भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 273

* अध्याय ६८ * २६३


| भविष्यति च वाराहो यत्र कल्पस्तपोधन।<br>वैवस्वतश्च तत्रापि यदा तु मनुरुत्तमः ॥ ६<br>भविष्यति च तत्रैव पञ्चविंशतिमं यदा।<br>कृतं नाम युगं तत्र हैहयान्वयवर्धनः।<br>भविता नृपतिर्वीरः कृतवीर्यः प्रतापवान् ॥ ७<br>स सप्तद्वीपमखिलं पालयिष्यति भूत लम्।<br>यावद्वर्षसहस्राणि सप्तसप्तति नारद ॥ ८<br>जातमात्रं च तस्यापि यावत् पुत्रशतं तथा।<br>च्यवनस्य तु शापेन विनाशमुपयास्यति ॥ ९<br>सहस्रबाहुश्च यदा भविता तस्य वै सुतः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् सम्भूतो नृपलक्षणैः ॥ १०<br>कृतवीर्यस्तदाऽऽराध्य सहस्रांशुं दिवाकरम्।<br>उपवासैर्व्रतैर्दिव्यैर्वेदसूक्तैश्च नारद।<br>पुत्रस्य जीवनायालभेतत् स्नानमवाप्स्यति ॥ ११<br>कृतवीर्येण वै पृष्ट इदं वक्ष्यति भास्करः।<br>अशेषदुष्टशमनं सदा कल्मषनाशनम् ॥ १२ | तपोधन! जब वाराह-कल्प आयेगा, उसमें भी जब श्रेष्ठ वैवस्वत मनुका कार्यकाल होगा, उसमें जब पचीसवाँ कृतयुग आयेगा तब कृतवीर्य नामका एक प्रतापी एवं शूरवीर नरेश उत्पन्न होगा जो हैहयवंशकी वृद्धि करनेवाला होगा। नारद! वह सतहत्तर हजार वर्षोंतक सातों द्वीपोंकी समस्त पृथ्वीका पालन करेगा। उसके सौ पुत्र होंगे, परंतु महर्षि च्यवनके शापसे वे सभी जन्मते ही नष्ट हो जायँगे। नारद! जब उसके सहस्र भुजाधारी, मृग-नेत्र-सरीखे नेत्रोंवाला, शोभाशाली एवं सम्पूर्ण राज-लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र उत्पन्न होगा तब राजा कृतवीर्य अपने उस पुत्रके दीर्घ जीवनकी प्राप्तिके निमित्त उपवास, व्रत तथा दिव्य वेद-सूक्तोंद्वारा सहस्रकिरणधारी सूर्यकी आराधना करके इस विशेष स्नान (स्नपनव्रत)-को प्राप्त करेगा। उस समय कृतवीर्यद्वारा पूछे जानेपर भगवान् सूर्य अखिल दोषोंके शामक एवं पापनाशक इस व्रतको बतलायेंगे ॥ ६–१२ ॥ |

सूर्य उवाच

| अलं क्लेशेन महता पुत्रस्तव नराधिप।<br>भविष्यति चिरंजीवी किंतु कल्मषनाशनम् ॥ १३<br>सप्तमीस्नपनं वक्ष्ये सर्वलोकहिताय वै।<br>जातस्य मृतवत्सायाः सप्तमे मासि नारद।<br>अथवा शुक्लसप्तम्यामेतत् सर्वं प्रशस्यते ॥ १४<br>ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>बालस्य जन्मनक्षत्रं वर्जयेत् तां तिथिं बुधः।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च कृत्यं स्यादितरेषु च ॥ १५<br>गोमयेनानुलिप्तायां भूमावेकाग्निवत् तदा।<br>तण्डुलै रक्तशालीयैश्चरुं गोक्षीरसंयुतम्।<br>निर्वपेत् सूर्यरुद्राभ्यां तन्मन्त्राभ्यां विधानतः ॥ १६<br>कीर्तयेत् सूर्यदैवत्यं समाचिं च घृताहुतीः।<br>जुहुयाद् रुद्रसूक्तेन तद्वद् रुद्राय नारद ॥ १७ | **भगवान् सूर्य कहेंगे—**नरेश्वर! अब तुम अधिक कष्ट मत सहन करो, तुम्हारा पुत्र चिरंजीवी होगा, किंतु सम्पूर्ण लोकोंके हितके हेतु मैं जिस पापनाशक सप्तमीस्नपन-व्रतका वर्णन करूँगा, उसका अनुष्ठान तुम्हें भी करना चाहिये। नारद! मृतवत्सा स्त्रीके नवजात शिशुके लिये सातवें महीनेमें अथवा शुक्लपक्षकी किसी भी सप्तमी तिथिको यह सारा कार्य प्रशस्त माना गया है। यदि उस तिथिको बालकका जन्म-नक्षत्र पड़ता हो तो बुद्धिमान् कर्ताको उस तिथिका त्याग कर देना चाहिये। उसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये भी किये जानेवाले कार्यमें इसका विचार करना आवश्यक है। व्रतारम्भमें व्रती ग्रहबल एवं ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर एकाग्निक उपासककी भाँति गो-दुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान पकाये, फिर सूर्य और रुद्रको पृथक्-पृथक् उनके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक वह हव्यान प्रदान करे। उस समय सूर्यसूक्तकी सात ऋचाओंका पाठ करे और अग्निमें घीकी सात आहुतियोंसे हवन करे। नारद! रुद्रके लिये भी उसी प्रकार |