मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ७० * | २७३ |
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| भवतीनामृषिर्दाल्भ्यो यद् व्रतं कथयिष्यति।<br>तदेवोत्तारणायालं दासीत्वेऽपि भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा ताः परिष्वज्य गतो द्वारवतीश्वरः॥ १०<br>ततः कालेन महता भारावतरणे कृते।<br>निवृत्ते मौसले तद्वत् केशवे दिवमागते॥ ११<br>शून्ये यदुकुले सर्वैःशूरैरपि जितेऽर्जुने।<br>हृतासु कृष्णपत्नीषु दाशभोग्यासु चाम्बुधौ॥ १२<br>तिष्ठन्तीषु च दौर्गत्यसंतप्तासु चतुर्मुख।<br>आगमिष्यति योगात्मा दाल्भ्यो नाम महातपाः॥ १३<br>तास्तमर्घ्येण सम्पूज्य प्रणिपत्य पुनः पुनः।<br>लालप्यमाना बहुशो बाष्पपर्याकुलेक्षणाः॥ १४<br>स्मरन्त्यो विपुलान् भोगान् दिव्यमाल्यानुलेपनम्।<br>भर्तारं जगतामीशमनन्तमपराजितम्॥ १५<br>दिव्यभावां तां च पुरीं नानारत्नगृहाणि च।<br>द्वारकावासिनः सर्वान् देवरूपान् कुमारकान्।<br>प्रश्नमेवं करिष्यन्ति मुनेरभिमुखं स्थिताः॥ १६ | इस प्रकार कल्याणकारी मार्गका उपदेश करेंगे—'महर्षि दाल्भ्य तुमलोगोंको जो व्रत बतलायेंगे, वही दासीत्वावस्थामें भी तुमलोगोंका उद्धार करनेमें समर्थ होगा।' यों कहकर द्वारकाधीश वहाँसे चले जायेंगे। चतुर्मुख! इसके बहुत दिन बाद जब श्रीभगवान्द्वारा पृथ्वीका भार दूर करने, मौसलयुद्ध समाप्त होने—मूसलद्वारा यदुवंशियोंके विनाश होने, भगवान् श्रीकृष्णके वैकुण्ठ पधार जाने तथा यदुकुलके वीरोंसे शून्य हो जानेपर दस्युगण अर्जुनको पराजितकर श्रीकृष्णकी पत्नियोंका अपहरण कर लेंगे और उन्हें अपनी पत्नी बना लेंगे, तब अपनी दुर्गतिसे दुःखी हुई वे सभी समुद्रमें निवास करेंगी। उसी समय महान् तपस्वी योगात्मा महर्षि दाल्भ्य वहाँ आयेंगे। तब वे ऋषिकी अर्घ्यद्वारा पूजा करके बारंबार उनके चरणोंमें प्रणिपात करेंगी और आँखोंमें आँसू भरकर अनेकों प्रकारसे विलाप करेंगी। उस समय उनको प्रचुर भोगोंका, दिव्य पुष्पमाला और अनुलेपका, अनन्त एवं अपराजित जगदीश्वर पतिका, दिव्य भावोंसे संयुक्त द्वारकापुरीका, नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित गृहोंका, द्वारकावासियोंका और देवरूपी सभी कुमारोंका स्मरण हो रहा होगा। तब वे मुनिके समक्ष खड़ी होकर इस प्रकार प्रश्न करेंगी॥ २—१६॥ |
| स्त्रिय ऊचुः<br>दस्युभिर्भगवन् सर्वाः परिभुक्ता वयं बलात्।<br>स्वधर्माच्च्यवनेऽस्माकमस्मिंस्त्वं शरणं भव॥ १७<br>आदिष्टोऽसि पुरा ब्रह्मन् केशवेन च धीमता।<br>कस्मादीशेन संयोगं प्राप्य वेश्यात्वमागताः॥ १८<br>वेश्यानामपि यो धर्मस्तं नो ब्रूहि तपोधन।<br>कथयिष्यत्यतस्तासां स दाल्भ्यश्चैकितायनः॥ १९ | स्त्रियाँ कहेंगी— भगवन्! डाकुओंने बलपूर्वक (हमलोगोंका अपहरण करके) अपने वशीभूत कर लिया है। इस प्रकार हम सभी अपने धर्मसे च्युत हो गयी हैं। अब इस विषयमें आप हमलोगोंके आश्रयदाता बनें। ब्रह्मन्! इसके लिये बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पहले ही आपको आदेश दे दिया है। पता नहीं, किस घोर पाप-कर्मके कारण जगदीश्वर श्रीकृष्णका संयोग पाकर भी हमलोग कुधर्ममें आ पड़ी हैं। इसलिये तपोधन! पण्यस्त्रियोंके लिये भी जो धर्म कहे गये हैं, उन्हें हमें बताइये। उनके द्वारा यों पूछे जानेपर चेकितायन महर्षिके पुत्र दाल्भ्य उन्हें सारा वृत्तान्त बतलायेंगे॥ १७—१९॥ |
| दाल्भ्य उवाच<br>जलक्रीडाविहारेषु पुरा सरसि मानसे।<br>भवतीनां च सर्वासां नारदोऽभ्याशमागतः॥ २० | दाल्भ्य कहते हैं— नारियो! पूर्वकालमें तुमलोग अप्सराएँ थीं और सब-की-सब अग्निकी कन्याएँ थीं। एक बार जब तुमलोग मानस-सरोवरमें जलक्रीड़ाद्वारा मनोरंजन कर रही थीं, उसी समय तुमलोगोके निकट नारदजी आ पहुँचे। |