् तदा ॥ ५६<br>एवं त्रयोदशं यावन्मासमेवं द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेत यथाकामं प्रोषितेऽन्यं समाचरेत् ॥ ५७<br>तदनुज्ञया रूपवान् यावदभ्यागतो भवेत्।<br>आत्मनोऽपि यथाविघ्नं गर्भभूतिकरं प्रियम् ॥ ५८<br>दैवं वा मानुषं वा स्यादनुरागेण वा ततः।<br>साचारानष्टपञ्चाशद् यथाशक्त्या समाचरेत् ॥ ५९<br>एतद्धि कथितं सम्यग् भवतीनां विशेषतः।<br>अधर्मोऽयं ततो न स्याद् वेश्यानामिह सर्वदा ॥ ६०<br>पुरुहूतेन यत् प्रोक्तं दानवीषु पुरा मया।<br>तदिदं साम्प्रतं सर्वं भवतीष्वपि युज्यते ॥ ६१<br>सर्वपापप्रशमनमनन्तफलदायकम् ।<br>कल्याणीनां च कथितं तत् कुरुध्वं वराननाः ॥ ६२<br>करोति याशेषमखण्डमेतत्<br>कल्याणिनी माधवलोकसंस्था ।<br>सा पूजिता देवगणैरशेषै-<br>रानन्दकृत् स्थानमुपैति विष्णोः ॥ ६३आसनी भी हो। उस समय उस सपत्नीक ब्राह्मणको महीन वस्त्र, सोनेकी जंजीर, अँगूठी, कड़ा, अधिकाधिक पुष्पमाला और चन्दनसे अलंकृत करके गुड़से भरे हुए कलशके ऊपर स्थापित ताम्रपात्रके आसनपर सपत्नीक कामदेवकी मूर्तिको रख दे, उसे स्वर्णनिर्मित नेत्राच्छादनसे ढक दे। उसके निकट कांसेका पात्र और गन्ना भी रख दे। फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रका उच्चारण करके समग्र उपकरणोंसहित उस मूर्तिका तथा एक दुधारू गौका उस ब्राह्मणको दान करे। (दानका मन्त्र इस प्रकार है—) 'केशव! जिस प्रकार लक्ष्मी आपके शरीरसे विलग होकर कहीं अन्यत्र नहीं जातीं, देवेश्वर प्रभो! उसी प्रकार आप मेरे शरीरको भी स्वीकार कर लें।' स्वर्णमय कामदेवकी मूर्तिको ग्रहण करते समय वे द्विजवर—'कोऽदात् कस्मा अदात् कामोऽदात् कामायादात्' इत्यादि—(वाजस० सं० ७। ४८) इस वैदिक मन्त्रका उच्चारण करें। तदनन्तर वह स्त्री उन द्विजवरकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा करे और शय्या, आसन आदि दानकी सभी वस्तुएँ उनके घर भिजवा दे। इस प्रकार इस दैवकर्मको अनुरागपूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक अट्ठावन बार करना चाहिये। विशेषतः तुम्हीं लोगोंके लिये ही मैंने इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन किया है। ऐसा करनेसे पण्यस्त्रियोंको इस लोकमें कभी अधर्मका भागी नहीं होना पड़ेगा॥ ४६—६०॥<br><br>पूर्वकालमें इन्द्रने दानव-पत्नियोंके प्रति जिस व्रतका वर्णन किया था, वही सब इस समय तुमलोगोंको भी करना उचित है। सुन्दरियो! कल्याणी स्त्रियोंके समस्त पापोंको शान्त करनेवाले एवं अनन्त फलदायक जिस व्रतका मैंने वर्णन किया है, उसका तुमलोग अवश्य पालन करो। जो कल्याणमयी नारी इस व्रतका पूरा-पूरा अखण्डरूपसे पालन करती है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें स्थित होती है और अखिल देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णुके आनन्ददायक स्थानको प्राप्त होती है॥ ६१—६३॥