मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ८३ * ३०३
| गाश्च दद्याच्चतुर्विंशत्यथवा दश नारद।<br>नव सप्त तथाष्टौ वा पञ्च दद्यादशक्तिमान् ॥ ३७<br>एकापि गुरवे देया कपिला च पयस्विनी।<br>पर्वतानामशेषाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३८<br>त एव पूजने मन्त्रास्त एवोपस्करा मताः।<br>ग्रहाणां लोकपालानां ब्रह्मादीनां च सर्वदा ॥ ३९<br>स्वमन्त्रेणैव सर्वेषु होमः शैलेषु पठ्यते।<br>उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिष्यते ॥ ४०<br>विधानं सर्वशैलानां क्रमशः शृणु नारद।<br>दानकाले च ये मन्त्राः पर्वतेषु च यत्फलम् ॥ ४१<br>अन्नं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः।<br>अन्नाद् भवन्ति भूतानि जगदन्नेन वर्तते ॥ ४२<br>अन्नमेव ततो लक्ष्मीरन्नमेव जनार्दनः।<br>धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम ॥ ४३<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् धान्यमयं गिरिम्।<br>मन्वन्तरशतं साग्रं देवलोके महीयते ॥ ४४<br>अप्सरोगणगन्धर्वैराकीर्णेन विराजता।<br>विमानेन दिवः पृष्ठमायाति स्म निषेवितः।<br>धर्मक्षये राजराज्यमाप्नोतीह न संशयः ॥ ४५ | देना चाहिये। नारद! इसके बाद चौबीस, दस, नौ, आठ, सात अथवा पाँच गौ दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान कर दे। सभी पर्वतदानोंके लिये यही विधि कही गयी है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत-पूजनोंमें उन-उनके मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। नारद! अब तुम सभी पर्वतदानोंकी विधि, दानकालमें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्र और उन दानोंसे प्राप्त होनेवाला जो फल है, वह सब क्रमशः सुनो। (दान देते समय धान्यशैलसे यों प्रार्थना करनी चाहिये—) 'पर्वतश्रेष्ठ! अन्नको ही ब्रह्म कहा जाता है; क्योंकि अन्नमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्नसे जगत् वर्तमान है, इसलिये अन्न ही लक्ष्मी है, अन्न ही भगवान् जनार्दन है, इसलिये धान्यशैलके रूपसे तुम मेरी रक्षा करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे वह स्वर्गलोकमें आता है और उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्यक्षय होनेपर वह इस लोकमें निस्संदेह राजाधिराज होता है॥ ३१—४५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे दानमाहात्म्यं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें दानमाहात्म्य नामक तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८३ ॥