भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६२* मत्स्यपुराण *
परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्।<br>सूर्यग्रहे सूर्यनाम सदा मन्त्रेषु कीर्तयेत्॥ २३<br>अधिकाः पद्मरागाः स्युः कपिलां च सुशोभनाम्।<br>प्रयच्छेच्च निशाम्पत्ये चन्द्रसूर्योपरागयोः॥ २४<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शक्रलोके महीयते॥ २५पुनरागमनरहित परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सूर्य-ग्रहणमें मन्त्रोंमें सदा सूर्यका नाम उच्चारण करना चाहिये। इसके अतिरिक्त चन्द्र-ग्रहण एवं सूर्य-ग्रहण—दोनों अवसरोंपर सूर्यके निमित्त पद्मराग मणि और निशापति चन्द्रमाके निमित्त एक सुन्दर कपिला गौका दान करनेका विधान है। जो मनुष्य इस (ग्रहणस्नानकी विधि)-को नित्य सुनता अथवा दूसरेको श्रवण कराता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २२—२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे चन्द्रादित्योपरागस्नानविधिर्नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें चन्द्रादित्योपरागस्नान-विधि नामक सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६७॥


अड़सठवाँ अध्याय

सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

<center>नारद उवाच</center><br>किमुद्वेगाद्भुते कृत्यमलक्ष्मीः केन हन्यते।<br>मृतवत्साभिषेकादिकार्येषु च किमिष्यते॥ १**नारदजीने पूछा—**प्रभो! किसी आकस्मिक एवं वेगशाली कष्टके प्राप्त होनेपर उसकी निवृत्तिके लिये तथा अद्भुत शान्तिके* लिये कौन-सा व्रत करना चाहिये? किस व्रतके अनुष्ठानसे दरिद्रताका विनाश किया जा सकता है तथा जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं, उस मृतवत्सा स्त्रीके स्नान आदि कार्योंमें उसकी शान्तिके लिये किस व्रतका विधान है?॥ १॥
<center>श्रीभगवानुवाच</center><br>पुरा कृतानि पापानि फलन्त्यस्मिंस्तपोधन।<br>रोगदौर्गत्यरूपेण तथैवेष्टवधेन च॥ २<br><br>तद्विघाताय वक्ष्यामि सदा कल्याणकारकम्।<br>सप्तमीस्नपनं नाम जनपीडाविनाशनम्॥ ३<br><br>बालानां मरणं यत्र क्षीरपाणां प्रदृश्यते।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च यौवने चापि वर्तताम्॥ ४<br><br>शान्तये तत्र वक्ष्यामि मृतवत्साभिषेचनम्।<br>एतदेवाद्वभुतोद्वेगचित्तभ्रमविनाशनम् ॥ ५**श्रीभगवान्‌ने कहा—**तपोधन! पूर्वजन्ममें किये हुए पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं सदा कल्याणकारी सप्तमीस्नपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीडाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुँहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु देखी जाती है वहाँ उसकी शान्तिके लिये मैं इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यही समस्त अद्भुत नामक उत्पातों, उद्वेगों और चित्तभ्रमका भी विनाशक है॥ २—५॥

* सामवेदीय 'अद्भुतब्राह्मण' (ताण्डव २६) तथा अथर्वपरिशिष्ट ७२ में अद्भुत शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।