भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ९३ *३२७

| प्रतिरूपं रिपोः कृत्वा क्षुरेण परिकर्तयेत्।<br>रिपुरूपस्य शकलान्यथैवाग्नौ विनिःक्षिपेत्॥ १५३<br>ग्रहयज्ञविधानान्ते सदैवाभिचरन् पुनः।<br>विद्वेषणं तथा कुर्वन्नेतदेव समाचरेत्॥ १५४<br>इहैव फलदं पुंसामेतन्नामुत्र शोभनम्।<br>तस्माच्छान्तिकमेवात्र कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥ १५५<br>ग्रहयज्ञत्रयं कुर्याद् यस्त्वकाम्येन मानवः।<br>स विष्णोः पदमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५६<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>न तस्य ग्रहपीडा स्यान्न च बन्धुजनक्षयः॥ १५७<br>ग्रहयज्ञत्रयं गेहे लिखितं यत्र तिष्ठति।<br>न पीडा तत्र बालानां न रोगो न च बन्धनम्॥ १५८<br>अशेषयज्ञफलदं निःशेषाघविनाशनम्।<br>कोटिहोमं विदुः प्राज्ञा भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ १५९<br>अश्वमेधफलं प्राहुर्लक्षहोमं सुरोत्तमाः।<br>द्वादशाहमखस्तद्वन्नवग्रहमखः स्मृतः॥ १६०<br>इति कथितमिदानीमुत्सवानन्दहेतोः<br>सकलकलुषहारी देवयज्ञाभिषेकः।<br>परिपठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-<br>दभिभवति स शत्रूनायुरारोग्ययुक्तः॥ १६१ | यज्ञ-विधान लिखकर रखे रहते हैं, वहाँ न तो बालकोंको कोई कष्ट होता है, न रोग तथा बन्धन भी नहीं होता। विद्वानोंका कहना है कि कोटिहोम सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता, अखिल पापोंका विनाशक और भोग एवं मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला है। श्रेष्ठ देवगण लक्षहोमको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाते हैं। उसी प्रकार नवग्रह-यज्ञ, द्वादशाह-यज्ञके सदृश फलकारक बतलाया जाता है। इस प्रकार मैंने इस समय उत्सवके आनन्दकी प्राप्तिके लिये सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले इस देवयज्ञाभिषेकका वर्णन कर दिया। जो मनुष्य प्रसङ्गवश इसका इसी रूपमें पाठ अथवा श्रवण करता है, वह दीर्घायु एवं नीरोगतासे युक्त होकर अपने शत्रुओंको पराजित कर देता है॥ १४९-१६१॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नवग्रहहोमशान्तिविधानं नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नवग्रहहोमशान्तिविधान नामक तिरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९३॥