भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२६ * मत्स्यपुराण *

| ब्रह्महत्यासहस्त्राणि भ्रूणहत्यार्बुदानि च।<br>कोटिहोमेन नश्यन्ति यथावच्छिवभाषितम्॥ १३९<br><br>वश्यकर्माभिचारादि तथैवोच्चाटनादिकम्।<br>नवग्रहमखं कृत्वा ततः काम्यं समाचरेत्॥ १४०<br><br>अन्यथा फलदं पुंसां न काम्यं जायते क्वचित्।<br>तस्मादयुतहोमस्य विधानं पूर्वमाचरेत्॥ १४१<br><br>वृत्तं चोच्चाटने कुण्डं तथा च वशकर्मणि।<br>त्रिमेखलैश्कवक्त्रमरत्निर्विस्तरेण तु॥ १४२<br><br>पलाशसमिधः शस्ता मधुगोरोचनान्विताः।<br>चन्दनागुरुणा तद्वत् कुङ्कुमेनाभिषिञ्चिताः॥ १४३<br><br>होमयेन्मधुसर्पिर्भ्यां बिल्वानि कमलानि च।<br>सहस्राणि दशैवोक्तं सर्वदैव स्वयम्भुवा॥ १४४<br><br>वश्यकर्मणि बिल्वानां पद्मानां चैव धर्मवित्।<br>सुमित्रिया न आप ओषधय इति होमयेत्॥ १४५<br><br>न चात्र स्थापनं कार्यं न च कुम्भाभिषेचनम्।<br>स्नानं सर्वौषधैः कृत्वा शुक्लपुष्पाम्बरो गृही॥ १४६<br><br>कण्ठसूत्रैः सकनकैर्विप्रान् समभिपूजयेत्।<br>सूक्ष्मवस्त्राणि देयानि शुक्ला गावः सकाञ्चनाः॥ १४७<br><br>अवशानि वशीकुर्यात् सर्वशत्रुबलान्यपि।<br>अमित्राण्यपि मित्राणि होमोऽयं पापनाशनः॥ १४८<br><br>विद्वेषणेऽभिचारे च त्रिकोणं कुण्डमिष्यते।<br>त्रिमेखलं कोणमुखं हस्तमात्रं च सर्वशः॥ १४९<br><br>होमं कुर्युस्ततो विप्रा रक्तमाल्यानुलेपनाः।<br>निवीतलोहितोष्णीषा लोहिताम्बरधारिणः॥ १५०<br><br>नववायसरक्ताढ्यपात्रत्रयसमन्विताः ।<br>समिधो वामहस्तेन श्येनास्थिबलसंयुताः।<br>होतव्या मुक्तकेशैस्तु ध्यायद्भिर्भिरशिवं रिपौ॥ १५१<br><br>दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु तथा हुंफडितीति च।<br>श्येनाभिचारमन्त्रेण क्षुरं समभिमन्त्र्य च॥ १५२ | है। शिवजीने यथार्थरूपसे कहा है कि कोटिहोमके अनुष्ठानसे हजारों ब्रह्महत्या और अरबों भ्रूणहत्या-जैसे महापातक नष्ट हो जाते हैं॥१३१-१३९॥<br><br>नारद! यदि वशीकरण, अभिचार तथा उच्चाटन आदि काम्य कर्मोंका अनुष्ठान करना हो तो पहले नवग्रह-यज्ञ सम्पन्न कर तत्पश्चात् काम्य कर्म करना चाहिये, अन्यथा वह काम्य कर्म मनुष्योंको कहीं भी फलदायक नहीं हो सकता। अतः पहले अयुतहोमका सम्पादन कर लेना उचित है। उच्चाटन और वशीकरण कर्मोंमें कुण्डको गोलाकार बनाना चाहिये। उसका विस्तार अर्थात् व्यास एक अरत्नि हो। वह तीन मेखलाओं और एक मुखसे युक्त हो। इन कार्योंमें मधु, गोरोचन, चन्दन, अगुरु और कुङ्कुमसे अभिषिक्त की हुई पलाशकी समिधाएँ प्रशस्त मानी गयी हैं। मधु और घीसे चुपड़े हुए बेल और कमल-पुष्पके हवनका विधान है। ब्रह्माने सदा दस हजार आहुतियोंका ही विधान बतलाया है। धर्मज्ञ यजमानको वशीकरण-कर्ममें 'सुमित्रिया न आप ओषधयः'—इस मन्त्रसे हवन करना चाहिये। इस कार्यमें कलशका स्थापन और अभिषेचन नहीं किया जाता। गृहस्थ यजमान सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान करके श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण कर ले और स्वर्णनिर्मित कण्ठहारोंसे ब्राह्मणोंकी पूजा करे तथा उन्हें महीन वस्त्र एवं स्वर्णसे विभूषित श्वेत रंगकी गौएँ प्रदान करे। (इस प्रकार विधिपूर्वक सम्पन्न किया गया) यह पापनाशक हवन वशमें न आनेवाली शत्रुओंकी सारी सेनाओंको वशीभूत कर देता है और शत्रुओंको मित्र बना देता है॥ १४०-१४८॥<br><br>समृद्धिकामी पुरुषको इन कर्मोंमेंसे केवल शान्तिकर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये। जो मानव निष्कामभावसे इन तीनों ग्रहयज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस ग्रहयज्ञको नित्य सुनता अथवा दूसरेको सुनाता है, उसे न तो ग्रहजनित पीडा होती है और न उसके बन्धुजनोंका विनाश ही होता है। जिस घरमें ये तीनों (ग्रह, लक्ष एवं कोटि होम) |