भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 282, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 282
२७२* मत्स्यपुराण *

सत्तरवाँ अध्याय

पण्यस्त्री-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ब्रह्मोवाचब्रह्माजीने पूछा—
वर्णाश्रमाणां प्रभवः पुराणेषु मया श्रुतः।<br>सदाचारस्य भगवन् धर्मशास्त्रविनिश्चयः।<br>पण्यस्त्रीणां सदाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ १॥भगवान्! मैं पुराणोंमें सभी वर्णों और आश्रमोंके सदाचारकी उत्पत्ति तथा धर्मशास्त्रके सिद्धान्तोंको तो सुन चुका, अब मैं पण्यस्त्रियों (मूल्यद्वारा खरीदी जानेवाली स्त्रियों)-के समुचित आचारको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ*॥ १॥
ईश्वर उवाचभगवान् शंकरने कहा—
तस्मिन्नेव युगे ब्रह्मन् सहस्राणि तु षोडश।<br>वासुदेवस्य नारीणां भविष्यन्त्यम्बुजोद्भव॥ २कमलोद्भव ब्रह्मन्! उसी द्वापरयुगमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी सोलह सहस्र पत्नियाँ होंगी।
ताभिर्वसन्तसमये कोकिलालिकुलाकुले।<br>पुष्पितोपवने फुल्लकह्लारसरस्तटे॥ ३एक बार वसन्त-ऋतुमें वे सभी नारियाँ खिले हुए पुष्पोंसे सुशोभित वनमें उत्फुल्ल कमल-पुष्पोंसे परिपूर्ण एक सरोवरके तटपर जायँगी। उस समय कोकिल कूज रहे होंगे, भ्रमर-समूह अपनी गुंजार चतुर्दिक् बिखेर रहे होंगे तथा शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन बह रहा होगा। इसी समय वे निश्चिन्त रूपसे एकत्र होकर जलपान आदि कार्योंमें लीन होंगी।
निर्भरं सह पत्नीभिः प्रसक्ताभिरलङ्कृतः।<br>रमयिष्यति विश्वात्मा कृष्णो यदुकुलोद्वहः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् मालतीकृतशेखरः॥ ४उस समय यदुकुलके उद्धारक विश्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी उनके साथ वहाँ भ्रमण करेंगे।
गच्छन् समीपमार्गेण साम्बः परपुरञ्जयः।<br>साक्षात् कन्दर्परूपेण सर्वाभरणभूषितः॥ ५उसी समय शत्रु-नगरीको जीतनेवाले, अलंकारोंसे सुशोभित श्रीमान् साम्ब, जिनके नेत्र मृगनेत्रसरीखे होंगे, जिनका मस्तक मालतीकी मालासे सुशोभित होगा, जो सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा रूपसे साक्षात् कामदेवके समान होंगे, उस सरोवरके समीपवर्ती मार्गसे जा निकलेंगे।
अनङ्गशरतप्ताभिः साभिलाषमवेक्षितः।<br>प्रवृद्धो मन्मथस्तासां भविष्यति यदात्मनि॥ ६उन्हें देखकर वे सभी (स्त्रियाँ) रागभरी दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगेंगी।
तदावेक्ष्य जगन्नाथः सर्वतो ध्यानचक्षुषा।<br>शापं वक्ष्यति ताः सर्वा वो हरिष्यन्ति दस्यवः।<br>मत्परोक्षं यतः कामलौल्यादीदृग्विधं कृतम्॥ ७तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण ध्यान-दृष्टिसे सारा वृत्तान्त जानकर उन्हें शाप दे देंगे—'चूँकि तुमलोगोंने मुझसे विश्वासघात किया; कामलोलुपतावश ऐसा जघन्य कार्य किया है, इसलिये चोर तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे।'
ततः प्रसादितो देव इदं वक्ष्यति शार्ङ्गभृत्।<br>ताभिः शापाभितप्ताभिर्भगवान् भूतभावनः॥ ८तत्पश्चात् शापसे संतप्त हुई उन स्त्रियोंद्वारा प्रसन्न किये जानेपर
उत्तारभूतं दाशत्वं समुद्राद् ब्राह्मणप्रियः।<br>उपदेक्ष्यत्यनन्तात्मा भाविकल्याणकारकम्॥ ९भगवान् श्रीकृष्ण जो अनन्तात्मा, ब्राह्मणोंके प्रेमी तथा प्राणियोंको भवसागरसे पार करनेवाले कर्णधार हैं, उन्हें भविष्यमें

* इस अध्यायमें कृपालु भगवान्द्वारा—'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९। ३२)-के भाव, पापयोनिकी व्याख्या तथा उनके कल्याणकी पद्धति निर्दिष्ट हुई हैं। यह अध्याय पद्म० खं० २३। ७४—१४६ तथा भविष्य० ४। १२०। १—७३ तकमें तो ज्यों-का-त्यों आता ही है।

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