भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 1098 में से

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  • अध्याय ९३ * ३२५
मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसंनिभम्।<br>वेदी च कोटिहोमे स्याद् वितस्तीनां चतुष्टयम्॥ १२६<br>चतुरस्त्रा समन्ताच्य त्रिभिर्वप्रैस्तु संयुता।<br>वप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनां च तथोच्छ्रयः॥ १२७<br>तथा षोडशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।<br>पूर्वद्वारे च संस्थाप्य बह्वृचं वेदपारगम्॥ १२८<br>यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम्।<br>अथर्ववेदिनं तद्वदुत्तरे स्थापयेद् बुधः॥ १२९<br>अष्टौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः।<br>एवं द्वादश विप्राः स्युर्वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूर्ववत् पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १३०<br>रात्रिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं सुमङ्गलम्।<br>पूर्वेतो बह्वृचः शान्तिं पठन्नास्ते ह्युदङ्मुखः॥ १३१<br>शाक्तं शाक्रं च सौम्यं च कौष्माण्डं शान्तिमेव च।<br>पाठयेद् दक्षिणद्वारि यजुर्वेदिनमुत्तमम्॥ १३२<br>सुपर्णमथ वैराजमाग्रेयं रुद्रसंहिताम्।<br>ज्येष्ठसाम तथा शान्तिं छन्दोगः पश्चिमे जपेत्॥ १३३<br>शान्तिसूक्तं च सौरं च तथा शाकुनकं शुभम्।<br>पौष्टिकं च महाराज्यमुत्तरेणाप्यथर्ववित्॥ १३४<br>पञ्चभिः सप्तभिर्वापि होमः कार्योऽत्र पूर्ववत्।<br>स्नाने दाने च मन्त्राः स्युस्त एव मुनिसत्तम॥ १३५<br>वसोर्धाराविधानं च लक्षहोमे विशिष्यते।<br>अनेन विधिना यस्तु कोटिहोमं समाचरेत्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं व्रजेत्॥ १३६<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि ग्रहयज्ञत्रयं नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा पदमिन्द्रस्य गच्छति॥ १३७<br>अश्वमेधसहस्त्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित्।<br>कृत्वा यत् फलमाप्नोति कोटिहोमात् तदश्नुते॥ १३८योनि सभी मेखलाओंके ऊपर पीपलके पत्तेके सदृश होनी चाहिये। कोटिहोममें चार बित्ता लम्बी, चारों ओरसे चौकोर और तीन परिधियोंसे युक्त एक वेदी होनी चाहिये। परिधियोंका प्रमाण तथा वेदियोंकी ऊँचाई पहले कही जा चुकी है। पुनः सोलह हाथ लम्बे-चौड़े मण्डपकी स्थापना करे, जिसमें चारों दिशाओंमें दरवाजे हों। बुद्धिसम्पन्न यजमान उसके पूर्वद्वारपर ऋग्वेदके पारगामी ब्राह्मणको, दक्षिण द्वारपर यजुर्वेदके ज्ञाताको, पश्चिमद्वारपर सामवेदीको और उत्तरद्वारपर अथर्ववेदीको नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त वेद एवं वेदाङ्गोंके ज्ञाता आठ ब्राह्मणोंको हवन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये। इस प्रकार इस कार्यमें बारह ब्राह्मणोंको नियुक्त करनेका विधान है। इन सभी ब्राह्मणोंका वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला, चन्दन आदि सामग्रियोंद्वारा पूर्ववत् भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये॥ ११९—१३०॥<br><br>(कार्यारम्भ होनेपर) पूर्वद्वारपर स्थित ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तराभिमुख हो परम माङ्गलिक रात्रिसूक्त, रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त तथा अन्यान्य शान्ति-सूक्तोंका पाठ करता रहे। दक्षिणद्वारपर स्थित श्रेष्ठ यजुर्वेदी ब्राह्मणसे शक्तिसूक्त, शक्रसूक्त, सोमसूक्त, कूष्माण्डसूक्त तथा शान्ति-सूक्तका पाठ करवाना चाहिये। पश्चिमद्वारपर स्थित सामवेदी ब्राह्मण सुपर्ण, वैराज, आग्नेय—इन ऋचाओं, रुद्रसंहिता, ज्येष्ठसाम तथा शान्तिपाठोंका गान करे। उत्तरद्वारपर नियुक्त अथर्ववेदी ब्राह्मण शान्ति (शांतातीय १९)-सूक्त, सूर्यसूक्त, माङ्गलिक शकुनिसूक्त, पौष्टिक एवं महाराज्य (सूक्त)-का पाठ करे। मुनिश्रेष्ठ ! इसमें भी पूर्ववत् पाँच अथवा सात ब्राह्मणोंद्वारा हवन कराना चाहिये। स्नान और दानके लिये वे ही पूर्वकथित मन्त्र इसमें भी हैं। लक्षहोममें केवल वसोर्धाराका विधान विशेष होता है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे कोटिहोमका विधान करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और मरनेपर विष्णुलोकमें चला जाता है। जो मनुष्य तीनों प्रकारके ग्रहयज्ञोंका पाठ अथवा श्रवण करता है उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और अन्तमें वह इन्द्रलोकमें चला जाता है। धर्मज्ञ मनुष्य अठारह हजार अश्वमेधयज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त करता है, वह फल कोटिहोम नामक यज्ञसे प्राप्त हो जाता
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