मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३१८ * मत्स्यपुराण *
| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| कयानश्चित्र आभुव इति राहोरुदाहृतः।<br>केतुं कृण्वन्नपि ब्रूयात् केतूनामपि शान्तये ॥ ३७ | चाहिये। राहुके लिये 'कया नश्चित्र आभुव०' (वही २७।३९)—यह मन्त्र कहा गया है तथा केतुकी शान्तिके लिये—'केतुं कृण्वन्०' (वही २९।३७) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये॥ ३१—३७॥ |
| आवो राजेति रुद्रस्य बलिहोमं समाचरेत्।<br>आपो हिष्ठेत्युमायास्तु स्यो नेति स्वामिनस्तथा ॥ ३८<br><br>विष्णोरिदं विष्णुरिति तमीशेति स्वयम्भुवः।<br>इन्द्रमिद्धेवतायेति इन्द्राय जुहुयात् ततः ॥ ३९<br><br>तथा यमस्य चायं गौरिति होमः प्रकीर्तितः।<br>कालस्य ब्रह्म जज्ञानमिति मन्त्रः प्रशस्यते ॥ ४०<br><br>चित्रगुप्तस्य चाज्ञातमिति मन्त्रविदो विदुः।<br>अग्निं दूतं वृणीमह इति वह्नेरुदाहृतः ॥ ४१<br><br>उदुत्तमं वरुणमित्यपां मन्त्रः प्रकीर्तितः।<br>भूमेः पृथिव्यन्तरिक्षमिति वेदेषु पठ्यते ॥ ४२<br><br>सहस्रशीर्षा पुरुष इति विष्णोरुदाहृतः।<br>इन्द्रायेन्द्रो मरुत्वत इति शक्रस्य शस्यते ॥ ४३<br><br>उत्तानपर्णे सुभगे इति देव्याः समाचरेत्।<br>प्रजापतेः पुनर्होमः प्रजापतिरिति स्मृतः ॥ ४४<br><br>नमोऽस्तु सर्पेभ्य इति सर्पाणां मन्त्र उच्यते।<br>एष ब्रह्मा य ऋत्विग्भ्य इति ब्रह्मण उदाहृतः ॥ ४५<br><br>विनायकस्य चानूनमिति मन्त्रो बुधैः स्मृतः।<br>जातवेदसे सुनवामिति दुर्गेऽयमुच्यते ॥ ४६<br><br>आदिप्रत्नस्य रेतस आकाशस्य उदाहृतः।<br>क्राणा शिशुर्महीनां च वायोर्मन्त्रः प्रकीर्तितः ॥ ४७<br><br>एषो उषा अपूर्व्या इत्यश्विनोर्मन्त्र उच्यते।<br>पूर्णाहुतिस्तु मूर्धानं दिव इत्यभिपातयेत् ॥ ४८ | फिर 'आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रम्' (ऋक्सं० ४।३।१; कृष्णयजु० तै० सं० १।३।१४।१)—इस मन्त्रका उच्चारण कर रुद्रके लिये हवन और बलि देना चाहिये। तत्पश्चात् उमाके लिये 'आपो हि ष्ठा०' (वाजस-सं० ११।५०)—इस मन्त्रसे, स्वामिकार्तिकके लिये 'स्यो ना०'—इस मन्त्रसे, विष्णुके लिये 'इदं विष्णुः०' (शुक्लयजु० वाज० ५।१५)—इस मन्त्रसे, ब्रह्माके लिये 'तमीशानम्०' (वाजस० २५।१८)—इस मन्त्रसे, और इन्द्रके लिये 'इन्द्रमिद्धेवताय०'—इस मन्त्रसे आहुति डाले। उसी प्रकार यमके लिये 'अयं गौः०' (वही ३।६)—इस मन्त्रसे हवन बतलाया गया है। कालके लिये—'ब्रह्मजज्ञानम्०' (वही १३।३) यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। मन्त्रवेत्तालोग चित्रगुप्तके लिये 'अज्ञातम्०'—यह मन्त्र बतलाते हैं। अग्निके लिये 'अग्निं दूतं वृणीमहे' (ऋक्सं० १।१२।१; अथर्व० २०।१०१।१)—यह मन्त्र बतलाया गया है। वरुणके लिये 'उदुत्तमं वरुणपाशम्' (ऋक्सं० १।२४।१५)—यह मन्त्र कहा गया है। वेदोंमें पृथ्वीके लिये 'पृथिव्यन्तरिक्षम्०'—इस मन्त्रका पाठ है। विष्णुके लिये 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०' (वाजस० सं० ३१।१)—यह मन्त्र कहा गया है। इन्द्रके लिये 'इन्द्रायेन्द्रो मरुत्वत०'—यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। देवीके लिये 'उत्तानपर्णे सुभगे०'—यह मन्त्र जानना चाहिये। पुनः प्रजापतिके लिये 'प्रजापतिः०' (वाजस० सं० ३१।१७)—यह हवन-मन्त्र कहा जाता है। सर्पोंके लिये 'नमोऽस्तु सर्पेभ्यः०' (वही १३।६)—यह मन्त्र बतलाया जाता है। ब्रह्माके लिये 'एष ब्रह्मा य ऋत्विग्भ्यः०'—यह मन्त्र कहा गया है। विनायकके लिये विद्वानोंने 'अनूनम्०'—यह मन्त्र बतलाया है। 'जातवेदसे सुनवाम०' (ऋक्० १।९९।१)—यह दुर्गा-मन्त्र कहा जाता है। 'आदिप्रत्नस्य रेतस०'—यह आकाशका मन्त्र बतलाया जाता है। 'क्राणा शिशुर्महीनां च०'—यह वायुका मन्त्र कहा गया है। 'एषो उषाअपूर्व्यात्०'—यह अश्विनी-कुमारोंका मन्त्र कहा जाता है। 'मूर्धानं दिव०' (ऋक्० ६।७।१; वाज० ७।२४)—इस मन्त्रसे हवनकुण्डमें पूर्णाहुति डालनी चाहिये॥ ३८—४८॥ |