मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ८५ * | ३०५ |
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पचासीवाँ अध्याय
गुड़पर्वतके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br><br>अतः परं प्रवक्ष्यामि गुडपर्वतमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरः श्रीमान् स्वर्गमाप्नोति पूजितम्॥ १<br>उत्तमो दशभिर्भारैर्मध्यमः पञ्चभिर्मतः।<br>त्रिभिर्भारैः कनिष्ठः स्यात् तदर्धेनाल्पवित्तवान्॥ २<br>तद्वदामन्त्रणं पूजां हेमवृक्षसुरार्चनम्।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वत् सरांसि वनदेवताः॥ ३<br>होमं जागरणं तद्वल्लोकपालाधिवासनम्।<br>धान्यपर्वतवत् कुर्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ ४<br>यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः।<br>सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम्॥ ५<br>प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा।<br>तथा रसानां प्रवरः सदैवक्षुरसो मतः॥ ६<br>मम तस्मात् परां लक्ष्मीं ददस्व गुडपर्वत।<br>यस्मात् सौभाग्यदायिन्या भ्राता त्वं गुडपर्वत।<br>निवासश्चापि पार्वत्यास्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् गुडमयं गिरिम्।<br>पूज्यमानः स गन्धर्वैर्गौरीलोके महीयते॥ ८<br>ततः कल्पशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्।<br>आयुरायोग्यसम्पन्नः शत्रुभिश्चापराजितः॥ ९ | ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं (उस) उत्तम गुड़पर्वतके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका दान करनेसे धनी मनुष्य देवपूजित हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। दस भार गुड़से बना हुआ गुड़पर्वत उत्तम, पाँच भारसे बना हुआ मध्यम और तीन भारसे बना हुआ कनिष्ठ कहा जाता है। स्वल्प वित्तवाला मनुष्य इसके आधे परिमाणसे भी काम चला सकता है। इसमें भी देवताओंका आमन्त्रण, पूजन, स्वर्णमय वृक्ष, देव-पूजन, विष्कम्भपर्वत, सरोवर, वन-देवता, हवन, जागरण और लोकपालोंकी स्थापना आदि धान्यपर्वतकी ही भाँति करना चाहिये। उस समय यह मन्त्र उच्चारण करे—'जिस प्रकार देवगणोंमें ये विश्वात्मा जनार्दन, वेदोंमें सामवेद* योगियोंमें महादेव, समस्त मन्त्रोंमें ॐकार और नारियोंमें पार्वती श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार रसोंमें इक्षु-रस सदा श्रेष्ठ माना गया है। इसलिये गुड़पर्वत! तुम मुझे उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करो। गुड़पर्वत! चूँकि तुम सौभाग्यदायिनी पार्वतीके भ्राता और निवासस्थान हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार गुड़पर्वतका दान करता है, वह गन्धर्वोंद्वारा पूजित होकर गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा सौ कल्प व्यतीत होनेपर दीर्घायु एवं नीरोगतासे सम्पन्न होकर भूतलपर जन्म ग्रहण करता है और शत्रुओंके लिये अजेय होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है॥ १—९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे गुडपर्वतकीर्तनं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें गुड़पर्वतकीर्तन नामक पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८५॥
* इस पुराणमें सामवेदकी सर्वत्र प्रमुख रूपसे चर्चा है, यह ध्येय है।