मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३०४ * मत्स्यपुराण *
चौरासीवाँ अध्याय
लवणाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं श्रेष्ठ लवणाचलके$^१$ दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य शिव-संयुक्त लोकोंको अर्थात् शिवलोकोंको प्राप्त करता है। सोलह द्रोण नमकसे लवणाचल बनाना चाहिये; क्योंकि यही उत्तम है। उसके आधे आठ द्रोणसे मध्यम और (चार$^२$) द्रोणसे बना हुआ अधम माना गया है। निर्धन मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार एक द्रोणसे कुछ अधिकका बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त (पर्वत-परिमाणके) चौथाई द्रोणसे पृथक्-पृथक् (चार) विष्कम्भपर्वतोंका निर्माण कराना उचित है। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनका विधान सदा पूर्ववत् होना चाहिये। उसी प्रकार सभी स्वर्णमय लोकपालोंके स्थापनाका विधान है। पहलेकी तरह इसमें भी कामदेव आदि देवों और सरोवरोंका निर्माण कराना चाहिये तथा रातमें जागरण भी करना चाहिये। अब दानमन्त्रोंको सुनो—'पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि यह नमकरूप रस सौभाग्य-सरोवरसे$^३$ प्रादुर्भूत हुआ है, इसलिये उसके दानसे तुम मेरी रक्षा करो। चूँकि सभी प्रकारके अन्न एवं रस नमकके बिना उत्कृष्ट नहीं होते, अर्थात् स्वादिष्ट नहीं लगते तथा तुम शिव और पार्वतीको सदा परम प्रिय हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए हो और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हो, इसलिये तुम पर्वतरूपसे मेरा संसार-सागरसे उद्धार करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे लवणपर्वतका दान करता है, वह एक कल्पतक पार्वतीलोकमें निवास करता है और अन्तमें परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है॥ १—९॥ |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लवणाचलमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरो लोकानाप्नोति शिवसंयुतान्॥ १<br><br>उत्तमः षोडशद्रोणैः कर्तव्यो लवणाचलः।<br>मध्यमः स्यात् तदर्धेन चतुर्भिरधमः स्मृतः॥ २<br><br>वित्तहीनो यथाशक्त्या द्रोणादूर्ध्वं तु कारयेत्।<br>चतुर्थांशेन विष्कम्भपर्वतान् कारयेत् पृथक् ॥ ३<br><br>विधानं पूर्ववत् कुर्याद् ब्रह्मादीनां च सर्वदा।<br>तद्वद्धेममयान् सर्वांल्लोकपालान् निवेशयेत्॥ ४<br><br>सरांसि कामदेवादींस्तद्वदत्रापि कारयेत्।<br>कुर्याज्जागरणं चापि दानमन्त्रान् निबोधत॥ ५<br><br>सौभाग्यरससम्भूतो यतोऽयं लवणाचलः।<br>तद्दानकर्तृत्वेन त्वं मां पाहि नगोत्तम॥ ६<br><br>यस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कटा लवणं विना।<br>प्रियं च शिवयोर्नित्यं तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७<br><br>विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम्।<br>तस्मात् पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्॥ ८<br><br>अनेन विधिना यस्तु दद्याल्लवणपर्वतम्।<br>उमालोके वसेत् कल्पं ततो याति परां गतिम्॥ ९ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे लवणाचलकीर्तनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें लवणाचलकीर्तन नामक चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८४॥
१. बल्लालसेनने 'दानसागर' इसे मत्स्य अ० ८४का कहकर 'विष्णुदैवत दान' माना है। यह वर्णन पद्मपु० १।१२१।११७–३५, भविष्योत्तरपु० १२६ और महाभारत आदिमें भी आता है।
२. यह 'विधानपारिजात' कार मदनभूपालका मत है। उन्होंने सर्वत्र लम्बी टिप्पणियाँ लिखी हैं।
३. यह वर्णन पहले सौभाग्यशयनमें आ चुका है।