मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ७० * । २७५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यदा सूर्यदिने हस्तः पुष्यो वाथ पुनर्वसुः॥ ३३<br>भवेत् सर्वौषधीस्नानं सम्यङ्नारी समाचरेत्।<br>तदा पञ्चशरस्यापि संनिधातुत्वमेष्यति।<br>अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमङ्गस्यानुकीर्तनैः॥ ३४<br>कामाय पादौ सम्पूज्य जङ्घे वै मोहकारिणे।<br>मेढ्रं कंदर्पनिधये कटिं प्रीतिमते नमः॥ ३५<br>नाभिं सौख्यसमुद्राय रामाय च तथोदरम्।<br>हृदयं हृदयेशाय स्तनावाह्लादकारिणे॥ ३६<br>उत्कण्ठायेति वै कण्ठमास्यानन्दकारिणे।<br>वामाङ्गं पुष्पचापाय पुष्पबाणाय दक्षिणम्॥ ३७<br>मानसायेति वै मौलिं विलोलायेति मूर्धजम्।<br>सर्वात्मने च सर्वाङ्गं देवदेवस्य पूजयेत्॥ ३८<br>नमः शिवाय शान्ताय पाशाङ्कुशधराय च।<br>गदिने पीतवस्त्राय शङ्खचक्रधराय च॥ ३९<br>नमो नारायणायेति कामदेवात्मने नमः।<br>सर्वशान्त्यै नमः प्रीत्यै नमो रत्यै नमः श्रियै॥ ४०<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै नमः सर्वार्थसम्पदे।<br>एवं सम्पूज्य देवेशमनङ्गात्मकमीश्वरम्।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्नैवेद्येन च कामिनी॥ ४१<br>तत आहूय धर्मज्ञं ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>अव्यङ्गावयवं पूज्य गन्धपुष्पार्चनादिभिः॥ ४२<br>शालेयतण्डुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम्।<br>तस्मै विप्राय सा दद्यान्माधवः प्रीयतामिति॥ ४३<br>यथेष्टाहारयुक्तं वै तमेव द्विजसत्तमम्।<br>रत्यर्थं कामदेवोऽयमिति चित्तेऽवधार्य तम्॥ ४४<br>यद् यदिच्छति विप्रेन्द्रस्तत्तत्कुर्याद् विलासिनी।<br>सर्वभावेन चात्मानमर्पयेत् स्मितभाषिणी॥ ४५ | जब रविवारको हस्त, पुष्य अथवा पुनर्वसु नक्षत्र आवे तो स्त्रीको सर्वौषधिमिश्रित जलसे भलीभाँति स्नान करना उचित है। ऐसा करनेसे उसे देवताकी संनिकटता प्राप्त होगी। फिर नामोंका कीर्तन करते हुए भगवान् पुण्डरीकाक्षकी यों अर्चना करनी चाहिये—'कामाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'मोहकारिणे नमः' से जङ्घाओंका, 'कंदर्पनिधये नमः' से जननेन्द्रियका, 'प्रीतिमते नमः' से कटिका, 'सौख्यसमुद्राय नमः' से नाभिका, 'रामाय नमः' से उदरका, 'हृदयेशाय नमः' से हृदयका, 'आह्लादकारिणे नमः' से दोनों स्तनोंका, 'उत्कण्ठाय नमः' से कण्ठका, 'आनन्दकारिणे नमः'-से मुखका, 'पुष्पचापाय नमः' से वामाङ्गका, 'पुष्पबाणाय नमः' से दक्षिणाङ्गका, 'मानसाय नमः'-से ललाटका, 'विलोलाय नमः' से केशोंका और 'सर्वात्मने नमः' से देवाधिदेव पुण्डरीकाक्षके सर्वाङ्गका पूजन करना चाहिये। पुनः 'शिवाय नमः', 'शान्ताय नमः', 'पाशाङ्कुशधराय नमः', 'गदिने नमः', 'पीतवस्त्राय नमः', 'शङ्खचक्रधराय नमः', 'नारायणाय नमः', 'कामदेवात्मने नमः' से भगवान् विष्णुकी पूजा करके 'सर्वशान्त्यै नमः', 'प्रीत्यै नमः', 'रत्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'सर्वार्थसम्पदे नमः' से लक्ष्मीका भी पूजन करनेका विधान है। इस प्रकार व्रतिनी नारी चन्दन, पुष्पमाला, धूप और नैवेद्य आदिसे कामदेवस्वरूप देवेश्वर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तत्पश्चात् वह सुडौल अङ्गोंवाले, धर्मज्ञ एवं वेदज्ञ ब्राह्मणको बुलाकर चन्दन, पुष्प आदि पूजन-सामग्रीद्वारा उनकी पूजा करे और घीसे भरे हुए पात्रके साथ एक सेर अगहनी चावल उस ब्राह्मणको दान करे और कहे—'माधव मुझपर प्रसन्न हों।' फिर वह विलासिनी नारी उस द्विजवरको यथेष्ट भोजन करावे॥ ३३—४५॥ |
| एवमादित्यवारेण सर्वमेतत् समाचरेत्।<br>तण्डुलप्रस्थदानं च यावन्मासास्त्रयोदश॥ ४६<br>ततस्त्रयोदशे मासि सम्प्राप्ते तस्य भामिनी।<br>विप्रायोपस्करैर्युक्तां शय्यां दद्यात् विलक्षणाम्॥ ४७<br>सोपधानकविश्रामां सास्तरावरणां शुभाम्।<br>प्रदीपोपानहच्छत्रपादुकासनसंयुताम् ॥ ४८ | इस प्रकार रविवारसे प्रारम्भ करके यह सब कार्य करते रहना चाहिये। एक सेर चावलका दान तो तेरह मासतक करनेका विधान है। तेरहवाँ महीना आनेपर उस स्त्रीको चाहिये कि उपर्युक्त ब्राह्मणको समस्त उपकरणोंसे युक्त एक ऐसी विलक्षण शय्या प्रदान करे, जो गद्दा, चादर और विश्रामहेतु बने हुए तकियेसे युक्त एवं सुन्दर हो तथा उसके साथ दीपक, जूता, छाता, खड़ाऊँ और |