भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 323

* अध्याय ९२ * ३१३

श्लोकअर्थ
सोमसूर्यादयो यस्य तेजसा विगतप्रभाः।<br>अभवञ्छतशो येन शत्रवश्च पराजिताः।<br>यथेच्छारूपधारी च मनुष्योऽप्यपराजितः॥ १८<br>तस्य भानुमती नाम भार्या त्रैलोक्यसुन्दरी।<br>लक्ष्मीवद् दिव्यरूपेण निर्जितामरसुन्दरी ॥ १९<br>राज्ञस्तस्याग्रमहिषी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।<br>दशनारीसहस्राणां मध्ये श्रीरिव राजते ॥ २०<br>नृपकोटिसहस्रेण न कदाचित् स मुच्यते।<br>कदाचिदास्थानगतं पप्रच्छ स पुरोधसम्।<br>विस्मयेनावृतो राजा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ २१वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ था, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पत्नीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकीमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी। उसने लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीचमें लक्ष्मीकी तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। उसे असंख्य राजा सदा घेरे रहते थे। एक बार सभामण्डपमें आये हुए अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मयविमुग्ध हो ऐसा प्रश्न किया॥ १७-२१ ॥
राजोवाच<br>भगवन् केन धर्मेण मम लक्ष्मीरनुत्तमा।<br>कस्माच्च विपुलं तेजो मच्छरीरे सदोत्तमम् ॥ २२**राजाने पूछा—**भगवन्! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है? तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है?॥ २२ ॥
वसिष्ठ उवाच<br>पुरा लीलावती नाम वेश्या शिवपरायणा।<br>तया दत्तश्चतुर्दश्यां गुरवे लवणाचलः।<br>हेमवृक्षादिभिः सार्धं यथावद् विधिपूर्वकम् ॥ २३<br>शूद्रः सुवर्णकारश्च नाम्ना शौण्डोऽभवत् तदा।<br>भृत्यो लीलावतीगेहे तेन हेम्ना विनिर्मिताः ॥ २४<br>तरवः सुरमुख्याश्च श्रद्धायुक्तेन पार्थिव।<br>अतिरूपेण सम्पन्ना घटयित्वा बिना भृतिम्।<br>धर्मकार्यमिति ज्ञात्वा न गृह्णाति कथञ्चन ॥ २५<br>उज्ज्वलिताश्च तत्पत्न्या सौवर्णामरपादपाः।<br>लीलावती गिरेः पार्श्वे परिचर्यां च पार्थिव ॥ २६<br>कृत्वा ताभ्यामशाठ्येन गुरुशुश्रूषणादिकम्।<br>सा च लीलावती वेश्या कालेन महतापि च ॥ २७<br>कालधर्ममनुप्राप्ता कर्मयोगेन नारद।<br>सर्वपापविनिर्मुक्ता जगाम शिवमन्दिरम् ॥ २८<br>योऽसौ सुवर्णकारस्तु दरिद्रोऽप्यतिसत्त्ववान्।<br>न मौल्यमादाद् वेश्यायाः स भवानिह साम्प्रतम् ॥ २९**वसिष्ठजीने कहा—**राजन्! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्ता थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शूद्रजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका निर्माण किया था। उसने बिना कुछ पारिश्रमिक लिये उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है—ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी नहीं लिया था। पृथ्वीपते! उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियोंको रगड़कर चमकीला बनाया था और लीलावतीके पर्वत-दानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरु-शुश्रूषा आदि कार्योंको सम्पन्न किया था। नारद! अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या लीलावती कर्मयोगके अनुसार जब कालधर्म (मृत्यु)-को प्राप्त हुई, तब समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको चली गयी। वह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो,