मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 322, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 322
३१२ * मत्स्यपुराण *
| मन्दारः पारिजातश्च तृतीयः कल्पपादपः।<br>एतद् वृक्षत्रयं मूर्ध्नि सर्वेष्वपि निवेशयेत्॥ ५<br>हरिचन्दनसंतानौ पूर्वपश्चिमभागयोः।<br>निवेश्यौ सर्वशैलेषु विशेषाच्छर्कराचले॥ ६<br>मन्दरे कामदेवस्तु प्रत्यग्वक्त्रः सदा भवेत्।<br>गन्धमादनशृङ्गे च धनदः स्यादुदङ्मुखः॥ ७<br>प्राङ्मुखो वेदमूर्तिंश्च हंसः स्याद् विपुलाचले।<br>हैमी सुपार्श्वे सुरभिर्दक्षिणाभिमुखी भवेत्॥ ८ | मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष—इन तीनों वृक्षोंकी भी स्वर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करे। इन तीनों वृक्षोंको तो प्रायः सभी पर्वतोंपर स्थापित कर देना चाहिये। सभी पर्वतोंके पूर्व और पश्चिम भागमें हरिचन्दन और कल्पवृक्षको निविष्ट करना चाहिये। शर्कराचलमें तो इसका विशेषरूपसे ध्यान रखना चाहिये। मन्दराचलपर कामदेवकी मूर्ति सदा पश्चिमाभिमुखी, गन्धमादनके शिखरपर कुबेरकी मूर्ति उत्तराभिमुखी, विपुलाचलपर वेदमूर्ति—ब्रह्मा और हंसकी मूर्ति पूर्वाभिमुखी और सुपार्श्व पर्वतपर स्वर्णमयी गौकी मूर्ति दक्षिणाभिमुखी होनी चाहिये॥ १-८॥ |
| धान्यपर्वतवत् सर्वमावाहनविधानकम्।<br>कृत्वा तु गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम्।<br>ऋत्विग्भ्यश्चतुरः शैलानिमान् मन्त्रानुदीरयन्॥ ९<br>सौभाग्यामृतसारोऽयं पर्वतः शर्करायुतः।<br>तस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा॥ १०<br>अमृतं पिबतां ये तु निपेतुर्भुवि शीकराः।<br>देवानां तत्समुत्थस्त्वं पाहि नः शर्कराचल॥ ११<br>मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः।<br>तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्॥ १२<br>यो दद्याच्छर्कराशैलमनेन विधिना नरः।<br>सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः स याति परमं पदम्॥ १३<br>चन्द्रतारार्कसंकाशमधिरुह्यानुजीविभिः ।<br>सहैव यानमातिष्ठेत् तत्र विष्णुप्रचोदितः॥ १४<br>ततः कल्पशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्।<br>आयुरारोग्यसम्पन्नो यावज्जन्मार्बुदत्रयम्॥ १५<br>भोजनं शक्तितः दद्यात् सर्वशैलेष्वमत्सरः।<br>सर्वत्राक्षारलवणमश्रीयात् तदनुज्ञया।<br>पर्वतोपस्करान् सर्वान् प्रापयेद् ब्राह्मनालयम्॥ १६ | तत्पश्चात् आवाहन आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी भाँति करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बिचला प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। (वे मन्त्र इस प्रकारके अर्थवाले हैं—) 'शैलेन्द्र! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल! देवताओंके अमृत-पान करते समय जो बूँदें भूतलपर टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है; अतः तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ ही सूर्य, चन्द्र और तारकाओंके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ़ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अरब जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानोंमें मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करानेका विधान है। सर्वत्र गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल क्षार (नमक)-रहित भोजन करना चाहिये। पुनः पर्वतदानकी सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिये॥ ९-१६॥ |
| ईश्वर उवाच<br><br>आसीत् पुरा बृहत्कल्पे धर्ममूर्तिर्जनाधिपः।<br>सुहृच्छक्रस्य निहता येन दैत्याः सहस्रशः॥ १७ | ईश्वरने कहा— नारद! पहले बृहत्कल्पमें धर्ममूर्ति नामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों दैत्योंका वध किया था। |