भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 327
* अध्याय ९३ *३१७

| मृदानीय विप्रेन्द्र सर्वौषधिजलान्विताम्।<br>स्नानार्थं विन्यसेत् तत्र यजमानस्य धर्मवित्॥ २४<br>सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि जलदा नदाः।<br>आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः॥ २५<br>एवमावाहयेदेतानमरान् मुनिसत्तम।<br>होमं समारभेत् सर्पिर्यवव्रीहितिलादिभिः॥ २६<br>अर्कः पलाशखदिरावपामार्गोऽथ पिप्पलः।<br>औदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्॥ २७<br>एकैकस्याष्टकशतमुष्टाविंशतिरेव वा।<br>होतव्या मधुसर्पिर्भ्यां दध्ना चैव समन्विताः॥ २८<br>प्रादेशमात्रा अशिफा अशाखा अपलाशिनीः।<br>समिधः कल्पयेत् प्राज्ञः सर्वकर्मसु सर्वदा॥ २९<br>देवानापि सर्वेषामुपांशुः परमार्थवित्।<br>स्वेन स्वेनैव मन्त्रेण होतव्याः समिधः पृथक्॥ ३० | कुण्ड और गोशालेकी मिट्टी लाकर उसे सर्वौषधमिश्रित जलसे अभिषिक्त कर यजमानके स्नानके लिये वहाँ प्रस्तुत कर दे तथा 'यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदी, नद, बादल और सरोवर यहाँ पधारें' यों कहकर इन देवताओंका आवाहन करे। मुनिसत्तम ! तत्पश्चात् घी, यव, चावल, तिल आदिसे हवन प्रारम्भ करे। मदार, पलाश, खैर, चिचिंडा, पीपल, गूलर, शमी, दूब और कुश—ये क्रमशः नवों ग्रहोंकी समिधाएँ हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहके लिये मधु, घी और दहीसे युक्त एक सौ आठ अथवा अट्ठाईस आहुतियाँ हवन करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको सदा सभी कर्मोंमें अँगूठेके सिरेसे तर्जनीके सिरेतककी मापवाली तथा बरोह, शाखा और पत्तोंसे रहित समिधाओंकी कल्पना करनी चाहिये। परमार्थवेत्ता यजमान सभी देवताओंके लिये उन-उनके पृथक्-पृथक् मन्त्रोंका मन्द स्वरसे उच्चारण करते हुए समिधाओंका हवन करे॥ २१—३०॥ | | होतव्यं च घृताभ्यक्तं चरुभक्षादिकं पुनः।<br>मन्त्रैर्दशाहुतीर्हुत्वा होमं व्याहृतिभिस्ततः॥ ३१<br><br>उदङ्मुखाः प्राङ्मुखा वा कुर्युर्ब्राह्मणपुंगवाः।<br>मन्त्रवन्तश्च कर्तव्याश्चरवः प्रतिदैवतम्॥ ३२<br><br>दत्त्वा च तांश्चरून् सम्यक् ततो होमं समाचरेत्।<br>आकृष्णेनेति सूर्याय होमः कार्यों द्विजन्मना॥ ३३<br><br>आप्यायस्वेति सोमाय मन्त्रेण जुहुयात् पुनः।<br>अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्र इति भौमाय कीर्तयेत्॥ ३४<br><br>अग्ने विवस्वदुषस इति सोमसुताय वै।<br>बृहस्पते परिदीया रथेनेति गुरोर्मतः॥ ३५<br><br>शुक्रं ते अन्यदिति च शुक्रस्यापि निगद्यते।<br>शनैश्चरायेति पुनः शं नो देवीति होमयेत्॥ ३६ | पुनः चरु आदि हवनीय पदार्थोंमें घी मिलाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् व्याहृतियोंका उच्चारण करके घीकी दस आहुतियाँ अग्निमें डाले। पुनः श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर प्रत्येक देवताके मन्त्रोच्चारणपूर्वक चरु आदि पदार्थोंका हवन करें। इस प्रकार उन चरुओंका भलीभाँति हवन करनेके पश्चात् (प्रत्येक देवताके लिये उसके मन्त्रद्वारा) हवन करना चाहिये। ब्राह्मणको 'आकृष्णेन रजसा०'* (शुक्लयजुर्वाजसने० सं० ३३। ४३)—इस मन्त्रका उच्चारण कर सूर्यके लिये हवन करना चाहिये। पुनः 'आप्यायस्व०' (वही १२। ११४) इस मन्त्रसे चन्द्रमाके लिये आहुति डाले। मंगलके लिये 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०' (वही० १३। १४) इस मन्त्रका पाठ करे। बुधके लिये 'अग्ने विवस्वदुषस०'—(ऋ० सं० १। ४४। १) और देवगुरु बृहस्पतिके लिये 'परिदीया रथेन०' (ऋक्० ५। ८३। ७)—ये मन्त्र माने गये हैं।* शुक्रके लिये 'शुक्रं ते अन्यद्०' (ऋ० सं० ६। ५८। १, कृष्णय० तैत्तिरी० सं० ४। १। ११। २)—यह मन्त्र बतलाया गया है। शनैश्चरके लिये 'शं नो देवीरभीष्टये०' (शुक्लयजु० वाज० ३६। १२३)—इस मन्त्रसे हवन करना |


* यहाँ ग्रहों और देवताओंके कुछ मन्त्र अन्य पुराणों, स्मृतियों तथा पद्धतियोंसे भिन्न निर्दिष्ट हुए हैं।

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